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मैं कॉर्निया हूं, किसी के अंधेरे में सूरज बन सकता हूं

मैं सिर्फ आंख की एक पारदर्शी पुतली नहीं, मैं रोशनी हूं, एक भावना हूं, नेत्रदान के माध्यम से दृष्टिहीन की आंखों में रोशनी लौटाने का करिश्मा हूं। मैं 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' का जीवंत प्रतीक हूं। मेरी आत्मा में उन अनगिनत चेहरों की मुस्कान समाई है, जो सदियों से अंधेरे में भटकने के बाद अचानक दुनिया के खूबसूरत रंग देख पाते हैं।
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जयपुर

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Neeru Yadav

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Updated: 24 Aug 2026, 5:33 PM IST

Eye Cancer Symptoms,Ocular Melanoma Signs,Eye Tumor Warning Signs,

आंख में बढ़ता काला निशान और लगातार जलन हो सकता है आंख का कैंसर- प्रतीकात्मक तस्वीर (Source- Freepik)

डॉ. सुरेश कुमार पाण्डेय, वरिष्ठ चिकित्सक एवं लेखक

मेरा परिचय क्या पूछ रहे, मैं प्रकाश का पहला द्वार हूं, 
अंधेरों से लड़ती उम्मीदों का, मैं एक महत्वपूर्ण आधार हूं। 
किसी के पावन 'नेत्रदान' से ही, मेरा नया सफर है सजता, 
मैं राख होने से बच जाऊं, तो दृष्टिहीन का पूरा संसार हूं।

