
rising temperature
देश का बड़ा हिस्सा इस समय भीषण गर्मी की गिरफ्त में है। नौतपा अभी शुरू भी नहीं हुआ और कई शहरों में तापमान 46 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है। सड़कों पर तपती धूप, गर्म हवाओं के थपेड़े और रात में भी कम न होने वाली उमस संकेत दे रही है कि जलवायु परिवर्तन के खतरे लगातार बढ़ते जा रहे हैं। मौसम विभाग की चेतावनियां केवल औपचारिक सूचनाएं नहीं हैं, बल्कि यह उस गंभीर संकट का संकेत हैं, जिसका सबसे अधिक असर समाज के कमजोर तबकों पर पड़ रहा है।
भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी खुले वातावरण में काम करती है, भीषण गर्मी केवल स्वास्थ्य संकट नहीं बल्कि आर्थिक संकट भी बन जाती है। खेतिहर मजदूर, निर्माण कार्यों में लगे श्रमिक, रेहड़ी-पटरी वाले और दिहाड़ी मजदूर तपती धूप में काम करने को मजबूर हैं। लगातार बढ़ती गर्मी के कारण श्रम घंटों का नुकसान हो रहा है, जिससे उनकी आय प्रभावित होती है। दूसरी ओर बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह मौसम जानलेवा साबित हो सकता है। हर साल हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन से होने वाली मौतें यह बताती हैं कि हमारी तैयारियां अभी भी पर्याप्त नहीं हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि केंद्र सरकार की ओर से 2016 में तैयार की गई हीट एक्शन योजना अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा सकी। सरकारी आंकड़ों में भले ही 130 शहरों में हीट एक्शन प्लान लागू होने का दावा किया जाता हो, लेकिन जमीन पर अधिकांश शहरों में इसका असर नजर नहीं आता। अहमदाबाद इसका एक अपवाद जरूर है, जहां समय रहते चेतावनी प्रणाली, कूलिंग सेंटर और जनजागरूकता जैसे कदम अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से लागू किए गए। लेकिन देश के अधिकांश शहरों में हीट एक्शन प्लान केवल कागजों तक सीमित दिखाई देता है। असल समस्या हमारे शहरी विकास मॉडल में छिपी है।
तेजी से फैलते कंक्रीट के जंगल शहरों को हीट आइलैंड में बदल रहे हैं। पेड़ों की कटाई, हरित क्षेत्रों में कमी और जल स्रोतों के खत्म होने से शहर अपने आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक गर्म हो रहे हैं। बहुमंजिला इमारतें और डामर की सड़कें दिनभर गर्मी सोखती हैं और रातभर छोड़ती रहती हैं, जिससे तापमान सामान्य नहीं हो पाता। यह स्थिति बताती है कि अब गर्मी से निपटने के लिए केवल मौसमी उपाय पर्याप्त नहीं होंगे।
हीट एक्शन योजनाओं को शहरी नियोजन की मुख्यधारा में शामिल करना होगा। शहरों में छायादार सड़कों का निर्माण, बड़े पैमाने पर पौधरोपण, वर्षा जल संरक्षण, तालाबों और जल स्रोतों का पुनर्जीवन तथा ग्रीन बिल्डिंग को बढ़ावा देना आवश्यकता बन चुका है। मजदूरों के कार्य समय में बदलाव, सार्वजनिक स्थानों पर पेयजल और शीतलन केंद्रों की व्यवस्था तथा कच्ची बस्तियों में रहने वालों के लिए विशेष राहत योजनाएं भी जरूरी हैं। समय रहते शहरों को जलवायु अनुकूल बनाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह संकट और भयावह हो सकता है।
Published on:
21 May 2026 12:56 pm
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