
tarrif war
वैश्विक भू-राजनीति व अंतरराष्ट्रीय व्यापार के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जो स्थापित बहुपक्षीय व्यवस्थाओं की नींव हिला देते हैं। वाशिंगटन और ओटावा के बीच व्यापार वार्ता टूटने के तत्काल बाद अमरीकी प्रशासन की ओर से कनाडा से आने वाले उत्पादों पर 50 प्रतिशत दंडात्मक टैरिफ लागू करने का फैसला इस बात का प्रमाण है कि अमरीका अपने सबसे करीबी सहयोगियों पर भी आर्थिक प्रहार करने से नहीं हिचकिचा रहा है।अमरीकी कांग्रेस (अमरीकी संसद) के उच्च सदन सीनेट की ओर से हाल में 86-11 के प्रंचड बहुमत से पारित 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार व कूटनीतिक गलियारों में एक नया भू-राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है। यह विधेयक अमरीकी राष्ट्रपति को रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष 5 आयातक देशों -विशेष रूप से भारत और चीन पर 100 प्रतिशत तक का द्वितीयक टैरिफ लगाने का सीधा और अनियंत्रित अधिकार देता है। अब अमरीकी कांग्रेस के निम्न सदन 'प्रतिनिधि सभा(हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव)' से इसके निर्बाध रूप से पारित होने की संभावना ने संपूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक अभूतपूर्व अनिश्चितता के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
कनाडा पर 50 प्रतिशत टैरिफ से लेकर रूसी तेल खरीदारों पर 100त्न टैरिफ की यह यात्रा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद गढ़ी गई बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को खतरे में डाल रही है। अमरीका की ओर से व्यापार को भू राजनीतिक दबाव बनाने की इस रणनीति ने ंअंतरराष्ट्रीय व्यापार को 'आर्थिक दक्षता' के बजाय 'राजनीतिक वफादारी' पर निर्भर बना दिया है। ट्रंप की ओर से लगाए गए कई टैरिफ को सुप्रीम कोर्ट पहले ही रद्द कर चुका है, लेकिन प्रस्तावित 100 प्रतिशत टैरिफ अधिक समय तक प्रभावी रह सकते हैं, क्योंकि उन्हें एक मजबूत कानूनी आधार पर लागू किया जाएगा।
भारत के लिए यह संकट और भी गंभीर है। पिछले 12 महीनों के नवीनतम व्यापारिक आंकड़ों के अनुसार भारत के कुल व्यापारिक निर्यात में अमरीकी बाजार की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत अर्थात लगभग 85-80 अरब डॉलर पर स्थिर बनी हुई है। यदि 100 प्रतिशत टैरिफ का चाबुक चलता है, तो एक तरफ जहां भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार पूरी तरह बंद होने की कगार पर पहुंच जाएगा, वहीं दूसरी तरफ रूस से मिलने वाले रियायती कच्चे तेल को छोडऩे से घरेलू ऊर्जा सुरक्षा और खुदरा मुद्रास्फीति बेकाबू हो जाएगी। ऐसे में, अमरीकी बाजार तक पहुंच और अपनी ऊर्जा संप्रभुता के बीच संतुलन साधने की यह विवशता भारत के नीति-निर्माताओं के सामने इस सदी की जटिल कूटनीतिक कसौटी प्रस्तुत करती है। अमरीकी कानून वैश्विक व्यापार को दो अलग-अलग वित्तीय और व्यापारिक ध्रुवों में विभाजित कर देगा- एक तरफ अमरीका और उसके पश्चिमी सहयोगी होंगे, और दूसरी तरफ ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ के देश। इससे परिचालन लागत में वृद्धि होगी और वैश्विक विनिर्माण दक्षता में भारी गिरावट आएगी।
भारत और चीन जैसे दो सबसे बड़े ऊर्जा आयातक यदि 30 दिनों की कड़े प्रावधान वाली अवधि के भीतर रूसी तेल आपूर्ति से बेदखल किए जाते हैं, तो लगभग 40-50 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल अचानक बाजार से बाहर हो जाएगा। इसका सीधा परिणाम ब्रेंट क्रूड की कीमतों का 110-130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचना होगा, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था 'स्टैगफ्लेशन' (मंदी के साथ मुद्रास्फीति) की चपेट में आ जाएगी। अमरीका की ओर से स्विफ्ट और डॉलर को राजनीतिक औजार के रूप में बार-बार इस्तेमाल करने से उभरती अर्थव्यवस्थाएं डॉलर-आधारित रिजर्व और परिसंपत्तियों से दूर भागेंगी। अमरीका भारत का सबसे बड़ा एकल निर्यात गंतव्य है। 100 प्रतिशत टैरिफ लागू होने पर टेक्सटाइल, चमड़ा उद्योग, रत्न और आभूषण और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्र, जो लाखों रोजगार पैदा करते हैं, अमरीका बाजार से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे। भारतीय फार्मास्यूटिकल्स, आइटी हार्डवेयर,ऑटो कंपोनेंट्स और इंजीनियरिंग सामानों की कीमत दुगुनी हो जाएंगी। इससे भारत का निर्यात राजस्व 25 से 30 अरब डॉलर तक गिर सकता है।इस संकट से पार करने के लिए रक्षात्मक, कूटनीतिक व आक्रामक आर्थिक सुधारों का एक समन्वित ढांचा अपनाना होगा। भारत का पहला महत्वपूर्ण कदम वाशिंगटन में अपनी कूटनीतिक ताकत का पूरा इस्तेमाल करना होना चाहिए। भारत को निर्यात गंतव्यों के विविधीकरण के अंतर्गत यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौतों को तत्काल अंतिम रूप देना चाहिए। साथ ही अफ्रीका व लैटिन अमरीकी देशों में भी निर्यात वृद्धि पर ध्यान देना चाहिए।
भारत को अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों को अधिकतम क्षमता तक भरना होगा। भारत को रूस के साथ गैर-ऊर्जा व्यापार (उर्वरक, रक्षा) के लिए एक सुरक्षित 'गैर डॉलर निपटान तंत्र' विकसित करना होगा। भारत का मार्ग 'रणनीतिक संतुलन, त्वरित निर्यात विविधीकरण और संप्रभु कूटनीतिक सौदेबाजी' के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए। यदि भारत इस त्रिस्तरीय दबाव- अमरीकी टैरिफ, रूसी ऊर्जा और घरेलू आर्थिक स्थिरता को सफलतापूर्वक संभाल लेता है, तो वह न केवल इस अल्पकालिक संकट से बाहर निकलेगा, बल्कि स्वायत्त और मजबूत वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित होगा।
Updated on:
25 Aug 2026 05:18 pm
Published on:
25 Aug 2026 05:17 pm
