
जिस देश की सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुई, जिसने हजारों वर्षों पहले बावडिय़ां, तालाब, कुएं और जल-संरक्षण की सामुदायिक प्रणालियां विकसित कीं, वही देश आज पानी के लिए टैंकरों और हजारों फीट गहरे बोरवेल पर निर्भर होता जा रहा है। भारत के सामने भूजल का सबसे बड़ा खतरा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2025 के नवीनतम आकलन के अनुसार देश में प्रतिवर्ष लगभग 448.52 अरब घन मीटर भूजल का पुनर्भरण होता है, जबकि लगभग 407.75 अरब घन मीटर वार्षिक रूप से निकाला जा सकने वाला भूजल संसाधन है। इसके मुकाबले वास्तविक वार्षिक भूजल दोहन 247.22 अरब घन मीटर तक पहुंच गया है। राष्ट्रीय स्तर पर दोहन की अवस्था 60.63 प्रतिशत है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि भूजल दोहन में सबसे बड़ा हिस्सा कृषि का है। 2024 के आकलन में देश के कुल भूजल दोहन का लगभग 87 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में गया। यहां किसान को दोषी ठहराना आसान है, लेकिन समस्या केवल किसान की नहीं है। हमने ऐसी कृषि नीति बनाई, जिसमें अधिक पानी वाली फसलों को प्रोत्साहन मिला, बिजली सस्ती या मुफ्त हुई, सिंचाई का वास्तविक मूल्य गायब हुआ और भूजल को निजी खेत की मुफ्त संपत्ति जैसा समझ लिया गया। पंजाब इसका उदाहरण है। वहां मुफ्त बिजली और ट्यूबवेल आधारित कृषि ने भूजल दोहन को तेज किया। शोधों में पंजाब में भूजल दोहन और गिरते जलस्तर को कृषि बिजली नीति तथा धान-गेहूं आधारित व्यवस्था से जोड़ा गया है।
किसान अकेला दोषी नहीं है। शहरों ने भी जल की हत्या की है। रायपुर को कभी तालाबों का शहर कहा जाता था। केंद्रीय भूजल बोर्ड के रायपुर शहरी क्षेत्र संबंधी दस्तावेज में ऐतिहासिक रूप से 123 तालाबों का उल्लेख है, जो वर्षाजल संचयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। अब इनकी संख्या लगभग 42 बताई गई है। अन्य ऐतिहासिक स्रोतों में रायपुर में इससे भी अधिक तालाबों की संख्या दर्ज मिलती है। अलग-अलग स्रोतों में आंकड़े अलग हैं, लेकिन कहानी एक ही है तालाब घटे, कंक्रीट बढ़ा।समस्या यह है कि हम भूजल को बैंक की तरह निकाल रहे हैं, लेकिन उसमें जमा कुछ नहीं कर रहे। अब इस संकट में जलवायु परिवर्तन एक नया और भयावह अध्याय जोड़ रहा है। अब ऊर्जा संक्रमण को भी पानी के प्रश्न से अलग करके नहीं देखा जा सकता। सौर ऊर्जा निश्चित रूप से जीवाश्म ईंधनों की तुलना में कम जल-गहन बिजली विकल्पों में है, लेकिन बड़े सौर पार्कों के लिए भूमि परिवर्तन, स्थानीय जल-निकासी, पैनलों की सफाई और विशेष रूप से निर्माण प्रक्रिया के जल-पदचिह्न पर विचार जरूरी है। सौर ऊर्जा का विस्तार जल-सुरक्षा के विरुद्ध नहीं होना चाहिए, लेकिन जल-संवेदनशील भूमि पर उसकी योजना भी नहीं होनी चाहिए। इसी तरह एथेनॉल को केवल पेट्रोल में कमी और विदेशी मुद्रा बचत के चश्मे से देखना अधूरा राष्ट्रीय हिसाब है। नीति आयोग के अध्ययन में बताया गया कि गन्ना अत्यधिक जल-गहन फसल है और उसके आधार पर एक लीटर एथेनॉल के लिए लगभग 3,000 लीटर पानी तक का जल-पदचिह्न सामने आता है। बाद के नीति विश्लेषणों में मक्का और चावल आधारित एथेनॉल के जल-पदचिह्न को भी गंभीर बताया गया है। इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि एथेनॉल अच्छा है या बुरा। प्रश्न होना चाहिए कि हम एक लीटर वैकल्पिक ईंधन के लिए कितने लीटर पानी खर्च कर रहे हैं और वह पानी कहां से आ रहा है? इसी तरह कृषि में भी सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किसान कितना उत्पादन कर रहा है। सवाल यह होना चाहिए कि एक किलो अनाज पैदा करने में कितना पानी खर्च हो रहा है।
भारत ने जल संरक्षण के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं।
भूजल पुनर्भरण, जल शक्ति अभियान, अमृत सरोवर, सूक्ष्म सिंचाई, वर्षाजल संचयन और जलभृत प्रबंधन जैसे प्रयास हो रहे हैं। सरकार अब भूजल संसाधनों का वार्षिक आकलन भी कर रही है, लेकिन प्रयासों और संकट के आकार में अब भी बड़ा अंतर है। हमें जल संरक्षण को योजना और अभियान से निकालकर कृषि नीति, ऊर्जा नीति, शहरी नियोजन और औद्योगिक नीति के केंद्र में रखना होगा। किसान को केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि पानी बचाइए। उसे ऐसी फसल नीति, मूल्य नीति और बिजली नीति देनी होगी, जिसमें पानी बचाने वाला किसान आर्थिक रूप से भी लाभ में रहे। धान की जगह कम पानी वाली फसलों को अपनाने पर केवल सलाह नहीं, सुनिश्चित बाजार और बेहतर मूल्य चाहिए। गांवों में हर खेत के लिए वर्षाजल रोकने की योजना बनानी होगी। खेत-तालाब, मेड़बंदी, कंटूर बंडिंग, छोटे जलाशय, पारंपरिक तालाब और सामुदायिक जल-संरचनाओं को पुनर्जीवित करना होगा। शहरों में हर नई इमारत को वर्षाजल संचयन से जोडऩा होगा और तालाबों के कैचमेंट क्षेत्र को कानूनी सुरक्षा देनी होगी।
धरती के भीतर जमा जल किसी सरकार की संपत्ति नहीं, आने वाली पीढिय़ों की अमानत है। 23 अगस्त से शुरू हुआ विश्व जल सप्ताह हमें केवल जल पर भाषण देने का अवसर नहीं देता। यह आत्मपरीक्षण का अवसर है। हमें तय करना होगा कि हम अगली पीढ़ी को कैसी धरती देंगे। ऐसी धरती, जिसमें हजारों फीट नीचे जाकर भी पानी न मिले या ऐसी धरती जहां वर्षा की हर बूंद को सम्मान मिले? भारत की अगली कृषि-क्रांति पानी की हर बूंद की कीमत समझने वाली कृषि होगी। यदि हमने अब भी वर्षाजल को बहने दिया, तालाबों को मिटने दिया, भूजल को पंपों से खाली किया और जल-गहन कृषि तथा औद्योगिक नीतियों को बिना 'जल-पदचिह्न' (वाटर फुटप्रिंट) देखे आगे बढ़ाया, तो आने वाले वर्षों में भारत की सबसे बड़ी समस्या खाद्य सुरक्षा नहीं, खाद्य पैदा करने के लिए पानी की उपलब्धता होगी।