ओपिनियन

ये ‘जेन-जी लोग’ नहीं, हमारे भविष्य के शिल्पकार हैं

जेन-जी को केवल मोबाइल, सोशल मीडिया और बदलते संस्कारों से जोड़कर देखना सही नहीं है। यह ऐसी पीढ़ी है जो सवाल करती है, अपनी पहचान बनाना चाहती है और देश के भविष्य में योगदान देने की आकांक्षा रखती है। पीढ़ियों के बीच टकराव के बजाय संवाद जरूरी है।
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Aug 20, 2026
GenZIndia
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पिछले दिनों एक बैठक में नई पीढ़ी पर चर्चा हो रही थी। मोबाइल, सोशल मीडिया और बदलते संस्कारों को लेकर चिंताएं सामने आईं। तभी किसी ने मुस्कुराकर कहा, ‘अरे, ये जेन- जी लोग।’ बात सहज थी, लेकिन यह ‘ये’ मन में अटक गया। आखिर हमारे और हमारी अगली पीढ़ी के बीच यह दूरी कब आ गई? जिन बच्चों को हमने उंगली पकडकऱ चलना सिखाया, जिनके सपनों में अपना भविष्य देखा, वे अचानक ‘ये लोग’ कैसे हो गए? शायद समस्या जेन- जी नहीं, बल्कि वह नजरिया है जिससे हम उसे देखते हैं।
हर नई पीढ़ी अपने समय से सवाल करती है। युवावस्था का स्वभाव ही प्रश्न है। भगत सिंह भी अपने समय के सवालों से जूझने वाले युवा थे। परिस्थितियां अलग थीं, साधन अलग थे, लेकिन भीतर अपने समय को बदलने की बेचैनी थी। आज के युवा के सवाल अलग हैं, लेकिन आकांक्षा वही है, कुछ नया करने की, अपनी पहचान बनाने की और देश के भविष्य में योगदान देने की। इसे पीढिय़ों का अंतर कहकर बात खत्म कर देना आसान है। लेकिन राष्ट्र निर्माण पीढिय़ों के टकराव से नहीं, उनके संवाद से होता है।
भाषणों से नहीं आती राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी
हमारी शिकायत है कि युवा हर समय मोबाइल में डूबा रहता है। शिकायत में सच्चाई हो सकती है, लेकिन सवाल हमसे भी है। क्या बच्चे हमें किताब पढ़ते देखते हैं? क्या भोजन की मेज पर हमारा मोबाइल दूर रहता है? क्या हमने उन्हें दादा-दादी की कहानियों, गांव की मिट्टी, अपनी भाषा, लोक परंपराओं और भारत की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा है? संस्कार केवल बताए नहीं जाते, वे जिए जाते हैं। राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी भी केवल भाषणों से नहीं आती। वह परिवार, समाज, प्रकृति और संस्कृति के प्रति अपने कर्तव्य निभाने से विकसित होती है।
आज की जेन-जी के सामने पूरी दुनिया खुली है। एक मोबाइल पर काशी की आरती भी है और किसी विदेशी विश्वविद्यालय का व्याख्यान भी। हमारी पीढ़ी के लिए दुनिया एक नक्शा थी, इस पीढ़ी के लिए एक स्पर्श है। यह अवसर है, लेकिन चुनौती भी। सूचना के इस महासागर में परिवार और समाज को उसके लिए भरोसे का किनारा बनना होगा।
क्या यह पीढ़ी अपनी जड़ों से कट गई है? शायद नहीं। मंदिरों, तीर्थों और आध्यात्मिक आयोजनों में युवाओं की बढ़ती भागीदारी इसका प्रमाण है। वह परंपरा से दूर नहीं जा रही, बल्कि अपनी जड़ों तक पहुंचने का अपना रास्ता खोज रही है।

