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वैज्ञानिक सोच विकसित करने से ही दूर होगा अंधविश्वास

वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद देश में अंधविश्वास के सहारे ठगी के मामले बढ़ते जा रहे हैं। भविष्य बताने का दावा करने वाले लोग सोशल मीडिया के माध्यम से भी अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं। इन तथाकथित विधाओं की वैज्ञानिकता पर बहस होती रहती है, लेकिन इनके नाम पर लोगों को ठगा जा रहा है। डरे हुए, अंधविश्वासी और भ्रमित लोग इनके जाल में फंस जाते हैं।

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भारत

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Opinion Desk

May 20, 2026

andhvishvash

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ज्ञानचंद पाटनी, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार

आजादी के बाद भारत विज्ञान के क्षेत्र में अपनी धाक जमा चुका है। बरसों पहले परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों में शामिल हो चुका भारत अंतरिक्ष में भी अपनी क्षमता साबित कर रहा है। इन उपलब्धियों के बावजूद देश में अंधविश्वास का फैलाव गंभीर चिंता का विषय है। समय-समय पर नरबलि जैसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। हाल ही में राजस्थान के पाली जिले के रामासनी सांदवान गांव में हुई हृदयविदारक घटना ने अंधविश्वास की भयावहता की ओर फिर ध्यान आकर्षित किया है। पाली में एक व्यक्ति ने मौलवी के बहकावे में आकर एक बच्चे की हत्या कर दी। यह घटना बताती है कि अंधविश्वास में फंसा व्यक्ति किसी भी हद तक जा सकता है। इसी वर्ष मार्च में झारखंड में तंत्र-मंत्र के नाम पर एक किशोरी की हत्या कर दी गई। जांच में सामने आया कि लडक़ी की मां ने ही अपने बेटे के स्वास्थ्य के लिए यह कदम उठाया था। तांत्रिक ने महिला से कहा था कि बेटे को ठीक करने के लिए एक कुंवारी लडक़ी की बलि देनी होगी। अंधविश्वास के चलते महिला ने अपनी ही बेटी की बलि दे दी।


नरबलि ही नहीं, बल्कि यौन शोषण के मामले
अंधविश्वास के कारण केवल नरबलि ही नहीं, बल्कि यौन शोषण के मामले भी सामने आते रहते हैं। हाल ही में महाराष्ट्र के कथित ज्योतिषी अशोक खरात पर दर्जनों महिलाओं के यौन शोषण के आरोप लगे। इससे जुड़े वीडियो भी सामने आए, जिनसे पता चला कि वह तंत्र-मंत्र के नाम पर महिलाओं को बहलाकर उनका शोषण करता था। करीब 20 वर्ष पहले मर्चेंट नेवी से रिटायर होने के बाद खरात ने ज्योतिषी के रूप में काम शुरू किया। धीरे-धीरे उसने खुद को हाई-प्रोफाइल ज्योतिषी के रूप में स्थापित कर लिया। उसके ग्राहकों में नेता, बिल्डर और बड़े कारोबारी भी शामिल थे। उसने भरोसे, पहुंच और गोपनीयता के सहारे अपनी छवि बनाई और अपार संपत्ति अर्जित कर ली। यह विडंबना ही है कि वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद देश में अंधविश्वास के सहारे ठगी के मामले बढ़ते जा रहे हैं। भविष्य बताने का दावा करने वाले लोग सोशल मीडिया के माध्यम से भी अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं। इन तथाकथित विधाओं की वैज्ञानिकता पर बहस होती रहती है, लेकिन इनके नाम पर लोगों को ठगा जा रहा है। डरे हुए, अंधविश्वासी और भ्रमित लोग इनके जाल में फंस जाते हैं। अलौकिक शक्तियों का दावा करने वाले शातिर लोग अपने स्वार्थ साधते हैं और निर्दोषों का जीवन बर्बाद कर देते हैं। अंधविश्वास के कारणों को समझे बिना इसका समाधान संभव नहीं है।


