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संपादकीय: ‘नीट’ की शुचिता बचाने के लिए जरूरी कदम

देश में डिजिटल विभाजन पाटने के प्रयासों में भी तेजी लानी होगी। नीट जैसी परीक्षाओं में दूर-दराज के ऐसे अभ्यर्थी भी शामिल होते हैं जो सुविधा संपन्न क्षेत्रों के विद्यार्थियों की तरह कम्प्यूटर पर अभ्यस्त नहीं होते।

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प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता पर प्रश्नचिह्न लगने और इसके राजनीतिक मुद्दा बन जाने के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए होनेवाली परीक्षा (नीट) के तौर-तरीकों में व्यापक बदलाव की घोषणा की। अगले साल से 'नीट' कम्प्यूटर आधारित (सीबीटी) होगी। एक तरह से सरकार की स्वीकारोक्ति है कि ओएमआर शीट वाला मॉडल सुरक्षित नहीं रह गया है। प्रधान की यह ईमानदार स्वीकारोक्ति स्वागत योग्य है जिसमें उन्होंने माना है कि 'चेन ऑफ कमांड' में कहीं न कहीं चूक हुई है। लेकिन यह नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की साख पर लगे धब्बे को धोने के लिए पर्याप्त नहीं। साल-दर-साल लाखों युवाओं के सपनों को भ्रष्टाचार से कुचलने वाले गुनहगारों को जब तक सजा नहीं मिलेगी, सरकार के प्रयासों को पर्याप्त नहीं माना जा सकता। व्यवस्थागत गड़बडिय़ों के जिम्मेदारों को ऐसी सजा दिलाना आवश्यक है जो नजीर बन सके और आगे अपराध करने से रोके। शिक्षा माफिया के खिलाफ 'लंबी और निरंतर लड़ाई' की बात कहना ही काफी नहीं होगा।

सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ डिजिटल हो जाना ही सभी समस्याओं का निदान नहीं। पहले भी सरकारी प्रबंधों में भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर डिजिटलीकरण के प्रयास किए गए लेकिन भ्रष्टाचारी हर बार कोई नया रास्ता निकाल ही लेते हैं। तकनीक के प्रसार से कम्प्यूटर सिस्टम में सेंधमारी अब सिर्फ विशेष प्रकार के 'कौशल' की बात रह गई है। इसलिए मजबूत 'साइबर सिक्योरिटी प्रोटोकॉल' बना उसका पालन सुनिश्चित करना होगा। देश में डिजिटल विभाजन पाटने के प्रयासों में भी तेजी लानी होगी। नीट जैसी परीक्षाओं में दूर-दराज के ऐसे अभ्यर्थी भी शामिल होते हैं जो सुविधा संपन्न क्षेत्रों के विद्यार्थियों की तरह कम्प्यूटर पर अभ्यस्त नहीं होते। एक साथ करीब 25 लाख अभ्यर्थियों को डिजिटल माध्यम से परीक्षा में शामिल करना अपने आप में एक चुनौती है। हालांकि, सरकार चाहे तो ऐसी बाधाओं को आसानी से दूर कर सकती है।

एक साल का समय बुनियादी ढांचों के विकास के लिए पर्याप्त है। जरूरत सिर्फ इच्छाशक्ति की है। इस पूरे प्रकरण का सर्वाधिक चिंताजनक पक्ष युवाओं का व्यवस्था पर से डगमगाता विश्वास है। जीवन के शुरुआती पड़ाव पर ही व्यवस्थागत खामियों का मानसिक आघात उनके पूरे जीवन को प्रभावित कर सकता है। पिछले कुछ वर्षों में न केवल नीट, बल्कि अन्य भर्ती परीक्षाओं में भी ऐसी घटनाओं ने युवाओं को आहत किया है। शिक्षा मंत्री का व्यवस्था सुधारने का वादा करना और राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा, अभ्यर्थियों के घावों पर मरहम लगाने जैसा है। ये कदम भविष्य में कितने प्रभावी सिद्ध होंगे, यह तो समय ही बताएगा। परंतु यह स्पष्ट है कि जब तक पेपर लीक के असली गुनहगारों और उनके राजनीतिक संरक्षकों को दंडित नहीं किया जाता, तब तक हर सुधार अधूरा ही रहेगा।