भारतीय वैज्ञानिक, शिक्षक और शोधार्थी सार्वजनिक धन, सरकारी अनुदान और अपनी निजी बौद्धिक साधना से शोध तैयार करते हैं, लेकिन उस शोध को ‘वैध’ और ‘प्रतिष्ठित’ बनाने के लिए उन्हें विदेशी प्रकाशन तंत्र पर निर्भर होना पड़ता है। अनेक विश्लेषणों में यह चिंता सामने आई है कि भारत से विदेशी जर्नलों की ओर सदस्यता और प्रकाशन शुल्क के रूप में प्रतिवर्ष अरबों रुपए प्रवाहित हो रहे हैं।
डॉ. मुकेश शर्मा, स्वतंत्र लेखक एवं शोधार्थी
भारत आज वैश्विक शोध जगत में केवल एक सहभागी राष्ट्र नहीं, बल्कि एक उभरती हुई बौद्धिक शक्ति के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। पिछले एक दशक में भारतीय विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं और शोध-संस्थानों ने जिस गति से ज्ञान-सृजन किया है, उसने भारत को विश्व के प्रमुख शोध-उत्पादक देशों की पंक्ति में ला खड़ा किया है। ताजा अंतरराष्ट्रीय आकलनों में भारत की शोध उपस्थिति शीर्ष 10 देशों में दर्ज की गई है। यह स्थिति इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल जनसंख्या का नहीं, बल्कि 'ज्ञान-ऊर्जा' का देश बन रहा है।
किंतु इस उपलब्धि के साथ एक असहज प्रश्न भी खड़ा होता है, क्या हम ज्ञान का सृजन तो कर रहे हैं, पर उसका स्वामित्व, प्रतिष्ठा और आर्थिक लाभ अब भी विदेशी मंचों को सौंप रहे हैं? यहीं से भारतीय शोध व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। भारतीय वैज्ञानिक, शिक्षक और शोधार्थी सार्वजनिक धन, सरकारी अनुदान और अपनी निजी बौद्धिक साधना से शोध तैयार करते हैं, लेकिन उस शोध को ‘वैध’ और ‘प्रतिष्ठित’ बनाने के लिए उन्हें विदेशी प्रकाशन तंत्र पर निर्भर होना पड़ता है। अनेक विश्लेषणों में यह चिंता सामने आई है कि भारत से विदेशी जर्नलों की ओर सदस्यता और प्रकाशन शुल्क के रूप में प्रतिवर्ष अरबों रुपए प्रवाहित हो रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, केवल ओपन-एक्सेस प्रकाशन हेतु भारतीय शोधकर्ता सालाना करोड़ों रुपए 'आर्टिकल प्रोसेसिंग चार्ज' के रूप में विदेश भेज रहे हैं। यह हमारी बौद्धिक संपदा पर लगने वाला एक ऐसा 'अघोषित टैक्स' है, जो भारतीय मेधा के आर्थिक प्रतिफल से विदेशी प्रकाशन-तंत्र को सशक्त कर रहा है।
समस्या केवल धन की नहीं है, समस्या 'मान्यता' के मानकों की भी है। हमारे अकादमिक मूल्यांकन का ढांचा आज भी विदेशी प्रतिष्ठा-सूचकों के मोहपाश में है। नियुक्ति, पदोन्नति और संस्थागत रैंकिंग जैसी प्रक्रियाओं में शोध की गुणवत्ता का आकलन अक्सर इस आधार पर किया जाता है कि वह किस विदेशी 'इम्पैक्ट फैक्टर' वाले जर्नल में छपा है। परिणाम यह होता है कि भारतीय शोधकर्ता अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए विदेशी मंचों की ओर भागता है। यह स्थिति बौद्धिक पराधीनता का आधुनिक रूप है, जहां ज्ञान का सृजन तो स्वदेशी है, पर उसकी 'मुहर' विदेशी है।
भारत सरकार की वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन की पहल ने इस परिदृश्य में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। वर्ष 2025 से प्रभावी इस योजना के प्रथम चरण में हजारों जर्नलों तक पहुंच करोड़ों विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को उपलब्ध कराई गई है। यह कदम ऐतिहासिक है, क्योंकि इससे ज्ञान तक पहुंच का लोकतंत्रीकरण हुआ है। लेकिन यहां एक बुनियादी अंतर समझना होगा- 'पहुंच' और 'प्रकाशन ही बात नहीं हैं। वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन ने 'पढऩे' की बाधा को तो कम किया है, लेकिन 'लिखकर प्रकाशित करने' की आर्थिक और ढांचागत बाधा अब भी वैसी ही बनी हुई है।
यही कारण है कि भारत को अब शोध-नीति के अगले चरण में प्रवेश करना होगा। यदि
हम केवल विदेशी जर्नलों को पढ़ेंगे और फिर अपना सर्वश्रेष्ठ शोध उन्हीं को महंगे शुल्क देकर सौंप देंगे, तो हम ज्ञान-अर्थव्यवस्था के 'निर्माता' नहीं, महज 'उपभोक्ता' बने रहेंगे। एक आत्मविश्वासी राष्ट्र को न केवल उत्कृष्ट शोध करना चाहिए, बल्कि ऐसे स्वदेशी प्रकाशन संस्थान भी खड़े करने चाहिए जो गुणवत्ता, पारदर्शिता और वैश्विक विश्वसनीयता के आधार पर अंतरराष्ट्रीय सम्मान अर्जित करें।
इसके लिए कुछ कठोर लेकिन आवश्यक कदमों की जरूरत है। भारत को अपने शोध-मूल्यांकन तंत्र में सुधार करना होगा, ताकि गुणवत्ता का आकलन केवल विदेशी ब्रांड-नामों से न हो। हमें ऐसे उच्च-स्तरीय और विश्वसनीय भारतीय जर्नल प्लेटफॉर्म विकसित करने होंगे, जहां सार्वजनिक धन से वित्तपोषित शोध का प्रकाशन सार्वजनिक हित में हो, न कि निजी वैश्विक प्रकाशन-व्यवसाय के लाभ के लिए।
यह आत्मनिर्भरता किसी प्रकार का बौद्धिक एकांतवाद नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत वैश्विक मंचों से अलग हो जाए, बल्कि इसका अर्थ यह है कि भारत अपने ज्ञान का मूल्यांकन दूसरों की मुहर से नहीं, अपने संस्थागत आत्मविश्वास से करे। वैश्विकता का अर्थ 'साझेदारी' होना चाहिए, 'पराधीनता' नहीं। भारत ने शोध-सृजन में अपनी क्षमता सिद्ध कर दी है, अब अगली चुनौती उस ज्ञान का स्वामित्व, प्रतिष्ठा और प्रसार अपने हाथ में लेने की है।भारत को अब केवल नॉलेज प्रोड्यूसर नहीं बल्कि नॉलेज सोवेरियन (ज्ञान-संप्रभु) बनने की दिशा में बढऩा होगा। यही ज्ञान-आधारित आत्मनिर्भर भारत की सच्ची कसौटी है।