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वैज्ञानिक प्रमाण और ठोस आर्थिक सोच के साथ बढ़ें

ई-20 पेट्रोल ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में अहम कदम है, लेकिन इसकी सफलता केवल मिश्रण के लक्ष्य से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय और आर्थिक प्रभावों के संतुलित आकलन से तय होगी।
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जयपुर

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Opinion Desk

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अशोक खेमका भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी

Aug 20, 2026

ethanol

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भारत में ईंधन के रूप में ई-20 पेट्रोल को अपनाना दुनिया की बड़ी जैव-ईंधन पहलों में है। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की मात्रा जो 2013-14 में करीब 1.5 प्रतिशत थी वर्ष 2025 में बढ़ कर लगभग 20 प्रतिशत हो गई है। इससे कच्चे तेल के आयात में कमी, ग्रामीण आय में वृद्धि और ऊर्जा संसाधनों में विविधता आई है। ये उपलब्धियां हैं, लेकिन ई-10 से ई-20 की ओर बढ़ते समय नीति का आधार केवल मिश्रण लक्ष्य नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाण और ठोस आर्थिक सोच हो। हर तरह का एथेनॉल समान रूप से पर्यावरण अनुकूल नहीं होता। भारत में एथेनॉल सी-हैवी और बी-हैवी शीरे, गन्ने के रस, मक्का, खराब खाद्यान्न और अतिरिक्त चावल से बनाया जा रहा है। हर स्रोत का पर्यावरण पर अलग असर पड़ता है। एक पैमाना एनर्जी रिटर्न ऑन एनर्जी इन्वेस्टेड यानी बनाने में खर्च की गई ऊर्जा के बदले में हासिल ऊर्जा है। यह खेती, उर्वरक, सिंचाई, ढुलाई और आसवन में खर्च जीवाश्म ऊर्जा की तुलना उत्पादन से मिलने वाली ऊर्जा से करता है।

खोई से चलने वाली डिस्टिलरी का गन्ना एथेनॉल ऊर्जा प्रतिफल 2 से 4 के बीच होता है, जबकि अनाज से बने एथेनॉल का 1.2 से 2 तक रहता है, क्योंकि इसमें जीवाश्म ऊर्जा अधिक लगती है। एथेनॉल शुद्ध ऊर्जा लाभ देता है, लेकिन इसकी मात्रा कच्चे माल, खेती और प्रसंस्करण की तकनीक पर निर्भर करती है। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ईंधन की ऊर्जा क्षमता है। एक लीटर पेट्रोल में करीब 32 मेगाजूल, जबकि एथेनॉल में लगभग 21 मेगाजूल ऊर्जा होती है। इसलिए ई-20 में शुद्ध पेट्रोल की तुलना में 6-7 प्रतिशत कम ऊर्जा होती है, जिससे माइलेज कुछ घट सकता है। हालांकि, अधिक ऑक्टेन रेटिंग वाले ई-20-अनुकूल इंजन इस कमी की भरपाई कर सकते हैं। वाहनों की अनुकूलता भी मुद्दा है। एथेनॉल नमी सोखता है, जिससे कुछ धातुओं में जंग और पुराने रबर सील व प्लास्टिक के हिस्सों को नुकसान हो सकता है। इसलिए सरकार ने अप्रेल 2023 से बने वाहनों को ई-20 के अनुकूल बनाना अनिवार्य किया है लेकिन यह मान लेना पर्याप्त नहीं कि सभी गाडिय़ां ई-20 के अनुकूल हैं। उपभोक्ताओं को स्पष्ट जानकारी, तकनीकी सहायता और कम मिश्रण वाले ईंधन उपलब्ध होने चाहिए।

