ओपिनियन

संपादकीय: किताबों की कीमत पर एआइ की पाठशाला क्यों?

डिजिटल ज्ञान को सहेजते हुए किताबों की भौतिक विरासत को बचाना भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि भविष्य की बुद्धिमत्ता अतीत की स्मृतियों की कीमत पर नहीं बननी चाहिए।
2 min read
Aug 26, 2026
ai
ai

एक आयुर्वेदिक वैद्य तैयार करने के लिए अगर पूरा औषधीय वन ही साफ कर दिया जाए तो इसे क्या कहा जाएगा? पहला सवाल तो यह कि ऐसा करने की क्या जरूरत आन पड़ी। दूसरा यह कि वैद्य तो तैयार हो जाएगा, लेकिन औषधीय वन ही नहीं हुआ तो अगली पीढ़ी के लिए औषधियां कहां से आएंगी? एआइ को ज्ञानवान बनाने की प्रक्रिया में ऐसे ही यदि हमारी दुर्लभ किताबें नष्ट होने लगें, तो क्या ऐसे सवाल नहीं उठने वाले? यह चिंता इसलिए होने लगी है क्योंकि आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को प्रशिक्षित करने के लिए बड़ी मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाले मानव-लिखित डेटा की जरूरत है। इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री के बाद अब पुरानी और दुर्लभ किताबें भी एआइ के लिए महत्वपूर्ण स्रोत बन रही हैं। यहां तक सब ठीक है, लेकिन भयावह स्थिति यह है कि किसी किताब का डिजिटल ज्ञान हासिल करने के लिए उसकी भौतिक प्रति ही नष्ट कर दी जा रही है।

सवाल सिर्फ किताब को बचाने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि भविष्य की बुद्धिमत्ता तैयार करने की प्रक्रिया में क्या हम अतीत की स्मृति को नष्ट कर सकते हैं? तेल निकाला जाता है, लेकिन कुएं को तो बचाकर रखा जाता है, ताकि आगे भी काम आ सके। फिर ज्ञान के मामले में यह तर्क उलटा क्यों होने लगा है। यह समझना होगा कि दुर्लभ किताबों में किसी समय का विचार, भाषा, शोध, अनुभव और सभ्यता की स्मृतियां सुरक्षित होती है। डिजिटाइजेशन किताब के शब्द बचा सकता है, लेकिन उसका अस्तित्व नहीं। कभी-कभी सभ्यता को शब्दों के साथ उसका मूल भी बचाना पड़ता है। यानी उसकी छपाई, कागज, हस्तलिखित टिप्पणियां, चित्र, संस्करण और संदर्भ आदि। सवाल यह नहीं कि एआइ को इन किताबों को पढऩे दिया जाए या नहीं। सवाल यह है कि ज्ञान की नई मशीन बनाते समय अगर ज्ञान के पुराने घर ही उजाड़ दिए जाएं, तो यह प्रगति किसकी होगी? तकनीक के पास गैर-विनाशकारी स्कैनिंग के रास्ते हैं। पुस्तकालयों, विश्वविद्यालयों और अभिलेखागारों के साथ साझेदारी हो सकती है। दुर्लभ पुस्तकों के लिए अलग डिजिटल संरक्षण प्रोटोकॉल बनाए जा सकते हैं। एआइ कंपनियां चाहें तो जिस ज्ञान से उनका मॉडल समृद्ध हो रहा है, उसी ज्ञान के भौतिक संरक्षण में भी निवेश कर सकती हैं। यहां सरकार और संस्थानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

ज्ञान-संपदा का मूल्य बाजार तय नहीं कर सकता। उसे समाज की साझा विरासत के रूप में देखना पड़ता है। एआइ मानव ज्ञान का सबसे शक्तिशाली पाठक बन सकता है लेकिन उसे मानव ज्ञान का सबसे बड़ा उपभोक्ता बनने की अनुमति देते समय यह भी तय करना होगा कि वह ज्ञान का सबसे बड़ा संरक्षक बने। आने वाली पीढिय़ां हमसे सिर्फ यह नहीं पूछेंगी कि हमने एआइ को कितना शक्तिशाली बनाया, वे यह भी पूछेंगी कि उसे शक्तिशाली बनाते समय हमने क्या बचाया था?

Updated on:
26 Aug 2026 05:02 pm
Published on:
26 Aug 2026 05:02 pm