
MentalHealthMatters
डॉ. प्रतिभा विजय
रिलेशनशिप और मेंटल हेल्थ काउंसलर
कई बार हम किसी आदमी को देखकर यह मान लेते हैं कि वह ठीक है। क्योंकि वह रोज काम पर जा रहा है, घर चला रहा है, परिवार के साथ बैठकर हंस रहा है, बच्चों की जरूरतें पूरी कर रहा है, माता-पिता का ध्यान रख रहा है। बाहर से देखने पर सब सामान्य लगता है। लेकिन सच यह है कि हर सामान्य दिखने वाला आदमी अंदर से भी सामान्य हो, यह जरूरी नहीं। बहुत से पुरुष ऐसे होते हैं जो हर दिन एक ऐसी मानसिक लड़ाई लड़ रहे होते हैं जिसके बारे में वे किसी से बात तक नहीं कर पाते। वे टूटते हैं, डरते हैं, घबराते हैं, रातों को जागते हैं, अपने भविष्य को लेकर परेशान रहते हैं, लेकिन फिर भी सुबह उठकर मुस्कुरा देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने अपनी कमजोरी दिखा दी तो पूरा घर टूट जाएगा।
बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि एक पुरुष के अंदर कितनी अधूरी इच्छाएं दबकर रह जाती हैं। धीरे-धीरे वह खुद ही अपने ऊपर जिम्मेदारियों का इतना बड़ा बोझ ले लेता है कि उसे अपनी खुशियों के बारे में सोचना भी गलत लगने लगता है। वह अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को मारना शुरू कर देता है ताकि परिवार की जरूरतें पूरी हो सकें। कई बार वह अपनी पसंद की चीज नहीं खरीदता क्योंकि बच्चों की फीस पहले देनी है। कई बार वह अपनी थकान छिपाकर काम करता रहता है क्योंकि घर का खर्च रुक नहीं सकता। कई बार वह अपने सपनों को पीछे छोड़ देता है ताकि माता-पिता की उम्मीदें टूटें नहीं, पत्नी की जरूरतें अधूरी न रहें और बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहे। धीरे-धीरे वह इतना जिम्मेदार बन जाता है कि खुद को इंसान नहीं, सिर्फ एक जिम्मेदारी समझने लगता है। सबसे दर्दनाक बात यह होती है कि लोग उसकी जिम्मेदारियां तो देख लेते हैं, लेकिन उन जिम्मेदारियों के नीचे दबा हुआ उसका मन नहीं देख पाते।
नहीं मिलता अपनों का साथ
एक आदमी की जिंदगी बाहर से जितनी आसान दिखाई देती है, अंदर से उतनी ही भारी हो सकती है। सुबह आंख खुलते ही उसके दिमाग में सिर्फ अपनी नहीं, पूरे परिवार की चिंता चलने लगती है। घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, माता-पिता की दवाइयां, पत्नी की उम्मीदें, समाज की बातें, नौकरी का डर, कारोबार का दबाव, यह सब एक साथ उसके दिमाग में चलता रहता है। अगर वह नौकरी करता है तो उसे डर होता है कि कहीं नौकरी चली गई तो क्या होगा। अगर व्यापार करता है तो हर नुकसान उसके आत्मविश्वास को अंदर तक हिला देता है। लेकिन सबसे दर्दनाक बात यह है कि वह यह सब किसी से कह भी नहीं पाता। क्योंकि उसे लगता है कि अगर वह खुद ही कमजोर पड़ गया तो बाकी सबको कौन संभालेगा।
कई पुरुषों की जिंदगी का सबसे अकेला सच यह भी होता है कि उन्हें कई बार अपने ही घर में वह साथ नहीं मिलता जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है। दिन-रात मेहनत करने के बाद, परिवार के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा देने के बाद भी जब वह घर लौटता है तो उसके पास कोई ऐसा नहीं होता जो दो मिनट बैठकर उससे पूछे, ‘आज तुम्हारा दिन कैसा था?’ कई पुरुष ऐसे होते हैं जो पूरे दिन बाहर की दुनिया से लड़ते हैं, लोगों की बातें सुनते हैं, काम का दबाव सहते हैं, आर्थिक परेशानियों से जूझते हैं, लेकिन रात को घर आकर भी अकेले ही रह जाते हैं। कई बार उन्हें अपनी पत्नी से वह अपनापन, वह सम्मान, वह साथ नहीं मिल पाता जिसकी उन्हें उम्मीद होती है। उन्हें सिर्फ जिम्मेदारियों की तरह देखा जाता है, इंसान की तरह नहीं। वे चुपचाप खाना खाते हैं, चुपचाप कमरे में जाकर लेट जाते हैं और फिर बिना किसी से अपने मन की बात किए सो जाते हैं। कोई उनके पास बैठकर यह नहीं पूछता कि क्या वह अंदर से ठीक हैं या नहीं। कोई उनकी थकान को महसूस नहीं करता। कोई यह नहीं समझता कि हर समय मजबूत दिखने वाला इंसान भी कभी-कभी सिर्फ किसी अपने के साथ बैठकर दो बातें करना चाहता है। यही अकेलापन धीरे-धीरे आदमी को अंदर से तोडऩे लगता है। उसे महसूस होने लगता है कि शायद उसकी जरूरत सिर्फ तब तक है जब तक वह सबकी जिम्मेदारियां निभा रहा है।
