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संपादकीय: ‘पेपर लीक’ के मामलों में लीक से अलग सोचें

पेपर लीक के बाद पूरी परीक्षा रद्द करना आसान रास्ता है, लेकिन इससे निर्दोष अभ्यर्थियों के साथ अन्याय होता है।जरूरत परीक्षा रद्द करने की नहीं, बल्कि दोषियों की पहचान कर उन्हें सजा देने और परीक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की है।
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paper leak

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पेपर लीक के बाद किसी परीक्षा की पूरी प्रक्रिया को ही रद्द कर देना, बढ़ते विवाद को रोकने का आसान रास्ता है। आमतौर पर सरकारें यही आसान रास्ता अपनाती हैं और अदालतों के पास भी यही विकल्प बचता है। ऐसा होने पर उन बहुसंख्यक अभ्यर्थियों के साथ अन्याय हो जाता है, जो न तो पेपर लीक करने या उससे फायदा उठाने में किसी भी तरह से दोषी होते हैं, न ही उस सिस्टम के लिए जिम्मेदार जिसकी वजह से परीक्षाओं में भ्रष्टाचार होता है। सिस्टम को ठीक किए बिना इस बात की गारंटी नहीं ली जा सकती कि दोबारा होने वाली परीक्षा में सब कुछ ठीक रहेगा। वर्तमान परीक्षा में भ्रष्टाचार का मामला सामने आने के बाद पूर्व में हो चुकी परीक्षाओं को भी रद्द करने का फैसला तो और भी अतार्किक लगता है। यदि सरकार ने मान लिया कि पूर्व परीक्षाओं में भी भ्रष्टाचार हुआ, तब भी बिना किसी जांच के यह कैसे पता चला कि यह कब से हो रहा था?

झारखंड लोक सेवा आयोग का 22 भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला और झारखंड हाई कोर्ट द्वारा इस फैसले पर रोक लगाने का आदेश, 'नीट' विवाद के बाद फिर नई चर्चा में है। खासकर इसलिए भी कि झारखंड सरकार ने जिन परीक्षाओं को रद्द किया था, उन्हें पास करने वाले ऐसे अभ्यर्थी भी थे जिनकी सालों पहले नियुक्ति हो चुकी थी। जाहिर है, कुछ अभ्यर्थियों के साथ हुए अन्याय का समाधान एक दूसरे, बड़े समूह के साथ अन्याय करके नहीं हो सकता, जब तक यह साबित न हो जाए कि नियुक्त होने वाला पूरा समूह ही दोषी है। ऐसे मौकों का राजनीतिक इस्तेमाल करने और उसे रोकने के लिए सरकार और विपक्ष का आमने-सामने आना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में ऐसे टकराव व्यवस्था में सुधार का दबाव बनाते हैं, जैसा नीट के मामले में भी दिखा था - सरकार को सुधार के लिए कई नए कदम उठाने पड़े। हालांकि वे कितने कारगर होंगे, यह समय ही बताएगा। परीक्षाओं और नियुक्तियों को रद्द करने के फैसले को आंदोलनकारी विद्यार्थियों की जीत भले ही माना जाए, पर यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

अव्वल तो हर परीक्षा फुलप्रूफ होनी चाहिए। लेकिन यदि कभी परीक्षा में कदाचार के मामले सामने आ भी जाएं, तो ज्यादा जरूरी उससे फायदा उठाने वालों की पहचान करना होना चाहिए। इसमें शक नहीं कि आधुनिक तकनीकी युग में लीक हुए प्रश्नपत्रों को सेकंडों में बड़े समूह तक पहुंचाकर लाभ कमाना आसान हो गया है। पर उन्हीं तकनीकों का इस्तेमाल कर लाभार्थियों की पहचान करना भी अब कोई मुश्किल काम नहीं रह गया है। सुरक्षा एजेंसियां चाहें तो डिजिटल फुटप्रिंट को ट्रेस कर कदाचार के हर दोषी तक आसानी से पहुंच सकती हैं। एक बार यह संदेश चला जाए कि भ्रष्टाचारी-कदाचारी बाद में भी पकड़े जा सकते हैं और वे बच नहीं सकते, तो निश्चित रूप से ऐसे प्रयास रुक जाएंगे। सिर्फ कदाचारियों को ही सजा देना ही सही मायने में न्याय होगा।