
AgriculturalInnovation
वित्त वर्ष 2023-24 के केंद्रीय बजट में प्रस्तावित एग्रीस्टैक को कृषि क्षेत्र के लिए डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में पेश किया गया था। इसकी परिकल्पना आधार, यूपीआइ और डिजिलॉकर जैसी व्यवस्थाओं की तर्ज पर की गई थी। इस वर्ष जून के आखिर तक, तकरीबन सवा नौ करोड़ से अधिक किसान परिवारों को एग्रीस्टैक (किसान आइडी) से जोड़ लिया गया है। यह प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, फसल बीमा, कृषि ऋण, सरकारी खरीद और आपदा राहत जैसी योजनाओं के लिए एक साझा आधार बनता जा रहा है। दरअसल, एग्रीस्टैक एक ऐसी साझा डिजिटल व्यवस्था है जिससे सरकार, निजी कंपनियां और अन्य संस्थाएं एक समान प्रणाली के जरिए जुडकऱ जानकारियां साझा कर सकेंगी।
हर मौसम का तैयार होता है डिजिटल रेकॉर्ड
एग्रीस्टैक तीन प्रमुख डिजिटल रिकॉर्ड एकत्र करता है। पहला है किसान रजिस्टर, जिसे तैयार करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। इसमें भूमि स्वामी किसानों को आधार से जुड़ी एक विशिष्ट किसान पहचान संख्या (आइडी) दी जाती है। दूसरा है जियो टैग गांव का मानचित्र। इसके तहत गांवों के पुराने कागजी और हाथ से बने भूमि नक्शों को सैटेलाइट तकनीक की मदद से डिजिटल और अधिक सटीक बनाया जा रहा है। तीसरा है फसल रजिस्टर जो गांव स्तर पर सर्वेक्षण के दौरान अधिकारी भू-स्थान (जियोटैग) वाली तस्वीरों के साथ यह दर्ज करते हैं कि किस खेत में किस मौसम में कौन-सी फसल बोई गई है। इससे हर मौसम का डिजिटल रेकॉर्ड तैयार होता है। इसके अलावा बीज, कीटनाशकों और अन्य कृषि संसाधनों से जुड़े करीब दो दर्जन अतिरिक्त डिजिटल रेकॉर्ड भी विकसित किए जा रहे हैं, ताकि पूरे कृषि क्षेत्र में आंकड़ों का एक समान स्वरूप तैयार किया जा सके।
किसानों के पास एग्रीस्टैक की कंसेट का रहेगा अधिकार
सरकार ने कई मौकों पर स्पष्ट किया है कि भविष्य में पीएम-किसान योजना का लाभ लेने के लिए किसान रजिस्टर में नाम और विशिष्ट किसान आइडी होना अनिवार्य होगा। यानी सभी राज्यों को तय समयसीमा के भीतर यह व्यवस्था लागू करनी होगी। भारत में बड़ी संख्या में किसान ऐसी जमीन पर खेती करते हैं जो उनके नाम पर दर्ज नहीं होती। कई जगह खेती बटाई की व्यवस्था पर होती है, जिनका सरकारी रेकॉर्ड में उल्लेख नहीं मिलता। ऐसे किसानों को डिजिटल व्यवस्था में शामिल करना हमेशा से मुश्किल रहा है। ऐसे में सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि एग्रीस्टैक इन व्यवस्थाओं को कानूनी पहचान देकर सुरक्षित बनाता है या फिर उन्हें रेकॉर्ड से बाहर कर देता है। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के तहत सैद्धांतिक रूप से किसानों के पास एग्रीस्टैक की कंसेंट (सहमति) सिस्टम का पूरा अधिकार रहेगा। लेकिन व्यवहार में यह इस बात पर निर्भर करेगा कि किसान खासकर छोटे और सीमांत किसान, महिलाएं और भूमिहीन किसान डिजिटल तकनीक और अपने अधिकारों को कितनी अच्छी तरह समझते हैं।
बड़ा सवाल, आखिर लाभ किसे मिलेगा
अगर उन्हें यह समझ ही नहीं होगी कि वे किस बात की अनुमति दे रहे हैं, तो उनकी सहमति केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी। अहम सवाल यह है कि किसानों की जानकारी आसानी से उपलब्ध होने का सबसे बड़ा लाभ आखिर किसे मिलेगा। सरकार अपनी नीति में जिन संस्थाओं को ‘डेटा उपयोगकर्ता’ कहती है, उनमें कृषि निवेश कंपनियां, ऋण देने वाले संस्थान शामिल हैं। ऐसे में आवश्यक है कि एग्रीस्टैक के क्रियान्वयन में कुछ बुनियादी सिद्धांतों को प्राथमिकता दी जाए। सबसे पहले, सहमति सिस्टम को वास्तव में समझने योग्य बनाया जाए, ताकि किसान अपने डेटा के उपयोग को लेकर स्वत: ही सचेत निर्णय ले सकें। दूसरा, बटाईदार और भूमिहीन किसानों, महिला किसानों के लिए वैकल्पिक पहचान और पंजीकरण व्यवस्था विकसित की जाए, जिससे वे डिजिटल ढांचे से बाहर ना हो पाएं। तीसरा, राज्यों को इस जटिल प्रक्रिया के लिए दलगत राजनीति के ऊपर उठकर पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए। यदि एग्रीस्टैक इन सुझावों को शामिल कर किसानों के अधिकार क्षेत्र को विस्तार देती है तो वाकई यह कृषि क्षेत्र में एक ऐतिहासिक बदलाव साबित हो सकती है।
Updated on:
21 Aug 2026 06:12 pm
Published on:
21 Aug 2026 06:11 pm