पढ़े लिखे लोग भी हो रहे शिकार
इसे केवल अशिक्षा से जोडकऱ देखना पूरी तरह सही नहीं है, क्योंकि पढ़े-लिखे लोग भी अंधविश्वास का शिकार हो जाते हैं। डर, संकट से तुरंत राहत पाने की इच्छा और सामाजिक दबाव के कारण तर्क और प्रमाण पीछे छूट जाते हैं। महाराष्ट्र का अशोक खरात भी पढ़े-लिखे परिवारों और महिलाओं को ही निशाना बनाता था। वास्तव में अंधविश्वास की जड़ में लालच,भय और तुरंत इच्छापूर्ति की चाह होती है। इस समस्या के समाधान के लिए सबसे पहले शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान देना होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबों का ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों में तर्क और विचार करने की क्षमता विकसित करना होना चाहिए। बच्चों में सवाल पूछने का साहस पैदा करना जरूरी है। शिक्षकों का प्रशिक्षण भी ऐसा हो कि वे बच्चों में वैज्ञानिक सोच विकसित कर सकें। गांवों और कस्बों में सामुदायिक शिविर आयोजित किए जाएं, जहां तथाकथित चमत्कारों का वैज्ञानिक तरीके से भंडाफोड़ किया जाए। जब लोग वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएंगे, तब अंधविश्वास फैलाने वाले लोगों का प्रभाव कम होगा।


तथ्य आधारित रिपोर्टिंग पर हो जोर
कानून और नीतिगत हस्तक्षेप भी बेहद जरूरी हैं। अंधविश्वास के नाम पर होने वाले अपराधों जैसे नरबलि, यौन शोषण और धोखाधड़ी के मामलों में कठोर सजा होनी चाहिए। केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसे मामलों की रोकथाम पर भी ध्यान देना होगा। पीडि़तों की सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए मजबूत व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, ताकि वे बिना डर शिकायत कर सकें। मीडिया और डिजिटल जगत की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया का उपयोग सही जानकारी देने के लिए होना चाहिए। सनसनी फैलाने के बजाय तथ्य आधारित रिपोर्टिंग पर जोर दिया जाना चाहिए। डिजिटल साक्षरता अभियानों के माध्यम से लोगों को सिखाया जाना चाहिए कि किसी भी दावे की सत्यता की जांच कैसे करें, प्रमाण और विशेषज्ञ की पहचान कैसे करें। अंधविश्वास खत्म करने के लिए समाज और देश के प्रभावशाली लोगों को भी आगे आना होगा।


सार्वजनिक महिमामंडन देता है अंधविश्वास को बढ़ावा

दुर्भाग्य यह है कि आज प्रभावशाली वर्ग का एक हिस्सा खुद अंधविश्वास में डूबा दिखाई देता है। जगह-जगह कथित चमत्कारों और पर्चा पढऩे के नाम पर बड़े आयोजन हो रहे हैं, जिनका कई नेता समर्थन करते हैं। चमत्कार का दावा करने वाले बाबाओं के सामने बड़े-बड़े नेता नतमस्तक दिखाई देते हैं। इससे आम जनता का विश्वास और मजबूत हो जाता है तथा लोग आसानी से इनके प्रभाव में आ जाते हैं। हाल ही में तमिलनाडु में एक दिलचस्प मामला सामने आया। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने अपने ज्योतिषी को मुख्यमंत्री कार्यालय में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (ओएसडी) नियुक्त कर दिया था। हालांकि सहयोगी दलों के विरोध के बाद यह नियुक्तिरद्द करनी पड़ी। इसमें कोई दो राय नहीं कि निजी मान्यताओं का सार्वजनिक महिमामंडन समाज में अंधविश्वास को बढ़ावा देता है इसलिए समाज, राज्य और देश का नेतृत्व करने वालों को ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए, जिससे जनता अंधविश्वास के चंगुल में फंसे।