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यूरोप का शांत संकट: आज की राहत, कल का बोझ

वृद्ध मतदाताओं के पास सुरक्षित रखने के लिए बहुत कुछ होता है और बदलाव से लाभ उठाने के लिए समय बहुत कम।

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यूरोप ने 2010 के दशक की शुरुआत में अपने लिए एक राह चुनी। इसकी उसने कभी औपचारिक घोषणा नहीं की- न किसी संसद में, न किसी संधि में और न ही किसी निर्णायक मतदान के जरिए। यह चयन लाखों व्यक्तियों द्वारा लिए गए तार्किक फैसलों का परिणाम था, जिनकी दिशा अंतत: एक ही थी- जो आवश्यक है उसका निर्माण करने की बजाय, जो मौजूद है उसका प्रबंधन करो। तब तक यूरोप ऋण संकट से उबर चुका था। कल्याणकारी राज्य दबाव में थे, लेकिन सुरक्षित थे। कुल मिलाकर यह मान लिया गया कि 'जितना है, उतना काफी है।' इसके बाद जो हुआ, वह कोई प्रत्यक्ष पतन नहीं था। वह कुछ ऐसा था, जिसे देख पाना भी कठिन था और उलटना उससे भी अधिक कठिन। यह निम्न अपेक्षाओं का शांत संस्थानीकरण था।

यूरोप की रेंगती आर्थिक वृद्धि का सामान्य स्पष्टीकरण यह दिया जाता है कि वहां अत्यधिक कानूनी पेचीदगियां हैं, पूंजी बाजार खंडित है और उद्यम पूंजी (वेंचर कैपिटल) का ढांचा पर्याप्त विकसित नहीं है। यह सब सच है, लेकिन यह कारण के बजाय लक्षण को पहचानने जैसी गलती है। यूरोप इन संरचनाओं तक संयोगवश नहीं पहुंचा। उसने इन्हें सामान्य लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से बार-बार चुना है। इसे समझने के लिए ब्रुसेल्स की ओर नहीं, मतपेटियों की ओर देखना होगा। यूरोप की मतदाता आबादी दुनिया के किसी भी अन्य बड़े आर्थिक समूह की तुलना में अधिक तेजी से बूढ़ी हो रही है। अलग-अलग देशों में इसके स्वरूप भिन्न हो सकते हैं- इटली अपेक्षाकृत अधिक वृद्ध है, फ्रांस कुछ जवान, और नॉर्डिक देश इनके बीच कहीं स्थित हैं- लेकिन दिशा हर जगह समान ही है। पूरे महाद्वीप में औसत मतदाता आज से एक पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक उम्र का है, और एक पीढ़ी बाद वह और अधिक वृद्ध होगा। ऐसे मतदाता पूरी तरह तार्किक निर्णय लेते हैं, लेकिन बाहर से देखने पर वे निर्णय सामूहिक तर्कहीनता जैसे प्रतीत होते हैं। वृद्ध मतदाताओं के पास सुरक्षित रखने के लिए बहुत कुछ होता है और बदलाव से लाभ उठाने के लिए समय बहुत कम।

वे निवेश की अपेक्षा प्रत्यक्ष लाभांतरण को, प्रतिस्पर्धा की अपेक्षा निरंतरता को, और स्टार्टअप इकोसिस्टम की बजाय पेंशन की गारंटी को प्राथमिकता देते हैं। वे जानबूझकर अपने देश को कमजोर बनाने के लिए वोट नहीं देते। वे तो बस बदलावरहित स्थिरता के पक्ष में मतदान करते हैं। लेकिन जब देश का जनसांख्यिकी ढांचा बदलने लगता है, तो यही स्थिरता धीरे-धीरे पतन का कारण बन जाती है। इसका स्पष्ट प्रमाण अखबारी सुर्खियों में नहीं, बल्कि बजट के प्रावधानों में मिलता है।

