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संपादकीय: मां-बाप और संतान के बीच अदालत की दस्तक क्यों?

बुजुर्गों की देखभाल जैसे रिश्तों के मूल कर्तव्य को अदालतों द्वारा याद दिलाना समाज में गहराती संवेदनहीनता का संकेत है।जरूरत इस बात की है कि संपत्ति से अधिक माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी और रिश्तों की अहमियत को समझा जाए।
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जयपुर

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Opinion Desk

Aug 21, 2026

parents

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ये आश्चर्य से अधिक वेदना का विषय है जिसमें अदालतों को कहना पड़ रहा है कि संतानें अपने मां-बाप का ध्यान रखें। देश की सर्वोच्च अदालत ने हाल में झकझोरने वाली टिप्पणी करते हुए साफ किया कि बढ़ती उम्र का मतलब असुविधा अथवा अपमान नहीं होना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मां-बाप का ध्यान नहीं रखने वाली संतानों को संपत्ति से बेदखल करने का अधिकार माता-पिता को है। आम आदमी के दिमाग में उठने वाला सबसे बड़ा सवाल आज यही है कि आखिर अदालतों को संतानों को उनके कत्र्तव्य को याद दिलाने की नौबत क्यों आ रही है?

लखनऊ के जिस मामले में सर्वोच्च न्यायालय को ये टिप्पणी करनी पड़ी उसमें एक वृद्धा को अपना घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा था। युवा दंपत्ति को बुजुर्ग की देखभाल की बजाय संपत्ति हथियाने की चिंता थी। अब समाचार पत्रों अथवा टीवी चैनलों पर ऐसी खबरें अधिकता से दिखाई देने लगी हैं। जिन मां-बाप ने उन्हें जन्म दिया वह संतानें उनकी देखभाल से अधिक उनकी संपत्ति पर कब्जा करने में व्यस्त हैं। हालांकि हर संतान ऐसी नहीं है लेकिन इस तरह की खबरें ये सोचने पर विवश जरूर कर रही हैं कि आखिर रिश्तों में ऐसी दरार क्यों पैदा होने लगी है? बच्चों को मां-बाप की तुलना में संपत्ति अधिक मूल्यवान क्यों नजर आने लगी है? इसे संस्कारों की कमी माना जाए अथवा हर चीज को पैसों से तौलने की प्रवृत्ति? एक पखवाड़े पहले हरियाणा के सोनीपत से भी एक हृदय विदारक खबर ने देश का ध्यान आकर्षित किया था। वृद्धाश्रम में रहने वाले 74 वर्षीय व्यवसायी की मौत के बाद आश्रम संचालकों को ही उनकी अंत्योष्टि करनी पड़ी थी। ऐसा नहीं था कि व्यवसायी को कोई संतान नहीं थी, लेकिन उनकी तीनों बेटियों ने समयाभाव बताते हुए अंत्येष्टि में आने से इनकार कर दिया था। तीनों बेटियां न तो अस्थि विसर्जन के दौरान मौजूद रहीं और न ही तेरहवीं की रस्म में मौजूद रहने की रस्म अदायगी की।

समाज में इस तरह की घटनाएं एक चेतावनी हैं कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं? जिस मां-बाप ने संतान को जन्म दिया, वही संतान बुढ़ापे में उनकी सहारे की लाठी बनने से मुंह क्यों मोड़ रही है? उन्हें ये क्यों नहीं लगता कि जो आज वो अपने मां-बाप के साथ कर रहे हैं, बुढ़ापे में उन्हें भी ये भोगना पड़ सकता है? मां-बाप और संतान के रिश्तों के बीच अदालत को दखल देने की नौबत आना दरकते रिश्तों की भयावह सच्चाई है जिससे मुंह मोडऩा उचित नहीं। ये ऐसे रिश्ते हैं जहां किसी सरकार अथवा अदालत को मध्यस्थ बनने की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। अब भी समय है जब हम इस सामाजिक बीमारी की रोकथाम के लिए जरूरी कदम उठाकर इस पर काबू पा सकते हैं। अन्यथा वो दिन दूर नहीं जब अधिकांश वृद्ध अपनी खून-पसीने की कमाई से बनाए गए घर को छोड़कर वृद्धाश्रम में नजर आएंगे।