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संपादकीय: शिकंजा कसना होगा मौत बांटने वाले ‘खिलाड़ियों’ पर

हर पंजीकृत डॉक्टर का लाइव डिजिटल डेटाबेस बने, ताकि मरीज एक क्लिक पर डॉक्टर की प्रामाणिकता जांच सके।

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नीट-यूजी में हुई धांधलियों से उपजे आक्रोश के बीच मध्य प्रदेश और राजस्थान के चिकित्सा तंत्र से हैरतअंगेज सच भी सामने आए हैं। मप्र के दमोह और जबलपुर के सरकारी अस्पतालों में फर्जी डॉक्टरों की नियुक्तियां हो गईं। वहीं, मार्च में ही खुलासा हुआ था कि राजस्थान मेडिकल काउंसिल में ऐसे लोगों का डॉक्टर के रूप में फर्जी रजिस्ट्रेशन कर दिया गया, जिन्होंने न तो कभी मेडिकल की पढ़ाई की और न ही कभी इंटर्नशिप की। यह कोरा भ्रष्टाचार ही नहीं, बल्कि व्यवस्था की शह पर खेला जा रहा मरीजों की जान लेने वाला खेल है। बिना योग्यता के डॉक्टरों का तैनात हो जाना और काउंसिल द्वारा बिना पढ़ाई-इंटर्नशिप के रजिस्ट्रेशन जारी कर देना देश के स्वास्थ्य ढांचे पर गहरी चोट के संकेत हैं।

डॉक्टर बनने की अंधी चाह में शॉर्टकट तलाशने वाले ये अपराधी जब मरीजों की जिंदगी को अपनी प्रयोगशाला बना लें, तो राष्ट्रीय सुरक्षा जितनी चिंता होना स्वाभाविक है। आज नीट को पारदर्शी बनाने की जितनी जरूरत है, उससे कहीं बड़ी चुनौती व्यवस्था में घुस चुके इन फर्जी चिकित्सकों को बाहर निकालने की है। इस घोटाले में राज्य मेडिकल काउंसिल और नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जॉमिनेशन जैसी संस्थाओं की भूमिका पर गहरे सवाल हैं। आखिर कोई भी जालसाज बिना विभागीय मिलीभगत के इतना बड़ा फर्जीवाड़ा कैसे कर सकता है? क्या ये शीर्ष संस्थाएं केवल कागजी पंजीयन बांटने के लिए बनी हैं? इन उदाहरणों से साफ है कि सत्यापन की पूरी प्रक्रिया महज औपचारिकता बनकर रह गई है। विकसित देशों में ऐसे चिकित्सा अपराधियों के लिए कोई ढील नहीं है। वहां इसे अक्षम्य और संगीन अपराध माना जाता है। ऐसे जालसाजों को आजीवन ब्लैकलिस्ट कर सलाखों के पीछे डाल दिया जाता है। इसके विपरीत, भारत में जांच की अंतहीन और कछुआ चाल प्रक्रिया चलती रहती है, जो अपराधियों को बचने का मौका देती है। मरीजों की जान की सुरक्षा और इस मानवीय पेशे की पवित्रता को बचाने के लिए केवल वादे नहीं, बल्कि निर्णायक और कड़े प्रहार की आवश्यकता है। हर पंजीकृत डॉक्टर का लाइव डिजिटल डेटाबेस बने, ताकि मरीज एक क्लिक पर डॉक्टर की प्रामाणिकता जांच सके।

मेडिकल काउंसिल हर साल सभी अस्पतालों का निरीक्षण करे, डॉक्टरों के दस्तावेजों का रैंडम फिजिकल वेरिफिकेशन करे। फर्जीवाड़ा पकड़े जाने पर फर्जी डॉक्टर की फाइल पास करने वाले और सत्यापन करने वालों पर सह-आरोपी के रूप में आपराधिक मुकदमा दर्ज हो। तभी मौत बांटने वालों में खौफ जगेगा। जिम्मेदारों को यह बात अच्छी तरह से समझनी होगी कि मेडिकल जैसे पवित्र पेशे में फर्जीवाड़े के इस कैंसर का इलाज समय रहते करना होगा। ऐसा नहीं हुआ तो ऐसे फर्जी चिकित्सकों के कारण मरीजों की जान पर तलवार सदैव लटकी रहेगी।