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संपादकीय: लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन से अटकता विकास

निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के अभाव में व्यवस्था प्रशासनिक अधिकारियों के भरोसे छोडऩे को उचित नहीं कहा जा सकता।
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May 26, 2026
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पंचायतराज संस्थाओं और शहरी निकायों में पांच साल का कार्यकाल पूरा होने पर चुनाव कराने की संवैधानिक बाध्यता है। लेकिन इस अनिवार्यता की पालना नहीं करने की सरकारों की प्रवृत्ति ने पांच राज्यों के गांवों व शहरों में विकास कार्यों में जिस तरह से बाधा डाली है वह चिंताजनक है। केंद्र सरकार ने नियमित चुनाव नहीं कराने पर इन संस्थानों को दी जाने वाली मदद या तो रोक दी है अथवा उसे सीमित कर दिया है। राजस्थान सहित पांच राज्यों में पिछले तीन साल में पंचायत चुनाव नहीं होने के कारण ६५०० करोड़ रुपए का अनुदान रुका है। चिंता की बात यही है कि राज्यों में जो सत्ता में हैं वे अलग-अलग कारणों का हवाला देते हुए निकाय व पंचायत संस्थानों के चुनाव टाल रहे हैं। राजस्थान में हाईकोर्ट ने अब चुनाव कराने की मियाद तक तय कर दी है।

राजनीतिक स्वार्थ व कानूनी दांव-पेचों के चलते चुनाव टालने की यह आत्मघाती प्रवृत्ति न केवल हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर कर रही है, बल्कि विकास की गति को भी अवरुद्ध कर रही है। केंद्रीय वित्त आयोग और केंद्रीय मंत्रालयों के कड़े नियमों के मुताबिक, यदि स्थानीय निकायों में जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि मौजूद नहीं हैं, तो पूरा फंड जारी नहीं किया जाएगा। इस वित्तीय गतिरोध के चलते गांवों और शहरों में बुनियादी विकास कार्य ठप पड़े हैं, जिससे सीधे तौर पर आम जनता प्रभावित हो रही है। संविधान में स्थानीय सरकारों के लिए पांच वर्ष का कार्यकाल सुनिश्चित है और संकट की स्थिति में भी छह महीने के भीतर चुनाव कराने का अनिवार्य नियम है। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के अभाव में व्यवस्था प्रशासनिक अधिकारियों के भरोसे छोडऩे को उचित नहीं कहा जा सकता। यह प्रवृत्ति सत्ता के केंद्रीकरण की ओर भी स्पष्ट इशारा करती है। हैरत की बात यह है कि कोरोना महामारी दौर में भी उत्तरप्रदेश में सरकार ने अप्रेल-मई 2021 में, ग्राम पंचायत चुनाव कार्र्यकाल पूरा होने पर करा दिए थे। लेकिन वहां भी अब ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने पर प्रशासक बैठाने की तैयारी की जा रही है। संवैधानिक प्रावधान भले ही कुछ और कहते हैं लेकिन सरकारों ने ठान लिया है कि वे चाहेंगी तब ही चुनाव कराएंगी। इस लेटलतीफी का जनता को दोहरा नुकसान होता है। विकास कार्यों में बाधा तो आती ही है जनप्रतिनिधि नहीं होने से छोटी-छोटी परेशाानियों के लिए प्रशासनिक तंत्र का मुंह ताकना पड़ता है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाने वाले भारत में निर्वाचित जनप्रतिनिधि स्थानीय शासन व्यवस्था को जीवंत बनाते हैं। संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद चुनाव समय पर नहीं कराना चिंता का विषय है। जब तक सीटों के रोटेशन, आरक्षण और चुनाव तिथियों के निर्धारण का पूरा अधिकार राज्य चुनाव आयोग को स्वायत्त रूप से नहीं मिलेगा, तब तक सरकारें अपने स्तर पर फैसले करती रहेंगी। राज्य सरकारों को राजनीतिक संकीर्णता से ऊपर उठकर समय पर चुनाव सुनिश्चित करने चाहिए।

Updated on:
26 May 2026 05:26 pm
Published on:
26 May 2026 05:26 pm