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सफलता के बाद क्यों भटक जाती हैं कंपनियां?

अंतत: संगठन नवाचार और दक्षता के बजाय जोखिम को कम करने पर केंद्रित हो जाता है, जिससे उसकी उत्पादकता और निवेश-प्रतिफल दोनों प्रभावित होते हैं।

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May 19, 2026
company fail nowdays

जी. एन. बाजपेयी, (सेबी और एलआइसी के पूर्व अध्यक्ष), प्रवीण तिवारी (पूर्व उप नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक)- प्रबंधन मैनेजमेंट गुरु पीटर ड्रकर ने 1980 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'मैनेजिंग इन टर्बुलेंट टाइम्स' में लिखा था- अस्थिरता के समय सबसे बड़ा खतरा खुद अस्थिरता नहीं, बल्कि पुरानी सोच के साथ काम करना होता है। आज भारत की कई प्रतिष्ठित ब्लू-चिप कंपनियां इसी पुरानी सोच की शिकार नजर आती हैं। कभी शेयर बाजार की चहेती रही इन कंपनियों में पिछले एक दशक में निवेश पर मिलने वाला रिटर्न निफ्टी और सेंसेक्स जैसे बेंचमार्क से भी कम रहा है। यही वजह है कि बड़े विदेशी निवेशक अब धीरे-धीरे और लगातार इन कंपनियोंं से अपने हाथ खींच रहे हैं।

मनुष्य जीवन की तरह कंपनियों के जीवन में भी एक दौर आता है, जिसे 'कॉर्पोरेट मिडलाइफ क्राइसिस' (मध्यावस्था का संकट) कहते हैं। यह अबूझ संकट तब शुरू होता है जब कंपनी अपनी दिशा, दृढ़ता और चुस्ती खोने लगती है और नवाचार के बजाय अपनी पुरानी साख के भरोसे जीने लगती है। यह गिरावट बहुत धीमे से आती है और शुरू में इस पर ध्यान ही नहीं जाता। जैसे मनुष्यों का जन्म, विकास और बुढ़ापा होता है, वैसे ही कंपनियां भी इन चरणों से गुजरती हैं। संकट धीरे-धीरे दिखाई देने लगता है, लेकिन खतरा तब बढ़ जाता है जब नेतृत्व यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि उनका संगठन मध्यावस्था के संकट में फंस चुका है। जब कोई संगठन 10-15 साल तक निरंतर सफलता, स्थिरता और विशाल आकार प्राप्त कर लेता है, तब उसके अंदर 'आत्मसंतुष्टि' का भाव आ जाता है। इंटेल के पूर्व सीईओ एंडी ग्रोव ने कभी कहा था, 'सफलता आत्मसंतुष्टि को जन्म देती है। आत्मसंतुष्टि विफलता को जन्म देती है और केवल वही जीवित रहते हैं जो सदैव सावधान रहते हैं।' सफलता का नशा संगठन की संरचना, प्रणालियों, प्रक्रियाओं और संस्कृति को कठोर तथा अत्यधिक औपचारिक बना देता है और उसकी स्वाभाविक ऊर्जा एवं गतिशीलता दबने लगती है। नेतृत्व का उत्साह ठंडा हो जाता है। वह वास्तविकताओं से कटकर हवाई किले में रहने लगता है और आखिर में मात्र रखरखाव प्रबंधक बनकर रह जाता है। अंतत: संगठन नवाचार और दक्षता के बजाय जोखिम को कम करने पर केंद्रित हो जाता है, जिससे उसकी उत्पादकता और निवेश-प्रतिफल दोनों प्रभावित होते हैं।

आज का भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक राष्ट्रवाद, तकनीकी बदलाव और उपभोक्ताओं की बदलती रुचियों वाला वैश्विक परिदृश्य ऐसी कंपनियों के संकट को और बढ़ा रहा है। दुर्भाग्यवश अनेक कंपनियां इस बदलते परिवेश के प्रभाव का अनुमान न कर सकीं और यदि किया भी तो शायद उसे अनदेखा कर गईं। कॉर्पोरेट मध्यावस्था संकट लंबे समय तक मिली सफलता की उपज है, विफलता की नहीं। समय पर पहचान कर इसे टाला जा सकता है, जहां ऐसा नहीं होता वहां संगठन को तेजी से सही रणनीतियां अपनाकर उन्हें कठोरता से लागू करना पड़ता है। इस संकट से बाहर निकलने के लिए कंपनियों को पुनर्विचार यात्रा शुरू करनी होगी। कंपनियों को खुद से पूछना चाहिए-'हमारा अस्तित्व क्यों है', 'हम किन समस्याओं का समाधान करते हैं', 'हम क्या मूल्य सृजित करते हैं' और हम यह कैसे करते हैं? ये प्रश्न भविष्य को नए सिरे से परिभाषित करने में मदद करेंगे। जब कंपनी अपना लक्ष्य आज के दौर और ग्राहकों की जरूरतों के हिसाब से दोबारा तय करती है, तो उसमें नई जान फंूकी जा सकती है। विडंबना यह है कि इस महत्त्वपूर्ण पहलू की अक्सर उपेक्षा की जाती है। परिवर्तन तभी संभव है, जब पुराने ढर्रे में फंसे रहने के बजाय बदलाव को गले लगाया जाए।

चाल्र्स डार्विन ने कहा था, 'वही बचता है जो परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक अनुकूलनशील होता है।' नेतृत्व को मूल्य नष्ट करने वाले और मूल्य का निर्माण वाले तत्वों के बीच अंतर करने वाला नया दृष्टिकोण विकसित करना होगा। उसे विफलताओं और ठहराव से सीखना होगा, प्रयोगों को प्रोत्साहित करना होगा तथा संतुलित जोखिम उठाने की संस्कृति विकसित करनी होगी। आज भारतीय कंपनियों को इस प्रवृत्ति को पहचानने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। कई परिपक्व संगठन अंतर्मुखी हो जाते हैं। उनका ग्राहक पर ध्यान कम हो जाता है और बैठकें, प्रक्रियाएं एवं आंतरिक मामले हावी होने लगते हैं। इनमें उलझने के बजाय ऐसे में ग्राहक के वर्तमान और भविष्य के व्यवहार, उनकी अपेक्षाओं और आकांक्षाओं का निरंतर अध्ययन करके उसकी जरूरत को समझना होगा। यदि संगठन ऐसे उत्पाद और सेवाएं देता है जो ग्राहकों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती, तो उसका पतन निश्चित हो जाता है।

अगर कोई संगठन पुरानी सोच और अस्पष्ट लक्ष्यों के साथ चलता रहता है, तो उसके खत्म होने में भी देर नहीं लगती। एक सफल वापसी के लिए कंपनी को अपनी असली ताकतों को पहचानना होगा और भविष्य के नए अवसरों पर ध्यान देना होगा। सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू नेतृत्व के ढांचे को पुनर्जीवित करना है। संकट के दौरान कर्मचारी स्पष्टता और दिशा के लिए नेतृत्व की ओर देखते हैं। इसलिए नेतृत्व को खुद आगे बढ़कर उदाहरण पेश करना होगा। इसके लिए सबसे जरूरी है कि नेतृत्व खुद एक बेहतर भविष्य का सपना देखे और अपनी टीम को भी उस लक्ष्य की ओर बढऩे के लिए प्रेरित करे।

Published on:
19 May 2026 01:00 pm
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