वह पूछेगी—क्यों? हमें इस ‘क्यों’ से डरना नहीं चाहिए। हमें परंपरा का मर्म, संस्कृति का दर्शन और भारत की सभ्यता की निरंतरता उसके सामने तर्क और अनुभव के साथ रखनी होगी। आधुनिक होना अपनी जड़ों को छोडऩा नहीं है। मजबूत जड़ें ही ऊंची उड़ान का आधार बनती हैं। जेन-जी को केवल रील, मीम और स्क्रीन की पीढ़ी मानना भी उसके साथ अन्याय है। यही युवा सेना में जाकर राष्ट्र की रक्षा का संकल्प लेता है। यही खेल के मैदान में तिरंगा ऊंचा करता है। यही स्टार्टअप खड़े करता है, विज्ञान और तकनीक में नए प्रयोग करता है और भारत की नई शक्ति का परिचय दुनिया को देता है। यह रील भी बनाता है और रिकॉर्ड भी, इस पीढ़ी में संवेदना भी है। पर्यावरण, समाज के कमजोर वर्ग और समान अवसर जैसे विषय इसे प्रभावित करते हैं। विचारों में हमसे असहमति हो सकती है, लेकिन संवेदना को खारिज नहीं किया जा सकता। सही दिशा मिले तो यही संवेदना सेवा और सेवा राष्ट्र निर्माण की शक्ति बन सकती है।
भारत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी जेन जी की
इस चमकती स्क्रीन के पीछे एक मन भी है। तुलना, प्रतियोगिता और सफलता का लगातार प्रदर्शन युवा पर दबाव डालता है। उसे केवल अनुशासन नहीं, विश्वास भी चाहिए। हर बार ‘हमारे जमाने में’ कहने के बजाय कभी उसके पास बैठकर कहना चाहिए, ‘कहो, मैं सुन रहा हूं।’ पीढिय़ों के बीच रिश्ता उपदेश का नहीं, सहभागिता का होना चाहिए। हमें उन्हें अपना अनुभव, संस्कृति और विवेक देना है, उनसे नई तकनीक, गति और दृष्टि सीखनी है।हम उन्हें जड़ों का पता बता सकते हैं, वे हमें नए आकाश का रास्ता दिखा सकते हैं। इसलिए अगली बार कोई कहे, ‘ये जेन-जी लोग’ तो उस ‘ये’ को हटा दीजिए। वे कोई अलग दुनिया नहीं हैं। वे भारत की निरंतर यात्रा का अगला अध्याय हैं। हमारे आज हैं, हमारे कल के शिल्पकार हैं।
हमने जिस भारत को पाया, उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अब उनके कंधों पर है। उन्हें अपने सांचे में ढालना हमारा काम नहीं। हमारा दायित्व है कि उनकी प्रतिभा, तकनीक और ऊर्जा को राष्ट्र की प्रगति से जुडऩे का अवसर दें क्योंकि भविष्य को आदेश देकर नहीं बनाया जाता।
भारत की नई चेतना है जेन-जी
भविष्य की पीढ़ी पर विश्वास करके बनाया जाता। भारत की अगली कहानी इन्हीं हाथों को लिखनी है। हमारा काम है कि जब वे आकाश की ओर उड़ान भरें, तो उनकी जड़ें भारत की मिट्टी में और उनका संकल्प राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा रहे।क्योंकि यह केवल जेन-जी नहीं है—यह भारत की नई ऊर्जा है, भारत की नई चेतना है, और भारत के विकसित भविष्य की सबसे बड़ी संभावना है। कल का भारत कैसा होगा, उसकी इबारत इन्हीं आंखों के सपनों से बनेगी। उसके रंग इन्हीं कल्पनाओं से आएंगे। उसकी गति इन्हीं कदमों से तय होगी इसलिए उन्हें कटघरे में खड़ा करने के बजाय उनके साथ खड़े होइए। उनसे शिकायत कम कीजिए। संवाद अधिक कीजिए। उन्हें सुनिए। उन्हें समझिए। और सबसे बढकऱ, उन पर भरोसा कीजिए। क्योंकि भविष्य को अपने सांचे में ढाला नहीं जाता। भविष्य का हाथ थामा जाता है। उसके साथ चला जाता है। याद रखिए, भारत की अगली कहानी किसी और को नहीं, इन्हीं हाथों को लिखनी है।

Updated on:
20 Aug 2026 06:52 pm
Published on:
20 Aug 2026 06:02 pm