
लंबी बीमारी के दौरान कई बार मौत को मात देने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने आखिरकार 'काल के कपाल पर’ लिखने-मिटाने का सिलसिला हमेशा के लिए खत्म कर दिया। अपना 72वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा देश तभी अनहोनी की आशंका से गमगीन हो गया था जब अपने समय के सर्वाधिक चहेते नेता की हालत बेहद नाजुक होने की सूचना मिली। इसके एक दिन बाद ही आशंका सच हो गई। वाजपेयी का जीवन विरोधाभासों के बीच राजनीति में सच्चाई, मानवीयता और सदाशयता के लिए रास्ता निकालते रहने की मिसाल के तौर पर याद किया जाएगा।
लोकसभा में अपने पहले भाषण के बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनमें भावी प्रधानमंत्री की छवि देखी थी। बाद में तीन बार प्रधानमंत्री बनकर उन्होंने नेहरू की भविष्यवाणी को न सिर्फ सच किया बल्कि, सही मायनों में कांग्रेस के उत्तराधिकार को चुनौती भी दी। गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने वाले एकमात्र शख्स रहे वाजपेयी ने पहली बार देश को यह भरोसा दिलाया कि कोई अन्य राजनीतिक दल भी बेहतर विकल्प हो सकता है। आज अगर केंद्र में बहुमत की भाजपा सरकार है तो उसकी नींव वाजपेयी ने ही रखी।
कोई आश्चर्य नहीं कि अपना कार्यकाल पूरा करने की ओर अग्रसर दूसरे गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 72वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के अवसर पर लालकिले से संबोधन में अटल की नीतियों को दोहराया। अटल की कश्मीर नीति पर चलने की बात कहते हुए उन्होंने इंसानियत का हवाला देकर हर समस्या को गले लगाकर समाधान खोजने की इच्छा व्यक्त की। यदि वाकई मोदी कश्मीर सहित विभिन्न विवादित मुद्दों पर वाजपेयी के रास्ते पर आगे बढते हैं तो यह अतिवादी दक्षिणपंथ की चुनौती को स्वीकार करना भी होगा। वाजपेयी ने अपने समय में कई बार इस चुनौती को स्वीकार किया था। यही वजह थी कि पाकिस्तान के साथ अमन की राह पर आगे बढ़ते हुए जब लाहौर तक बस यात्रा की थी तब वह अतिवादी संगठनों के निशाने पर आ गए थे। अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद भी ये वाजपेयी ही थे जिन्होंने पार्टी की नाराजगी की परवाह नहीं की। गुजरात दंगों के दौरान उनका 'राजधर्म' की सीख देना भी काफी चर्चा में रहा था।
इसमें कोई शक नहीं कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देशहित को सर्वोपरि रखने के जितने और जैसे उदाहरण वाजपेयी ने पेश किए हैं, वर्तमान राजनीति में दूसरा मिलना मुश्किल है। सबको साथ लेकर चलने वाली इस शख्सियत का ही कमाल था कि गठबंधन सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर सकी थी। ऐसे समय में जब राजनीति का स्तर गिराने की होड़ लगी हो हम सिर्फ यह उ्मीद कर सकते हैं कि कभी न कभी 'अंधेरा छंटेगा और...। चुनावी राजनीति का कमल भले ही देश में खिल चुका हो पर वाजपेयी कमल की ऐसी कोंपल हैं जिसका खिलना अब भी बाकी है। वह भले ही सशरीर हमारे बीच नहीं रहेंगे पर विचार रूप में उन्हें विदा कर पाना असंभव होगा।