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विनय कौड़ा,(अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार)
विश्व राजनीति के इस संक्रमण काल में, अमरीका के विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दोनों भूमिकाएं निभा रहे मार्को रुबियो का प्रस्तावित भारत दौरा केवल एक औपचारिक राजनयिक यात्रा नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन की धड़कनों को समझने का अवसर भी है। 24-26 मई तक नई दिल्ली में होने वाली द्विपक्षीय वार्ताओं और क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक उस नए भू-राजनीतिक युग का संकेत हैं, जहां भारत और अमरीका हिंद-प्रशांत में रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना चाहते हैं। इस यात्रा का सबसे रोचक और प्रतीकात्मक पक्ष रुबियो का कोलकाता दौरा है, हालांकि वे आगरा और जयपुर भी आएंगे।
बदलते दौर में मजबूत हो रहे भारत-अमरीका संबंध
भारत-अमरीका संबंधों का वर्तमान स्वरूप बीते वर्षों की तुलना में कहीं अधिक जटिल और यथार्थवादी हो चुका है। बाइडेन काल में, जहां इन संबंधों की आधारशिला साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और वैचारिक निकटता पर रखी गई थी, वहीं ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में यह संबंध अधिक हित-आधारित और लेन-देन केंद्रित हो गया। अब वाशिंगटन का मूल प्रश्न यह है कि भारत के साथ साझेदारी से अमरीकी अर्थव्यवस्था, उद्योग और सामरिक हितों को कितना लाभ प्राप्त हो सकता है। फिर भी, यह कहना भूल होगी कि इस व्यवहारिकता ने संबंधों की ऊष्मा को कम कर दिया है। वास्तव में, दोनों देशों के साझा हित पहले से अधिक स्पष्ट रूप से सामने आए हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता, दक्षिण चीन सागर का तनाव, हिंद महासागर में सामरिक प्रतिस्पर्धा, आपूर्ति की असुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सेमीकंडक्टर तकनीक की वैश्विक दौड़ ने भारत और अमरीका को एक-दूसरे के निकट ला खड़ा किया है। भारत द्वारा चैप्स-सिलिकॉन पहल में शामिल होना, अमरीकी तकनीकी कंपनियों का भारत में बढ़ता निवेश तथा अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में नए संवाद इस बात के संकेत हैं कि दोनों देश भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा ढांचे को मिलकर आकार देना चाहते हैं।
रक्षा संबंध गहरे, लेकिन मतभेद भी कायम
अक्टूबर 2025 में दस वर्षों के लिए रक्षा ढांचे के नवीनीकरण और फरवरी 2026 में भारत द्वारा अतिरिक्त पी-8आइ नेप्च्यून विमान खरीदने की स्वीकृति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि रक्षा सहयोग दोनों देशों के संबंधों की सबसे स्थायी धुरी बन चुका है लेकिन इसके भीतर तनाव और अविश्वास की महीन रेखाएं भी मौजूद हैं।पिछले साल अमरीका द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत शुल्क आरोपित करना, जिसमें रूस से तेल खरीदने पर अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क भी शामिल था, दोनों देशों के बीच राजनीतिक विश्वास को आहत कर गया। यद्यपि बाद में अंतरिम व्यापार समझौते की दिशा में प्रगति हुई और शुल्कों में कुछ नरमी आई, फिर भी व्यापार अब भी दोनों संबंधों का सबसे संवेदनशील क्षेत्र बना हुआ है। अमरीका चाहता है कि भारत अपने बाजारों को अधिक उदार बनाए, विशेषकर कृषि, डेयरी और निवेश क्षेत्रों में। दूसरी ओर, भारत अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था, किसानों और लघु उद्योगों की सुरक्षा को लेकर सतर्क है। इस संबंध का एक अन्य जटिल आयाम भारत-पाकिस्तान समीकरण भी है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद ट्रम्प के युद्धविराम संबंधी दावों ने नई दिल्ली को असहज किया, जबकि पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर के साथ ट्रम्प प्रशासन की बढ़ती निकटता और ईरान-अमरीका वार्ताओं में पाकिस्तान की भूमिका ने भारत में संदेह बढ़ाया। इसी कारण भारत अब अमरीका के साथ रिश्तों को भावनात्मक भरोसे नहीं, बल्कि रणनीतिक संतुलन के आधार पर देख रहा है।
कोलकाता से वाशिंगटन तक बदले रिश्तों के मायने
इस साल की शुरुआत से मोदी और ट्रम्प के बीच नियमित दूरभाष संवाद तथा रक्षा और विदेश मंत्रालय के उच्च अधिकारियों की यात्राओं ने संबंधों को नई गति दी है। कभी कोलकाता वामपंथी आंदोलनों और अमरीका-विरोधी प्रदर्शनों का दुर्ग माना जाता था। नवंबर 1968 में वियतनाम युद्ध के विरोध में अमरीकी रक्षा सचिव रॉबर्ट मैकनमारा को जिस जनाक्रोश का सामना करना पड़ा था, उसने वर्षों तक इस शहर को अमरीकी कूटनीतिक यात्राओं के मानचित्र से लगभग बाहर कर दिया। बाद में 2012 में हिलेरी क्लिंटन की यात्रा ने नए संवाद का संकेत दिया, किन्तु उसके बाद बंगाल फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र से दूर होता गया।
बांग्लादेश, भूटान और पूर्वोत्तर भारत से उसकी निकटता ने कोलकाता का वैश्विक महत्त्व बढ़ाया है। रुबियो की कोलकाता यात्रा पूर्वी भारत को वैश्विक निवेश, व्यापार और रणनीतिक गतिविधियों के नए केंद्र के रूप में मान्यता मिलने का संकेत होगी। हालांकि, क्वाड इस यात्रा के केंद्र में है। ट्रंप प्रशासन के दौरान इसकी गति धीमी पडऩे की आशंकाएं उभरी थीं, लेकिन चीन की आक्रामक समुद्री नीतियों और हिंद-प्रशांत में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने क्वाड की प्रासंगिकता फिर बढ़ा दी है। रुबियो की यह यात्रा उसी पुनर्सक्रियता का संकेत मानी जा रही है। साथ ही, यह भारतीय कूटनीतिज्ञों के लिए हालिया अमरीकी-चीन शिखर वार्ता की प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त करने का महत्त्वपूर्ण अवसर भी साबित हो सकती है। विश्व आज उस मोड़ पर खड़ा है, जहां राष्ट्र केवल विचारधाराओं से नहीं, बल्कि हितों की धधकती भट्टियों में आकार ले रहे हैं। भारत और अमरीका के संबंध भी उसी अग्निकुंड से गुजर रहे हैं। किन्तु अमरीका यह भी समझ रहा है कि एशिया में शक्ति संतुलन भारत के बिना संभव नहीं। इसलिए मार्को रुबियो की भारत यात्रा उस नए विश्व-मानचित्र की प्रस्तावना है, जिसमें हिंद-प्रशांत की दिशा और भारत-अमरीका संबंधों का भविष्य पुनर्परिभाषित होने जा रहा है।
Updated on:
22 May 2026, 5:05 PM IST
Published on:
22 May 2026, 5:04 PM IST
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