जर्मनी हर वर्ष अपनी पेंशन प्रणाली में 100 अरब यूरो से अधिक देता है, जो उसकी पूरी संघीय बजट राशि का लगभग एक-चौथाई है। यह राशि पिछले दस वर्षों से लगातार बढ़ रही है, इसलिए नहीं कि व्यवस्था अधिक उदार हो गई है, बल्कि इसलिए कि इसके लाभार्थी मतदाताओं की संख्या बढ़ गई है। जितने अधिक सेवानिवृत्त लोग, उतने अधिक वोट, और उतना अधिक हस्तांतरण। यह गणित जटिल नहीं है और न ही इसकी राजनीति। यह इस पूरे तंत्र का सबसे सीधा गणित है: वह वोटर जिसे आज सरकारी हस्तांतरण का लाभ मिल रहा है, वह सामने मौजूद है, वह लगातार वोट देता है और उसे पता है कि उसका क्या दांव पर लगा है। दूसरी ओर, वह करदाता जो बीस साल बाद इसका बोझ उठाएगा, वह अभी इतना छोटा है कि उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, या फिर उसने अभी जन्म ही नहीं लिया है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं इस विषमता को समाप्त करने के लिए नहीं बनाई गईं, वे तो इसे प्रतिबिंबित करने के लिए बनी हैं। जर्मनी ने पिछले दशक में अधिकांशत: 'शुल्डनब्रेम्जे' अर्थात 'ऋण-नियंत्रण' के संवैधानिक नियम का पालन किया। यह नियम उस कठिन विकल्प को अनिवार्य बनाता था, जिससे सामान्यत: राजनीति बचती है- यदि आप पेंशन पर अधिक खर्च करना चाहते हैं, तो आपको बुनियादी ढांचे पर कम खर्च करना होगा। लेकिन 2025 की शुरुआत में एक नई सरकार ने विभिन्न दलों के समर्थन के साथ, अगले दस वर्षों के लिए इस नियम को निलंबित कर दिया, और इसका विरोध होने के बजाय राहत के रूप में इसका स्वागत किया गया। ऐसा करने के पीछे के तर्क गलत नहीं थे। लेकिन एक संवैधानिक बाधा जो महामारी और दो बड़ी आर्थिक मंदियों को झेल गई थी, वह उस राजनीतिक बहुमत के सामने नहीं टिक सकी जो कड़े फैसले लेने को तैयार नहीं था।

यह केवल जर्मनी की कहानी नहीं है। पूरे यूरोप में हर बार यही फैसला इसी तरह लिया जाता है। फ्रांस में पेंशन सुधारों के खिलाफ इतने भारी विरोध प्रदर्शन हुए कि सरकार को संसद को दरकिनार करके वह कानून पास करना पड़ा, जिसे लागू करने का वादा करके वह सत्ता में आई थी। इटली में राष्ट्रीय ऋण जीडीपी के लगभग 140 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, लेकिन लगातार आने वाली सरकारों को उसे कम करने के लिए आवश्यक उपायों के पक्ष में बहुमत नहीं मिल पाया। तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन परिणाम एक समान है- आज की लागत को भविष्य पर टाल दिया जाता है, भविष्य का बोझ लगातार बढ़ता जाता है, और हर निर्णय अपने-आप में वैध दिखाई देता है, जबकि इन सभी निर्णयों का संचयी भार किसी एक व्यक्ति या संस्था की जिम्मेदारी नहीं बनता।

इसका आर्थिक विकास पर प्रभाव चुपचाप, लेकिन गहराई से दिखाई देता है। यदि कोई अर्थव्यवस्था दो प्रतिशत के बजाय केवल एक प्रतिशत की दर से बढ़ती है, तो वह केवल उत्पादन ही नहीं गंवाती; वह उस अतिरिक्त गुंजाइश को भी खो देती है, जो सुधारों को सहनीय बनाती है। जब विकास तेज होता है, तब पुनर्गठन के लिए एक आसरा मौजूद रहता है। कम विकास दर सुधारों को कठिन बनाती है। सुधारों की कठिनाई विकास को और धीमा कर देती है, और वृद्ध होते मतदाता पूरी तरह तार्किक ढंग से मौजूदा संसाधन-वितरण को यथासंभव लंबे समय तक बनाए रखने के लिए मतदान करते है। यों कहें, तब तक, जब तक वे स्वयं जीवित रहकर मतदान कर सकते हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि यूरोप समाप्त हो चुका है। हालांकि ऐसी स्थिति में पहुंच चुका है, जिसे स्वीकार करने की ईमानदार राजनीतिक इच्छाशक्ति उसमें अभी तक पैदा नहीं हुई है। उसकी राजनीतिक प्रणालियां उन मतदाताओं की प्राथमिकताओं के अनुरूप ढल चुकी हैं, जो आज मौजूद हैं, जबकि अर्थव्यवस्था को उन लोगों के लिए काम करना चाहिए, जो अभी मतदान करने की आयु तक नहीं पहुंचे हैं या जो अभी जन्मे भी नहीं हैं। कभी न कभी इसे भुगतना तो पड़ेगा ही। यूरोप अभी उस मोड़ पर नहीं पहुंचा है, लेकिन जो लोग इसकी कीमत चुकाएंगे, वे अभी स्कूलों में पढ़ रहे हैं।(राल्फ बिलस्टीन सबस्टैक प्रकाशन 'कॉन्टिनेंटल ड्रिफ्ट' के लेखक हैं। इनके पास वित्तीय क्षेत्र में दो दशक से अधिक का अनुभव है)