मैं आपकी आंख का कॉर्निया हूं…
मैं सिर्फ आंख की एक पारदर्शी पुतली नहीं, मैं रोशनी हूं, एक भावना हूं, नेत्रदान के माध्यम से दृष्टिहीन की आंखों में रोशनी लौटाने का करिश्मा हूं। मैं 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' का जीवंत प्रतीक हूं। मेरी आत्मा में उन अनगिनत चेहरों की मुस्कान समाई है, जो सदियों से अंधेरे में भटकने के बाद अचानक दुनिया के खूबसूरत रंग देख पाते हैं। मैं आपकी आंख के बिल्कुल सामने स्थित वह पारदर्शी खिडक़ी हूं, जिसके रास्ते प्रकाश आपके भीतर प्रवेश करता है। मेरे भीतर कोई रक्त नली (ब्लड वेसल) नहीं होती, फिर भी आपके जीवन के हर दृश्य की पहली दस्तक मुझ पर ही पड़ती है। जब आपने पहली बार अपनी मां को देखा था, जब ब्लैकबोर्ड का पहला अक्षर पढ़ा था या किसी प्रियजन की मुस्कान देखी थी, उन सबकी रोशनी सबसे पहले मुझसे होकर ही आंखों के भीतर पहुंची थी।
लेकिन जब किसी चोट, संक्रमण, कुपोषण, विटामिन ए की कमी या गंभीर बीमारी के कारण मैं सफेद और अपारदर्शी हो जाता हूं, तो रोशनी नेत्रों में नहीं जा पाती। चिकित्सा विज्ञान में इसे ही कॉर्नियल ब्लाइंडनेस कहते हैं। तब इंसान की आंखें तो खुली होती हैं, पर उसके हिस्से में केवल अंधेरा आता है। सूरज भी वहीं होता है, मां भी सामने खड़ी होती है, लेकिन देखने वाले के लिए दुनिया के सारे रंग बुझ जाते हैं। विजन 2020 अभियान के अनुसार, विश्व में हर 5 सेकंड में एक वयस्क और हर एक मिनट में एक बच्चा दृष्टिहीन हो जाता है। दुखद है कि दुनिया की लगभग 80 प्रतिशत दृष्टिहीनता एवं दृष्टिबाधिता ऐसी है, जिसे समय रहते रोका जा सकता है या जिसका इलाज संभव है। भारत में लगभग 4.2 लाख लोग कॉर्नियल ब्लाइंडनेस का दंश झेल रहे हैं। इन सूनी आंखों को दोबारा दुनिया दिखाने के लिए हमारे देश को हर साल लगभग 2 लाख डोनर कॉर्निया की आवश्यकता है, लेकिन विडंबना है कि प्रतिवर्ष मुश्किल से पचास हजार कॉर्निया मिल पाते हैं और प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त केवल आधे ही हो पाते हैं।
अब उस छोटे से बच्चे की कल्पना कीजिए, जिसकी आंखें खुली हैं पर कॉर्निया की सफेदी के कारण प्रकाश की दुनिया बंद है। उसने मां की लोरियां सुनी हैं, पर उनका चेहरा कभी नहीं देखा है। उसने पिता की अंगुली पकडक़र चलना सीखा है, पर उनकी मुस्कान नहीं देखी। उसने सुना है कि आसमान नीला होता है, गुलाब लाल होता है, पर उसके लिए ये रंग केवल बेजान शब्द हैं। हम आंखें बंद करके अंधेरा महसूस कर सकते हैं, लेकिन वह बच्चा तो आंखें खोलकर भी अंधेरे में जीता है। पर जब नेत्र चिकित्सा विज्ञान और मानवीय करुणा मिलते हैं, तो नेत्रदान के माध्यम से मेरी गोद में एक नया करिश्मा जन्म लेता है। किसी कॉर्निया प्रत्यारोपण के कुछ घंटों बाद, जब उस बच्चे की आंखों से पट्टी खुलती है और वह धीरे धीरे अपनी नई दृष्टि से सामने खड़ी उस स्त्री को पहचानने की कोशिश करता है, जिसकी आवाज उसने जन्म से सुनी है। वह नन्हें हाथों से मां के गाल छूकर पूछता है, 'डॉक्टर साहब, जिसे मैं इतने सालों से छूता आया हूं, क्या यही मेरी मां हैं?' यह सिर्फ एक सर्जरी की सफलता नहीं है, यह उस रोशनी की जीत है जिसकी शुरुआत कुछ दिन पहले किसी दूसरे घर में हुई थी, जहां मृत्यु के अथाह दु:ख के बीच एक परिवार ने आंसू बहाते हुए भी नेत्रदान का संकल्प पूरा किया था।
मैं नेत्रदान के माध्यम से मृत्यु के बाद भी जीवन एवं रोशनी तलाश लेता हूं। मैं वर्षों तक एक व्यक्ति की आंखों में रहा। एक दिन धडक़न रुक गई, वह व्यक्ति अनंत यात्रा पर निकल गए। लेकिन उस परिवार के एक महत्वपूर्ण फैसले से खामोशी के बीच मेरी एक नई यात्रा शुरू हो गई। एक विदाई कई अनजान लोगों की नई सुबह बन सकती है। आधुनिक चिकित्सा में एक डोनर से मिले दो कॉर्निया अब कंपोनेंट कॉर्नियल सर्जरी द्वारा छह दृष्टिहीन व्यक्तियों की आंखों में रोशनी लौटा सकते हैं। कॉर्निसोल मीडिया के माध्यम से अब मुझे दो सप्ताह तक सुरक्षित रखा जा सकता है। नेत्रदान के इस महाभियान में हमें अपने पड़ोसी देश श्रीलंका से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है, जिसने नेत्रदान को अपने धर्म और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बना लिया है। जब श्रीलंका जैसा छोटा देश अपने संकल्प से पूरी दुनिया को रोशन कर सकता है, तो 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' को मानने वाले हम भारतीय इस महादान में पीछे क्यों रहें।
पर हमारे समाज में फैले कई मिथक दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं। लोग सोचते हैं कि उनकी उम्र अधिक है, वे चश्मा लगाते हैं या मोतियाबिंद का ऑपरेशन हो चुका है, तो आंखें किस काम आएंगी। कुछ डरते हैं कि नेत्रदान से चेहरे की आकृति बिगड़ जाएगी या अंतिम दर्शन में परेशानी होगी। ये भ्रांतियां पूरी तरह गलत हैं। चश्मा पहनने वाले, बुजुर्ग, मधुमेह (डायबिटीज) एवं रक्तचाप (हाइपरटेंशन) से पीडि़त व्यक्ति और मोतियाबिंद व लेंस प्रत्यारोपण की सर्जरी करा चुके दो से अस्सी वर्ष तक के व्यक्ति भी पूरे अधिकार से नेत्रदान कर सकते हैं। मृत्यु के 6 से 8 घंटे के भीतर नेत्रदान हो जाना चाहिए। हां, वायरल बीमारियां, एड्स, वायरल हेपेटाइटिस, रेबीज, एक्टिव ट्यूबरकुलोसिस (टीबी), सक्रिय कैंसर, सेप्टीसीमिया, पानी में डूबने से हुई मृत्यु, या सिफलिस आदि गंभीर संक्रमण होने पर कॉर्निया नहीं लिया जा सकता। इन्हें छोडक़र दो वर्ष से लेकर अस्सी वर्ष तक का हर व्यक्ति नेत्रदान कर रोशनी बांट सकता है। किसी दृष्टिहीन व्यक्ति तक रोशनी पहुंचाने की पहली शुरुआत नेत्र सर्जन नहीं, बल्कि एक नेत्रदाता के संकल्प से होती है। यह समय है कि हम संकल्प लें, रोशनी बांटिए, दृष्टि की विरासत रचिए। सबसे जरूरी यह है कि आज ही परिवार के साथ बैठें और उनसे कहें कि जब शरीर की सांसें पूरी हो जाएं, तो मेरी आंखों की रोशनी किसी और को दे देना। शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है, 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: नैनं चैनं क्लेदयन्त्यपो न शोषयति मारुत:।' इसी तरह नेत्रदान के रूप में मेरी दृष्टि का यह करिश्मा हमेशा अमर रहेगा।
सांसें जो मेरी थम भी जाएं, तो मेरा सफर समाप्त मत समझना, 
इन आंखों में धडक़ती रोशनी को, चिता की राख होने मत देना। 
क्या पता किसी अंधेरे बचपन का सूरज, इन्हीं आंखों में सोया हो? 
मैं दुनिया से विदा ले लूं,.. पर मेरी दृष्टि को विदा होने मत देना।