पिता की जिंदगी यानी खामोश कुर्बानियां
बहुत बार एक पुरुष का दर्द उसके अपने घर में भी समझा नहीं जाता। जब वह तनाव में होता है तो वह चुप हो जाता है। बातचीत कम कर देता है। लोगों से दूरी बनाने लगता है। लेकिन घर में इसे अक्सर गलत समझ लिया जाता है। पत्नी को लगता है कि अब वह पहले जैसा नहीं रहा, उसे परवाह नहीं है, वह बदल गया है। माता-पिता सोचते हैं कि बेटा अब दूर हो गया है। बच्चे सिर्फ इतना देखते हैं कि पापा पहले जितना हंसते नहीं हैं। लेकिन कोई यह नहीं समझ पाता कि वह आदमी अंदर ही अंदर किस चीज से गुजर रहा है। कई बार वह किसी से लड़ नहीं रहा होता, वह सिर्फ खुद से लड़ रहा होता है।
एक पिता की जिंदगी को अगर ध्यान से देखा जाए तो उसमें बहुत सारी खामोश कुर्बानियां छिपी होती हैं। वह अपने बच्चों के सामने कभी यह नहीं दिखाना चाहता कि वह डरता है या टूटता है। वह चाहता है कि उसके बच्चे उसे हमेशा मजबूत देखें। इसलिए वह अपनी तकलीफों को छिपाकर सामान्य बने रहने की कोशिश करता है। वह बच्चों के साथ खेलता है, उन्हें घुमाने ले जाता है, उनकी हर जरूरत पूरी करने की कोशिश करता है, लेकिन रात को वही इंसान अकेले बैठकर भविष्य की चिंता में डूब जाता है। उसे डर होता है कि कहीं वह अपने बच्चों को वह जिंदगी न दे पाए जिसके वे हकदार हैं। यही डर धीरे-धीरे उसके अंदर घबराहट, बेचैनी और मानसिक थकान में बदलने लगता है।
नहीं दिखाई देता पुरुषों का मानसिक दर्द
बहुत से पुरुष ऐसे भी होते हैं जो हर किसी की उम्मीदों के बीच खुद को खो देते हैं। माता-पिता चाहते हैं कि बेटा हर जिम्मेदारी निभाए। पत्नी चाहती है कि वह भावनात्मक रूप से हर समय मौजूद रहे। बच्चे चाहते हैं कि पिता हमेशा उनके साथ खड़े रहें। समाज चाहता है कि आदमी सफल हो, मजबूत हो, कभी कमजोर न पड़े। और इन सबके बीच वह आदमी खुद से इतना दूर हो जाता है कि उसे अपनी खुशी, अपनी शांति और अपनी मानसिक स्थिति के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिलता। धीरे-धीरे वह अंदर से खाली महसूस करने लगता है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि पुरुषों का मानसिक दर्द अक्सर दिखाई नहीं देता। एक आदमी बाहर से बिल्कुल सामान्य दिख सकता है। वह रोज काम पर जा सकता है, लोगों से हंसकर बात कर सकता है, परिवार के साथ बैठ सकता है, लेकिन अंदर से वह पूरी तरह टूट चुका हो सकता है। कई पुरुषों का तनाव गुस्से में बदल जाता है। कई लोग उन्हें चिड़चिड़ा या गुस्सैल समझते हैं, जबकि सच यह होता है कि वे लंबे समय से मानसिक दबाव में जी रहे होते हैं। कई पुरुष रात को ठीक से सो नहीं पाते, हर समय चिंता में रहते हैं, छोटी-छोटी बातों पर घबराने लगते हैं, लेकिन फिर भी किसी से मदद नहीं लेते क्योंकि उन्हें डर होता है कि लोग उन्हें कमजोर समझेंगे।
मुस्कान सिर्फ इसलिए जिससे दुनिया न पहचाने दर्द
यही डर धीरे-धीरे उन्हें अकेला कर देता है। वे अपनी बात कहना बंद कर देते हैं। लोगों से मिलना कम कर देते हैं। अपने दर्द को अंदर दबाते रहते हैं। और यही दबा हुआ दर्द एक दिन अवसाद, घबराहट और मानसिक टूटन का रूप ले लेता है। दुख की बात यह है कि बहुत बार परिवार को तब पता चलता है जब स्थिति बहुत ज्यादा बिगड़ चुकी होती है।
समाज को यह समझने की जरूरत है कि मानसिक दर्द सिर्फ महिलाओं को नहीं होता, पुरुष भी उतनी ही गहराई से टूटते हैं। उन्हें भी सहारे की जरूरत होती है, उन्हें भी किसी ऐसे इंसान की जरूरत होती है जो बिना फैसला सुनाए उनकी बात सुन सके। हर आदमी को सलाह नहीं चाहिए होती, कई बार उसे सिर्फ इतना चाहिए होता है कि कोई उससे दिल से पूछे, ‘तुम सच में ठीक हो?’ पुरुषों को भी यह समझना होगा कि मदद लेना कमजोरी नहीं है। अपनी भावनाएं व्यक्त करना कमजोरी नहीं है। रो लेना कमजोरी नहीं है। अगर मन लगातार भारी रहता है, अगर हर समय बेचैनी रहती है, अगर जिंदगी बोझ लगने लगे, तो चुप रहना समाधान नहीं है। अपनी बात कहना, अपने दर्द को समझना और समय रहते मदद लेना ही सबसे बड़ी ताकत है। क्योंकि हर मुस्कुराता हुआ आदमी खुश हो, यह जरूरी नहीं। कई मुस्कानें सिर्फ इसलिए होती हैं ताकि दुनिया उसके दर्द को पहचान न सके।
Updated on:
20 Jul 2026 07:28 pm
Published on:
20 Jul 2026 07:28 pm
