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आईना: अतिक्रमण की गिरफ्त, जानें पत्रिका सर्वे

अतिक्रमण अचानक नहीं होता। पहले सामान फुटपाथ पर आता है। फिर दुकान कुछ कदम बाहर निकलती है। फिर टीनशेड आता है। फिर पक्का निर्माण। देखते-देखते सार्वजनिक जगह निजी सुविधा में बदल जाती है।
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mirror in grip of encroachment article by vijay chaudhary

आईना: अतिक्रमण की गिरफ्त (फोटो- एआई)

चुनाव आ गए हैं। शहर की गलियों में अब वोट तलाशे जाएंगे। उम्मीदवार घर-घर पहुंचेंगे, हाथ मिलाएंगे, हाल पूछेंगे और चर्चा करेंगे कि मोहल्‍ले की सबसे बड़ी समस्या क्या है? जनता भी अपनी शिकायतों की गठरी खोलेगी…सफाई, सड़क, सीवरेज, पानी…

मगर 'अतिक्रमण'…शायद इसकी चर्चा न हो, क्योंकि अतिक्रमण अब समस्या कम, शहरों की आदत ज्यादा बन चुका है। जयपुर हो, जोधपुर हो, उदयपुर हो या कोटा… किसी भी शहर के रास्तों पर नजर घुमाइए। सड़क के किनारे बढ़ती दुकानें, फुटपाथ पर पसरा सामान, नालों पर खड़े निर्माण और सार्वजनिक जगह पर कब्जे की कोई न कोई कहानी नजर आ ही जाएगी। हर शहर-कस्बे के हालात एक जैसे हैं।

अतिक्रमण अचानक नहीं होता। पहले सामान फुटपाथ पर आता है। फिर दुकान कुछ कदम बाहर निकलती है। फिर टीनशेड आता है। फिर पक्का निर्माण। देखते-देखते सार्वजनिक जगह निजी सुविधा में बदल जाती है। और वह भी, सबकी आंखों के सामने। फिर भी शहर चलता रहता है। पैदल चलने वाला सड़क पर उतर आता है, वाहन वाला रास्ता बदल लेता है और शिकायत करने वाला अगली बार शिकायत करने से पहले कई बार सोचता है।

'राजस्थान पत्रिका' के सर्वे में 10.1 प्रतिशत लोगों ने अवैध निर्माण को अपने क्षेत्र की बड़ी समस्या माना। आंकड़ा छोटा है, लेकिन शायद यही सबसे बड़ा सवाल है, 'क्या हमने अतिक्रमण को समस्या मानना ही छोड़ दिया है?' दरअसल, जब कोई गलत चीज रोज होती है, लंबे समय तक होती है और उसके खिलाफ आवाज भी धीरे-धीरे धीमी पड़ जाती है, तो वह सिर्फ अतिक्रमण नहीं रहती। वह व्यवस्था का हिस्सा बनने लगती है।
अतिक्रमण करने वाला अकेला नहीं होता। उसे बढ़ने देने वाला 'सिस्टम' भी उसके कंधे से कंधा मिलाता है। नियम-कायदे किताब में धरे रह जाते हैं और जमीन पर अतिक्रमी का कब्जा हो जाता है।

चुनाव में सफाई, सड़क, पानी और सीवरेज पर सवाल होंगे। अतिक्रमण शायद उन सवालों में ऊपर न आए, लेकिन इस बार मतदाता को यह सवाल भी पूछना चाहिए। जिस शहर में फुटपाथ नजर से ओझल हो गए हों, वहां यह भी पूछना जरूरी है कि क्या वह अतिक्रमण हटाएगा। उम्मीदवारों से अतिक्रमण के खिलाफ साफ और समयबद्ध लिखित संकल्प मांगिए। पूछिए…सार्वजनिक रास्ते, फुटपाथ, नाले और सरकारी जमीन को कब्जामुक्त कराने के लिए आप क्या करेंगे? कब करेंगे? और अपने वादे का हिसाब जनता को कब देंगे?

ध्यान रहे, चुनाव सिर्फ पांच साल के लिए किसी को चुनने का अवसर नहीं है। यह पांच साल के काम का हिसाब तय करने का भी मौका है। इस बार वोट देने से पहले इतना जरूर तय करें कि आपके रास्ते आजाद हों और आपके वोट पर भी किसी वादे का कब्जा न हो।