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तो क्या अब असमानता शरीर और आयु की भी होगी?

यदि भविष्य में युवावस्था खरीदी जा सकेगी, तो समाज केवल अमीर और गरीब में नहीं बंटेगा, वह युवा अमीरों और समय से पहले बूढ़े हो जाने वाले गरीबों में भी विभाजित होगा। तब असमानता केवल आय और अवसरों की नहीं होगी, बल्कि शरीर और आयु की भी होगी। जिनके पास संसाधन होंगे वे समय को खरीद लेंगे और जिनके पास नहीं होंगे वे उसी समय के बोझ तले दबते रहेंगे।
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भारत

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Opinion Desk

Jul 20, 2026

HumanityFirst

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डॉ. मीना रानी
असिस्टेंट प्रोफेसर लोक प्रशासन विभाग, राजस्थान विवि

मनुष्य ने सदियों से अमरता का स्वप्न देखा है। कभी यह स्वप्न ऋषियों की तपस्या में दिखाई दिया, कभी रसायनविदों की प्रयोगशालाओं में और कभी मिथकों की कथाओं में। किंतु आज विज्ञान उस स्वप्न को प्रयोगशाला की मेज पर लाने का दावा कर रहा है। हाल ही में प्रकाशित समाचार के अनुसार पहली बार एक मानव पर ‘एंटी-एजिंग’ इंजेक्शन का परीक्षण किया गया है, जिसका उद्देश्य वृद्ध होती कोशिकाओं को पुन: युवा बनाना है। यह निस्संदेह विज्ञान की एक अद्भुत उपलब्धि हो सकती है। परंतु इस समाचार को पढ़ते हुए मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है, क्या सचमुच मानवता की सबसे बड़ी समस्या बुढ़ापा है?
धरती के एक कोने में वैज्ञानिक उम्र को थाम लेने की तैयारी कर रहे हैं, जबकि दूसरे कोने में करोड़ों लोग जीवन को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहीं अस्पतालों में बिस्तर नहीं हैं, कहीं दवाएं नहीं हैं, कहीं डॉक्टर नहीं हैं, तो कहीं भूख ही सबसे बड़ी बीमारी बनी हुई है। एक ओर मनुष्य अपनी युवावस्था को कुछ और वर्षों तक बढ़ाने का उपाय खोज रहा है, दूसरी ओर असंख्य लोग ऐसे हैं जिन्हें स्वस्थ जीवन के कुछ वर्ष भी नसीब नहीं।

प्रकृति का अपना लोकतंत्र
विडंबना देखिए कि जिस संसार में लाखों बच्चे कुपोषण से जूझ रहे हों, जहां प्रसूति के दौरान महिलाएं चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ देती हों, जहां साधारण उपचार के अभाव में जीवन बुझ जाता हो, वहीं विज्ञान का एक बड़ा निवेश उन लोगों की झुर्रियों को रोकने और उनकी आयु बढ़ाने में लगाया जा रहा है जिनके पास पहले से ही जीवन की अधिकांश सुविधाएं उपलब्ध हैं।
प्रकृति का अपना एक अद्भुत लोकतंत्र रहा है। उसने धन, पद और प्रतिष्ठा में भले समानता न दी हो, पर वृद्धावस्था का नियम सब पर समान रूप से लागू किया। समय की उंगलियां राजा और रंक दोनों के चेहरे पर एक-सी रेखाएं खींचती थीं। बुढ़ापा वह सत्य था जिसके सामने साम्राज्य भी झुकते थे और झोपडिय़ां भी। किंतु अब लगता है कि मनुष्य उस अंतिम समानता को भी समाप्त करने की तैयारी में है।

असमानता अब शरीर और आयु की भी
यदि भविष्य में युवावस्था खरीदी जा सकेगी, तो समाज केवल अमीर और गरीब में नहीं बंटेगा, वह युवा अमीरों और समय से पहले बूढ़े हो जाने वाले गरीबों में भी विभाजित होगा। तब असमानता केवल आय और अवसरों की नहीं होगी, बल्कि शरीर और आयु की भी होगी। जिनके पास संसाधन होंगे वे समय को खरीद लेंगे और जिनके पास नहीं होंगे वे उसी समय के बोझ तले दबते रहेंगे।
यह विज्ञान का विरोध नहीं है। विज्ञान तो मानव बुद्धि का सबसे उज्ज्वल प्रकाश है। प्रश्न केवल इतना है कि उस प्रकाश की दिशा क्या होनी चाहिए। क्या वह पहले उन घरों तक पहुंचे जहां अभी भी अंधेरा है या उन महलों को और अधिक रोशन करे जो पहले से जगमगा रहे हैं?

विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि, मानवता के लिए असहज प्रश्न
सभ्यता की परिपक्वता का माप इस बात से नहीं होगा कि उसने अमीरों की युवावस्था कितनी लंबी कर दी, बल्कि इस बात से होगा कि उसने गरीबों को सम्मानजनक और स्वस्थ जीवन कितना उपलब्ध कराया। जब तक संसार का अंतिम व्यक्ति भी उपचार, पोषण और स्वास्थ्य के अपने अधिकार से वंचित है, तब तक एंटी-एजिंग की चमक के पीछे एक गहरी नैतिक छाया बनी रहेगी।
कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढिय़ां यह लिखें कि मनुष्य ने मृत्यु को चुनौती देने की कोशिश तो की, पर जीवन में व्याप्त असमानताओं को चुनौती देना भूल गया। तब विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि भी मानवता के लिए एक असहज प्रश्न बनकर रह जाएगी,क्या हमने प्रकृति को पराजित करने की जल्दबाजी में मनुष्य को ही पीछे छोड़ दिया?