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संपादकीयः आरटीई पर खींचतान, बच्चों की पढ़ाई पर असर

सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और पंजाब हैं। महाराष्ट्र में 8,651 स्कूलों के साथ भी 1.12 लाख सीटें उपलब्ध हैं, लेकिन बकाया के बहाने स्कूल टस से मस नहीं हो रहे। तमिलनाडु में पोर्टल बंद रखने और दिल्ली में प्रक्रिया लटकाने की वजह से लाखों बच्चे शिक्षा से वंचित हैं।

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Mar 20, 2026

निजी स्कूल और राज्य सरकारें शिक्षा का अधिकार (आरटीई) के 25% कोटे पर पिछले कई सालों से उलझी हुई हैं, इसलिए देश के लाखों बच्चे शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित रह गए हैं। दरअसल, लॉटरी में नाम आने के बावजूद अभिभावक स्कूलों के चक्कर काट रहे हैं, सड़कों पर अनशन कर रहे हैं, लेकिन न सरकारें बकाया चुकाती हैं न स्कूल दाखिला देते हैं। मुद्दे की बात यह है कि महाराष्ट्र में ही सरकार पर 2,200 करोड़ रुपए आरटीई के बकाया हैं, जिसके चलते निजी स्कूल आरटीई के तहत एडमिशन देने से बच रहे हैं। पुणे में पिछले 9 सालों में 325 स्कूलों ने 13,255 सीटें छोड़ दीं। तमिलनाडु में 1.5 लाख बच्चे प्रभावित हुए, जबकि दिल्ली में 2.09 लाख आवेदनों के मुकाबले हजारों सीटें खाली पड़ी हैं।

खास बात यह है कि पूरे देश में आरटीई कोटे की सीटें भरने की दर मात्र 20-25% है और हर साल लाखों सीटें खाली रह जाती हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और पंजाब हैं। महाराष्ट्र में 8,651 स्कूलों के साथ भी 1.12 लाख सीटें उपलब्ध हैं, लेकिन बकाया के बहाने स्कूल टस से मस नहीं हो रहे। तमिलनाडु में पोर्टल बंद रखने और दिल्ली में प्रक्रिया लटकाने की वजह से लाखों बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। गौर करें तो स्कूलों की कारगुजारियां और भी खतरनाक हैं- लॉटरी के बाद दाखिला न करना, आरटीई बच्चों से अलग क्लास चलाना, अतिरिक्त फीस वसूलना या फिर कोटे से पूरी तरह बाहर निकल जाना।

ये लालची प्रबंधन शिक्षा का अधिकार यानी आरटीई को 'मुफ्त शिक्षा' नहीं, बल्कि 'घाटे का सौदा' मानते हैं। सरकारें इसका समाधान कर सकती हैं, लेकिन उनके पास भी पैसों का रोना शुरू हो जाता है। सरकारें चाहें तो तुरंत बकाया चुकाकर, सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के मुताबिक बाइंडिंग नियम बनाकर समाधान कर सकती हैं, लेकिन राज्य सरकारें केंद्र का 60% हिस्सा भी रोककर बैठ जाती हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि देश-विदेश के कुछ मॉडल अपनाकर इस समस्या को समाप्त किया जा सकता है। स्वीडन में वर्ष 1992 से यूनिवर्सल वाउचर सिस्टम है, जहां फंड बच्चे के दाखिले के साथ ही स्कूल पहुंचता है। नीदरलैंड में वेटेड फंडिंग गरीब बच्चों के लिए ज्यादा दी जाती है। चिली का यूनिवर्सल वाउचर भी एक बेहतरीन मॉडल है। वहां समय पर भुगतान और सख्त रेगुलेशन हैं।

बड़ी बात यह है कि अगर सरकारें और स्कूल अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे तो देश के करीब 20 लाख आरटीई पात्र बच्चों का भविष्य बर्बाद होगा। केंद्र-राज्य सरकारें और निजी स्कूल प्रबंधन दोनों बच्चों का हक छीन रहे हैं। अब समय है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम का सख्ती से पालन किया जाए। सरकारें अपनी जिम्मेदारी समझें और समय पर फंड जारी करें एवं स्कूल प्रबंधन जरूरतमंद बच्चों को प्रवेश देकर अपना दायित्व निभाएं।

Published on:
20 Mar 2026 01:33 pm
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