
डॉ. विवेक एस. अग्रवाल
हालांकि अंग्रेजों के शासन से मुक्ति को 79 वर्ष हो गए हैं, लेकिन उनसे विरासत में मिली अंग्रेजी अब भी भारतीय मातृ भाषाओं से श्रेयस्कर मानी जाती है। आलम यह है कि शराब और दवाओं से लेकर खानपान, पहनावे और जीवन के हर पहलू में चाहे न चाहे श्रेष्ठता का पैमाना अंग्रेजियत को ही माना जाता है। सभ्यता की नींव का दारोमदार संभाले शिक्षण पद्धति में भी अंग्रेजी माध्यम को अन्य राजकीय भाषाओं की अपेक्षा बेहतर माना जाता है। कुतर्क यह दिए जाते हैं कि वैश्विक पहचान और सम्पर्क के लिए अंग्रेजी नितांत आवश्यक है। किंतु, अनेकानेक देश जैसे चीन, फ्रांस, जापान, रूस, स्पेन समेत अब भी अपनी मातृभाषा पर न सिर्फ गौरव करते हैं अपितु व्यवहार में भी अपनाते हैं।
तार्किक दृष्टि से कभी यह स्थापित नहीं हो पाया कि अंग्रेजी के बिना विकास चक्र रुक जाएगा। यदि ऐसा होता तो चीन आदि देश कैसे उत्तरोत्तर वृद्धि कर पाते। हालांकि भारत के हर कोने में कमोबेश अंग्रेजी की ग़ुलामी बरकरार है, लेकिन विशेषतौर पर उत्तरी एवं पश्चिमी हिस्सों में तो किसी भी वस्तु की बिक्री तक में अंग्रेजियत से जुड़े होने का सहारा ले लिया जाता है। इस संदर्भ में शराब और दवा के साथ अंग्रेजी होने का उल्लेख अत्यंत हास्यास्पद प्रतीत होता है। जहां तक एलोपैथी यानी तथाकथित अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति का प्रश्न उठता है, उसका जन्म जर्मनी में हुआ था और कालांतर में यह दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुंच गई। इसी प्रकार उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार शराब यानी अल्कोहलिक पेय का जन्म ईसा से 7000 वर्ष पूर्व चीन में हुआ। उसके यह जॉर्जिया, मध्य पूर्वी देशों, मेसोपोटामिया होते हुए दुनिया के अन्य हिस्सों तक पहुंच गया। ऐसे में उसे अंग्रेजी शराब मानना तर्कहीनता है।
जीवनशैली के अनेकानेक अवयवों को अंग्रेजी करार देना मात्र औपनिवेशिक विरासत का महिमा मंडन करना है। लंबी गुलामी के चलते वर्तमान पीढ़ी को आदर्श मानने के लिए ब्रिटिश हुक्मरान का जीवन ही इतिहास के माध्यम से प्राप्त हुआ। उनके अफसरों द्वारा अपनाई गई खानपान, परिधान और हर प्रकार की पद्धति को श्रेष्ठता के साथ स्वीकार करने के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी वही जीवनशैली अपनाई जाती रही। इसके पीछे तथ्यात्मक आंकलन करें तो शैशवकाल से शिक्षा एवं अन्य माध्यमों से भारतीय जीवनपद्धति से अधिक गुलामी के बाबत अत्यधिक चर्चा एवं साहित्य सृजन बहुत हद तक दोषी है। चीन समेत अनेक देश किसी न किसी कालखंड में अन्य देशों के औपनिवेशिक सत्ता के दौर से गुजरे हैं, किंतु उससे आजादी के बाद, उन्होंने तत्संबंधी चर्चाओं, इतिहास को तवज्जो नहीं देते हुए स्वयं को विकसित कर नया इतिहास रचने पर जोर दिया। लेकिन, हमारे देश में लगभग आठ दशक बाद अंग्रेजी का दबदबा न सिर्फ कायम है, अपितु बढ़ता ही जा रहा है। जिस प्रकार ब्रिटिश हुकूमत की शासन पद्धति बांटो और राज करो की होती थी, उसी प्रकार आज भी भाषा और संस्कृति के नाम पर विवादों को बल दिया जाता है। दुर्भाग्यवश, इन सब विवादों में बुनियादी रूप से हिंदी का विरोध प्रमुखता से होता है, लेकिन कहीं भी अंग्रेजी की खिलाफत