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किसी विद्यालय की सफलता का पैमाना 5 पूंजियों में समाहित

निजी निवेश शिक्षा को संसाधन दे सकता है, लेकिन उसकी वास्तविक सफलता चरित्र, ज्ञान, जिज्ञासा और सामाजिक जिम्मेदारी से तय होती है।
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जयपुर

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Opinion Desk

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प्रदीप बोरड़ भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी

Aug 21, 2026

private schools

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इन दिनों पिछले एक दशक में भारत के निजी विद्यालयों में हुए विदेशी एवं निजी निवेश पर बहस छिड़ी हुई है। शिक्षा निवेशकों का नया आकर्षण बन रही है। प्रथम दृष्टया यह आर्थिक विकास का संकेत प्रतीत होता है, परंतु गहराई से देखने पर यह प्रश्न केवल निवेश का नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का प्रश्न है। 'सा विद्या या विमुक्तये।' भारतीय दर्शन के अनुसार वही विद्या है जो मनुष्य को अज्ञान, भय, लोभ और संकीर्णता से मुक्त करे। यदि शिक्षा ऐसा नहीं करती तो वह केवल सूचना है।

शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि विवेक, चरित्र, उत्तरदायित्व, सह-अस्तित्व, करुणा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, लोकतांत्रिक नागरिकता और जीवन जीने की कला विकसित करना है। विद्यालय की सफलता का मापदंड चरित्र, ज्ञान, जिज्ञासा, सेवा, सामाजिक उत्तरदायित्व होना चाहिए। विद्यालय नागरिक बनाता है, इसलिए शिक्षा को केवल बाजार की दृष्टि से देखना खतरनाक भी हो सकता है। भारत विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है। 35 वर्ष से कम आयु की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या है। यह जनसांख्यिकीय लाभांश तभी वास्तविक आर्थिक और राष्ट्रीय निर्माण शक्ति के रूप में परिवर्तित हो सकता है, जब यह युवा आबादी मूल्य आधारित, गुणवत्तापूर्ण, उद्देश्यपूर्ण और आवश्यक कौशल एवं तकनीक से शिक्षित होगी।

भारत में मैकाले-मॉडल आधारित शिक्षा ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली को केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम बना दिया है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना हो गया है। यह कहना भी उचित नहीं है कि शिक्षा में निजी निवेश नहीं होना चाहिए। निजी निवेश से गुणवत्तापूर्ण विद्यालयों का विस्तार होता है लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है, जब लाभ ही उद्देश्य बन जाता है और शिक्षा केवल उस लाभ का माध्यम। विद्यालय ्धीरे-धीरे उद्योग बन जाता है, अभिभावक ग्राहक बन जाते हैं, विद्यार्थी 'ब्रांड वैल्यू' का हिस्सा बन जाते हैं, शिक्षक सेवा प्रदाता बन जाते हैं, परीक्षा परिणाम ही गुणवत्ता का एकमात्र मापदंड बन जाता है और शिक्षा बाजार की प्रतिस्पर्धा का साधन बन जाती है। यहीं से शिक्षा का उद्देश्य दूषित हो जाता है। विद्यालय का वास्तविक स्वामी कोई ट्रस्ट, कंपनी या संस्था हो सकती है, परंतु नैतिक स्वामित्व समाज का होता है।

आज विद्यालय अपनी उपलब्धियों के नाम पर बताते हैं, कितने प्रतिशत परिणाम, कितने आइआइटी चयन, कितने डॉक्टर, कितने विशाल परिसर आदि। लेकिन कोई भी विद्यालय यह नहीं बताता कि कितने विद्यार्थी सत्यनिष्ठ बने, कितनों ने समाज को प्रतिफल लौटाया है? यदि शिक्षा केवल संग्रह, प्रतियोगिता और उपभोग सिखाए तो वह मनुष्य को भौतिक दृष्टि से सफल तो बना सकती है, पर श्रेष्ठ नहीं। इसीलिए भविष्य के विद्यालयों का केंद्र मानवता होना चाहिए।विश्व के अनेक देशों से महत्वपूर्ण सीख मिलती है। फिनलैंड में शिक्षा न्यूनतम परीक्षा, समान अवसर और आनंददायी शिक्षण पर आधारित है, तो सिंगापुर में चरित्र निर्माण और नवाचार आधारित शिक्षा है। भारत को इनसे सीखते हुए और अपनी प्राचीन दार्शनिक विचारधारा को ध्यान में रखते हुए मार्ग चुनना होगा। एक महान विद्यालय की पांच पूंजियां हो सकती हैं, आर्थिक पूंजी (मानव संसाधन और तकनीक), मानवीय पूंजी (श्रेष्ठ शिक्षक और प्रेरक नेतृत्व), बौद्धिक पूंजी (अनुसंधान, नवाचार और जिज्ञासा), सामाजिक पूंजी (समाज, अभिभावकों और पूर्व विद्यार्थियों का विश्वास) और नैतिक पूंजी (ईमानदारी, सेवा, करुणा, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति)। निजी निवेश पहली पूंजी ला सकता है, शेष चार पूंजियां केवल शिक्षा दर्शन, शिक्षक और समाज मिलकर ला सकते हैं। भारत के लिए निजी निवेश के लिए पारदर्शी नियमन, गुणवत्ता का स्वतंत्र मूल्यांकन, फीस और सामाजिक उत्तरदायित्व में संतुलन, शिक्षक विकास पर न्यूनतम निवेश सुनिश्चित करना आवश्यक है। निवेशकों के लिए केवल आर्थिक लाभ लक्ष्य न हो, बल्कि सामाजिक प्रतिफल भी लक्ष्य होना चाहिए।भारत को ऐसे विद्यालय चाहिए जहां तकनीक हो, पर संवेदना भी हो, जहां उत्कृष्टता हो, पर विनम्रता भी हो। किसी भी विद्यालय की वास्तविक बैलेंस शीट उसकी आय-व्यय नहीं होती। उसके पूर्व विद्यार्थियों का चरित्र, समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और राष्ट्र निर्माण में उनका योगदान ही सबसे बड़ी संपत्ति होती है।