ब्राजील ने एथेनॉल को सिर्फ अनिवार्य मिश्रण कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा, बल्कि दशकों में अपने विशाल गन्ना उत्पादन के आधार पर पूरा एथेनॉल-ईंधन तंत्र विकसित किया। वहां एथेनॉल पेट्रोल में मिलाने के साथ स्वतंत्र ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल होता है। वाहन चालक एथेनॉल मिश्रित गैसोलीन या हाइड्रस एथेनॉल (ई-100) चुन सकते हैं, जबकि फ्लेक्स-फ्यूल वाहन अलग-अलग मिश्रणों पर चलते हैं। वहां उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प और लचीलापन मिलता है। इसके उलट, भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण अनिवार्य है और देशव्यापी ई-20 है। उपभोक्ता आमतौर पर एथेनॉल मिश्रण की मात्रा नहीं चुन सकता। बाजार के पेट्रोल में इसकी मात्रा पहले से निर्धारित है। इसलिए ब्राजील की मिसाल भर से भारत की ई-20 नीति को सही नहीं ठहराया जा सकता। इसके लाभों का आकलन भारत की जल, भूमि, खाद्य, ऊर्जा और वाहन संबंधी परिस्थितियों के आधार पर हो। एथेनॉल के जलवायु प्रभाव का आकलन खेती, खाद, सिंचाई, ढुलाई और प्रसंस्करण के उत्सर्जन सहित पूरे जीवन-चक्र के आधार पर होना चाहिए।

कुशल तरीके से तैयार गन्ने का एथेनॉल पेट्रोल की तुलना में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 50-70 प्रतिशत तक घटा सकता है। अनाज से बने एथेनॉल में यह कमी 20-50 प्रतिशत रहती है। लेकिन डीजल सिंचाई, जीवाश्म ईंधन वाली डिस्टिलरी या जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन खाद के इस्तेमाल से यह लाभ घट जाता है। इसलिए एथेनॉल पेट्रोल से बेहतर हो सकता है, लेकिन पूरी तरह कार्बन न्यूट्रल नहीं है। सबसे गंभीर चुनौती पानी की है। गन्ना सबसे अधिक पानी खपत वाली फसलों में है। देश के कुल बोए क्षेत्र में इसका हिस्सा 5 प्रतिशत से कम है, लेकिन सिंचाई के पानी में इसकी हिस्सेदारी काफी अधिक है। गन्ने को पूरे फसल चक्र में करीब 1,500 से 2,500 मिमी पानी चाहिए, जबकि एक लीटर गन्ना एथेनॉल बनाने में करीब 2,000 से 3,500 लीटर पानी खर्च हो सकता है। संसाधनों का सही हिसाब न रखा गया तो कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने के साथ घटते मीठे पानी के भंडारों पर निर्भरता बढ़ सकती है।

मौजूदा नीतियां आर्थिक प्रोत्साहनों को भी विकृत कर रही हैं। सस्ती बिजली भूजल के बेहिसाब दोहन और सब्सिडी वाला यूरिया नाइट्रोजन खाद के अति-उपयोग को बढ़ावा देता है। इससे गन्ने की वास्तविक पर्यावरणीय लागत सामने नहीं आती और उन क्षेत्रों में भी एथेनॉल उत्पादन बढ़ सकता है, जहां इसकी सामाजिक लागत अधिक है। बेहतर होगा कि किसानों को सीधे आय सहायता दी जाए और बिजली, सिंचाई व उर्वरकों की कीमतों में उनकी वास्तविक आर्थिक और पर्यावरणीय लागत शामिल की जाए। इससे एथेनॉल उत्पादन अधिक ऊर्जा लाभ व कम कार्बन उत्सर्जन वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ेगा। साथ ही, कृषि अवशेषों और गैर-खाद्य जैविक पदार्थों से बनने वाले दूसरी पीढ़ी के एथेनॉल में निवेश बढ़ाने से जमीन और पानी पर दबाव कम होगा। भारत का एथेनॉल कार्यक्रम ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसकी दीर्घकालिक सफलता पर्यावरणीय लक्ष्यों और आर्थिक विवेक के संतुलन पर निर्भर करेगी। एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य जरूरी हैं, पर उन्हें अंतिम लक्ष्य नहीं बनना चाहिए। टिकाऊ जैव-ईंधन नीति पारदर्शी कार्बन लेखांकन, पानी के इस्तेमाल के आकलन और प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर आधारित हो। तभी एथेनॉल आयातित तेल का विकल्प ही नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा यात्रा का टिकाऊ हिस्सा बन सकेगा।