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संपादकीय: बनाना होगा कर्ज व विकास योजनाओं के बीच संतुलन

एक तरफ वे राज्य हैं जो भविष्य का ढांचा तैयार कर रहे हैं, दूसरी ओर वे राज्य हैं जो लोकलुभावन योजनाओं से वाहवाही लूटने में व्यस्त हैं।
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जयपुर

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Pankaj Shrivastav

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Updated: 20 May 2026, 4:47 PM IST

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लोकतंत्र में लोकलुभावन राजनीति आसान रास्ता जरूर है, लेकिन समय पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह राज्यों की आर्थिक सेहत के लिए धीमा जहर भी साबित हो सकती है। ताजा वित्तीय आंकड़ों ने तीन राज्य- मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की उस कमजोरी को उजागर किया है, जिस पर लंबे समय से पर्दा डाला जाता रहा। यहां विकास कार्यों पर अपेक्षाकृत कम खर्च और कर्ज के बढ़ते बोझ ने यह साफ कर दिया है कि सरकारें अब दीर्घकालिक निर्माण की बजाय अल्पकालिक राजनीतिक संतुष्टि की राह पर ज्यादा चल रही हैं। तीनों राज्यों में एक समान प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है- कर्ज लेकर मुफ्त योजनाएं चलाने की राजनीति। कहीं मुफ्त बिजली, कहीं नकद सहायता, कहीं चुनावी गारंटियों की भरमार।

जनता को राहत देना सरकार का दायित्व जरूर है, लेकिन राहत और निर्भरता के बीच एक महीन रेखा होती है। दुर्भाग्य से राजनीति अब उस रेखा को मिटाती जा रही है। विकास खर्च के मामले में ये राज्य पिछड़ते नजर आए हैं वहीं दूसरी ओर, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों ने बजट का बड़ा हिस्सा पूंजीगत निवेश यानी सड़क, उद्योग, सिंचाई, शहरी ढांचे और तकनीकी विकास पर लगाया है। यह तस्वीर केवल आंकड़ों का अंतर नहीं, बल्कि सोच का फर्क भी है। एक तरफ वे राज्य हैं जो भविष्य का ढांचा तैयार कर रहे हैं, दूसरी ओर वे राज्य हैं जो लोकलुभावन योजनाओं से वाहवाही लूटने में व्यस्त हैं। सबसे बड़ा संकट यह है कि जो कर्ज लिया जाता है वह उत्पादन बढ़ाने या परिसंपत्तियां खड़ी करने में कम, राजस्व खर्च में ज्यादा जा रहा है। यानी जो पैसा आने वाली पीढिय़ों के लिए सड़क, अस्पताल, शिक्षा और उद्योग खड़े कर सकता था, वह तत्काल वितरण में खर्च हो रहा है। ऐसा करने वाले राज्यों की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है और ब्याज का बोझ लगातार बढ़ता जाता है। मध्यप्रदेश में औद्योगिक विस्तार की गति अपेक्षाकृत धीमी है। राजस्थान में पानी और रोजगार की चुनौतियां पहले से गंभीर हैं। वहीं छत्तीसगढ़, जो प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है, वहां भी आर्थिक आत्मनिर्भरता की बजाय सरकारी योजनाओं पर निर्भरता बढ़ रही है। यदि यही स्थिति बनी रही तो ये राज्य विकासशील नहीं, बल्कि अनुदान आधारित अर्थव्यवस्था वाले प्रदेश बनकर रह जाएंगे।

अब समय है कि सरकारें राजनीतिक साहस दिखाएं। पहली आवश्यकता यह है कि कर्ज लेने की स्पष्ट सीमा तय हो और उसे पूंजीगत परियोजनाओं तक सीमित किया जाए। दूसरी जरूरत यह है कि हर मुफ्त योजना की आर्थिक और सामाजिक समीक्षा अनिवार्य हो। सरकार फ्रीबीज मॉडल से निकलकर सशक्तीकरण मॉडल की ओर बढ़ें। किसान को सूक्ष्म सिंचाई और बाजार उपलब्ध कराना उपयोगी होगा। युवाओं को रोजगार और कौशल चाहिए। महिलाओं को उद्यमिता और स्वरोजगार से जोडऩा होगा।