
Great Nicobar Project : ओडिशा हो या अंडमान-निकोबार, विकास के नाम पर बलि अक्सर आदिवासियों को ही देनी पड़ती है। वे अपना जंगल, जमीन और घर छोड़कर विस्थापित होने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इनके हक की लड़ाई के लिए जहां नर्मदा बचाओ आंदोलन, बड़वानी, मध्य प्रदेश से मेधा पाटकर सक्रिय हैं, वहीं ओडिशा में प्रफुल्ल सामंतरा आदिवासियों के संघर्ष का नेतृत्व कर रहे हैं। इसी साल भारत सरकार ने 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' की घोषणा की है, जो रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भारत के लिए 'होर्मुज जलडमरूमध्य' की तरह महत्वपूर्ण है।
इस परियोजना के कारण यहां की दुर्लभ जनजातियों के अस्तित्व पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
अल जजीरा और इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली की रिपोर्टों के अनुसार, साल 2024 में 39 अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों (नरसंहार मामलों के विशेषज्ञ) ने भारत के राष्ट्रपति को पत्र लिखकर आगाह किया था कि यह ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट शोंपेन जनजाति के लिए 'डेथ सेंटेंस' (मृत्युदंड) साबित हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार इसे 'नरसंहार' की श्रेणी में माना जाएगा।
ज्ञात हो कि इस क्षेत्र में जारवा, उत्तरी सेंटिनली, ग्रेट अंडमानी, ओंगे और शोंपेन जैसी जनजातियां निवास करती हैं।
माना जाता है कि जारवा और उत्तरी सेंटिनली जनजातियां आज तक बाहरी दुनिया के संपर्क में नहीं आई हैं, वहीं करीब 400 शोंपेन आदिवासी परिवारों का जीवन दांव पर है। इस द्वीप पर रहने वाले शोंपेन और निकोबारी आदिवासियों के अस्तित्व को सीधा खतरा है, क्योंकि ग्रेट निकोबार परियोजना के लिए जो 166.1 वर्ग किलोमीटर जमीन ली जा रही है, उसका आधा हिस्सा इन आदिवासियों के लिए आरक्षित (संरक्षित) क्षेत्र में आता है।
सरवाइवल इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, ये आदिवासी अब तक मुख्यधारा के समाज के संपर्क में नहीं आए हैं, जबकि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों के आदिवासी काफी हद तक बाहरी दुनिया से जुड़ चुके हैं। इस प्रोजेक्ट के कारण यदि ये लोग बाहरी दुनिया के संपर्क में आते हैं, तो आधुनिक बीमारियों और अन्य तरह के जोखिमों का खतरा बढ़ जाएगा। चूंकि इनकी जनसंख्या पहले से ही बेहद कम है, इसलिए यह दुर्लभ जनजाति पूरी तरह विलुप्त भी हो सकती है।
विपक्ष के नेता और सांसद राहुल गांधी ने 'विश्व पर्यावरण दिवस 2026' के अवसर पर अपने यूट्यूब चैनल पर जारी एक वीडियो में इसे आदिवासियों से जमीन छीनने वाला विनाशकारी विकास करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों के लिए किया जा रहा है।
सोचने वाली बात यह है कि जो आदिवासी आज तक बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे हुए हैं, वे अचानक घुल-मिल नहीं सकते। इसलिए उनके पुनर्वास और मुख्यधारा में रोजगार के बारे में सोचना भी व्यावहारिक नहीं है।
ऐसी स्थिति में यदि सरकार की नीयत साफ भी हो, तो भी पारंपरिक तरीकों से उनकी मदद करना असंभव है।
एक कड़वा सच यह भी है कि विस्थापित आदिवासियों को दिया जाने वाला मुआवजा अक्सर "ऊंट के मुंह में जीरा" साबित होता है और पुनर्वास नीतियां जमीनी स्तर पर नाकाम हो जाती हैं। उन्हें नई जगहों पर न तो बुनियादी सुविधाएं मिलती हैं और न ही स्थायी आजीविका, जिससे वे सामाजिक बहिष्कार का शिकार हो जाते हैं।
इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण छत्तीसगढ़ के लथ गांव में देखने को मिलता है, जहां एक 'ओपन-कास्ट' (खुली) कोयला खदान बनने से 400 कंवर आदिवासी परिवारों के धान के खेत नष्ट हो गए और उनकी आजीविका छिन गई। इस खदान के कारण उनके स्वच्छ पानी का प्राकृतिक स्रोत भी बंद हो गया। खदान के कचरे ने उनकी जीवनरेखा मानी जाने वाली नदी को प्रदूषित कर दिया, जिस पर वे मछली पकड़ने, नहाने और कपड़े धोने के लिए निर्भर थे।
इतना ही नहीं, रोजगार के नाम पर लथ गांव के आदिवासियों को कागजों पर तो खदान कंपनी (एसईसीएल) में काम करते हुए दिखाया गया (ताकि सरकारी दस्तावेजों में सफल पुनर्वास साबित किया जा सके), लेकिन हकीकत में उनके पास न कोई नौकरी थी और न ही आय का कोई साधन।
संक्षेप में, इस तरह की परियोजनाएं आदिवासियों को उनके जल, जंगल और जमीन से हमेशा के लिए बेदखल कर देती हैं। विकास के नाम पर उनकी प्राकृतिक संपदा छीन ली जाती है, जिससे उनका सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अस्तित्व पूरी तरह उजड़ जाता है।
अब यही संकट निकोबार के आदिवासियों के सामने खड़ा है।
भौगोलिक दृष्टि से देखें तो दुनिया का एक-तिहाई व्यापार और चीन का 80 प्रतिशत कच्चा तेल इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। इस जगह की रणनीतिक स्थिति भारत को चीन की नौसैनिक गतिविधियों पर नजर रखने और हिंद महासागर क्षेत्र में एक संतरी के रूप में बढ़त हासिल करने में मदद कर सकती है। इस लिहाज से प्रोजेक्ट के आर्थिक और सुरक्षा संबंधी लाभ बहुत अधिक हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है।
लेकिन इसके बदले में भारत अपनी उन दुर्लभ जनजातियों को हमेशा के लिए खो देगा जो मानव इतिहास की धरोहर हैं। साथ ही एक अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो जाएगा और लगभग 130 से 161 वर्ग किलोमीटर का सघन वर्षावन साफ हो जाएगा। सबसे बड़ा सच तो यह है कि हम प्रकृति की इन अनमोल धरोहरों को दोबारा नहीं बना सकते, चाहे हम कितनी भी कोशिश क्यों न कर लें।
अंडमान और निकोबार जनजातीय अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान (रिसर्च एडवाइजरी बोर्ड) के पूर्व सदस्य मनीष चंडी ने अल जजीरा से बातचीत में कहा कि यह प्रोजेक्ट स्वभाव से 'औपनिवेशिक' है और इसका मुख्य उद्देश्य व्यावसायिक है। उन्होंने कहा कि जब इस प्रोजेक्ट का विरोध शुरू हुआ, तब सरकार ने इसे "राष्ट्रीय सुरक्षा" का आवरण दे दिया। उन्होंने इस परियोजना को भारत के पर्यावरण और मूल निवासियों के लिए विनाशकारी बताया है।