
उमा व्यास, स्वतंत्र लेखिका
बुजुर्ग किसी भी समाज की वह पीढ़ी हैं, जिसके पास समय के साथ अर्जित अनुभव, समझ और जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव से निकली सीख होती है। लेकिन बदलती जीवनशैली और परिवारों की व्यस्तता के बीच नई पीढ़ी और बुजुर्गों के बीच संवाद का समय लगातार कम हो रहा है। हेल्पएज इंडिया की ‘इंडिया इंटरजनरेशनल बॉन्ड्स’ रिपोर्ट भी इसी बदलते रिश्ते की ओर ध्यान दिलाती है। यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बुजुर्गों के अनुभव को परिवार और समाज की उपयोगी पूंजी में बदला जा सकता है। वृद्धावस्था जीवन का स्वाभाविक पड़ाव है, लेकिन इसे सम्मानजनक और सुरक्षित बनाना परिवार और समाज की जिम्मेदारी है। जिन लोगों ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा परिवार और समाज को दिया, उन्हें उम्र बढऩे के साथ अकेलेपन और उपेक्षा का सामना न करना पड़े, यह हमारी जिम्मेदारी है।
भारत लंबे समय तक युवा देश के रूप में पहचाना जाता रहा है, लेकिन अब उसकी जनसंख्या की आयु संरचना तेजी से बदल रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश की लगभग 8 प्रतिशत आबादी 60 वर्ष या उससे अधिक आयु की थी। भारत एजिंग रिपोर्ट 2023 के अनुसार 2050 तक देश की 60 वर्ष से अधिक आयु की आबादी 20 प्रतिशत से ज्यादा हो सकती है। यानी आने वाले वर्षों में भारत के सामने वृद्ध होती आबादी की बड़ी चुनौती होगी। बढ़ती उम्र के साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ती हैं। गठिया, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, दृष्टि और श्रवण संबंधी समस्याओं के साथ मानसिक स्वास्थ्य भी चिंता का विषय बनता है, लेकिन परेशानी केवल बीमारी तक सीमित नहीं है। बच्चों का दूर चले जाना, जीवनसाथी का साथ छूटना, आर्थिक निर्भरता और परिवार में संवाद की कमी भी बुजुर्गों के जीवन को प्रभावित करती है। इसलिए उनकी देखभाल में इलाज के साथ समय, बातचीत, सम्मान और अपनापन भी जरूरी है।
डिजिटल तकनीक के तेजी से विस्तार ने वरिष्ठ नागरिकों के सामने एक नई चुनौती भी खड़ी की है। बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी सुविधाओं का बड़ा हिस्सा तेजी से ऑनलाइन हो रहा है। ऐसे में डिजिटल साक्षरता बुजुर्गों को आत्मनिर्भर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। परिवार और समाज को उन्हें तकनीक से जोडऩे में सहयोग करना चाहिए, ताकि वे रोजमर्रा के जरूरी कामों के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर न रहें। साथ ही, डिजिटल सेवाओं को इस तरह विकसित किया जाना चाहिए कि अधिक उम्र के लोगों के लिए उनका इस्तेमाल सहज और सुरक्षित हो।
विश्व स्तर पर वृद्धावस्था को अब केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं माना जाता। संयुक्त राष्ट्र ने 2021 से 2030 तक के दशक को स्वस्थ वृद्धावस्था का दशक घोषित किया है। इसका उद्देश्य आयु आधारित भेदभाव कम करना, वृद्ध अनुकूल समुदाय बनाना, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना और दीर्घकालिक देखभाल को मजबूत करना है। भारत के लिए भी यह जरूरी है कि वृद्धावस्था को केवल परिवार की जिम्मेदारी मानने के बजाय इसे सामाजिक और नीतिगत प्राथमिकता के रूप में देखा जाए। भारत में वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए कानूनी व्यवस्थाएं भी मौजूद हैं। ‘माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007’ के तहत माता-पिता के भरण-पोषण की जिम्मेदारी संतान पर निर्धारित की गई है। यानी माता-पिता का भरण-पोषण केवल नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि कानून द्वारा निर्धारित दायित्व भी है। वृद्धावस्था पेंशन, अटल वयो अभ्युदय योजना, राष्ट्रीय वयोश्री योजना और एल्डरलाइन जैसी योजनाएं भी वरिष्ठ नागरिकों के लिए चल रही हैं। जरूरत इनके प्रभावी क्रियान्वयन की है, ताकि इनका लाभ वास्तव में जरूरतमंद बुजुर्गों तक पहुंच सके।
शहरों और सार्वजनिक स्थानों को भी बुजुर्गों के अनुकूल बनाया जाना चाहिए, ताकि वे सुरक्षित और आत्मनिर्भर होकर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जी सकें। सुरक्षित पैदल रास्ते, बैठने की पर्याप्त जगह, सुगम सार्वजनिक परिवहन और स्वास्थ्य सुविधाओं तक आसान पहुंच जैसी व्यवस्थाएं उनके जीवन को बेहतर बना सकती हैं। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका परिवार की है। वृद्ध माता-पिता को केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि समय, सम्मान और निर्णयों में भागीदारी भी चाहिए। उनके साथ बैठना, उनकी बातें सुनना, उनकी राय लेना और परिवार के फैसलों में उन्हें शामिल करना जरूरी है। माता-पिता का भरण-पोषण बच्चों का कानूनी दायित्व है, लेकिन रिश्तों में अपनापन किसी कानून से नहीं आ सकता।
Updated on:
24 Aug 2026 07:33 pm
Published on:
24 Aug 2026 07:33 pm