देखने को नहीं मिलती। कई मायनों में तो अब भी औपनिवेशिक प्रक्रियाओं का बिना किसी तर्क और सार्थकता के यथावत पालन किया जाता है। जिस प्रकार उस कालखंड में भारतीयों को दकियानूसी और पुरातनपंथी कह उपेक्षित किया जाता था, उसी प्रकार आज भी अंग्रेजी में किए गए संवाद को गंभीर मानते हुए ज़्यादा ध्यानपूर्वक सुना और पढ़ा जाता है। हाल यह है कि वर्तमान पीढ़ी यह प्रदर्शित करने में गर्व महसूस करती है कि उन्हें अपनी मातृभाषा नहीं आती और घरों से भी आपसी संवाद में स्थानीय भाषा का प्रचलन लुप्त होते जा रहा है। अंग्रेजी को अव्वल स्थान पर रखने के लिए अनेकानेक व्यक्ति उस भाषा का कदाचित् ज्ञान न होने के बावजूद हॉलीवुड सिनेमा बिना समझे ही यह प्रदर्शित करने को देखते हैं कि वह बेहतर होती है।
दैनंदिन के व्यवहार में भी अंग्रेजी का बोलबाला सिर चढक़र बोलता है। बाजारों की तरफ नजर डालें तो दुकानों की नाम पट्टिका के साथ उनका ब्यौरा भी अंग्रेजी में ही मिलता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार मात्र लगभग तीन लाख की प्राथमिक तथा साढ़े आठ करोड़ लोगों की द्वितीयक मातृ भाषा अंग्रेजी है। कुल मिलाकर भारत की करीब 10 प्रतिशत आबादी ही अंग्रेजी भाषी है। ऐसे में बहुसंख्यक आबादी पर अंग्रेजी थोपना मात्र गुलामी की विरासत को आगे बढ़ाना है। सामान्य जीवन में भी अंग्रेजी को प्रासंगिक बनाने के हर संभव यत्न किए जाते रहे हैं। यहां तक की सडक़ किनारे स्थित ढाबे के उपलब्ध खाने के विवरण (मेनू) से लेकर किसी भी सार्वजनिक उपयोग के स्थलों पर अंग्रेज़ी का वर्चस्व दिखता है। ऐसे ही पूर्णतया क्षेत्रीय भाषा में काम करने वाले पदों पर भर्ती के लिए अंग्रेजी ज्ञान को प्रमुखता और प्राथमिकता प्रदान की जाती है। यहां तक कि सभ्य समाज में तो आपसी वार्तालाप के लिए अंग्रेजी को ही उपयुक्त माना जाता है, चाहे वह कितनी ही अशुद्ध क्यों नहीं बोली जा रही हो या सामने वाले को समझ आ रही हो या नहीं। यानी, रौब गांठने के लिए अंग्रेजी में बोलना अवश्यंभावी होता है। नहीं बोलने अथवा बोल पाने की अवस्था में व्यक्ति हीनभावना से ग्रस्त हो जाता है। वास्तविकता यह है कि ग़ुलामी की मानसिकता के चलते अंग्रेज़ी में किए गए संबोधन उसका मायना ही बदल देते हैं, इसका सर्वाधिक प्रचलित उदाहरण डॉग और श्वान के मध्य मंडराता गरिमामय और दुत्कार का भाव है। यह सिर्फ मानसिकता का डीएनए है जो एक ही अर्थ लिए शब्दों को अलग मायना और स्थान प्रदान कर देता है। हर भाषा की अपनी महत्ता है और उसके उपयोग को कहीं भी कमतर नहीं आंका जा सकता। किंतु यदि उपयोग के पीछे आशय अन्य भाषा भाषियों के प्रति हीनभावना पैदा करना हो तो वह कदाचित नहीं किया जाना चाहिए। अंग्रेजी को विरासत ना मानते हुए संवाद साधन हेतु बिना किसी पूर्वाग्रह, भ्रम या आधिकारिक दबाव के उपयोग किए जाने में कोई बुराई नहीं है। औपनिवेशिक शासन की जंजीरों से मुक्त हो वास्तविक स्वतंत्रता के मार्ग पर चलने के लिए भाषाई आधिपत्य को भी जड़ से मिटाने की नितांत आवश्यकता है। इसके लिए हर नागरिक को कर्तव्य स्वरूप राजभाषाओं को प्राथमिकता देते हुए नित्य प्रति के जीवन में अनावश्यक अंग्रेजी को हतोत्साहित करना औपनिवेशिक स्मृतियों को विस्मृत करने में सहायक सिद्ध होगा।