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Omkareshwar : औरंगजेब ने इस मंदिर के शिवलिंग में देखा था अपना भविष्य, क्यों लगा दी थी आग?

Omkareshwar Temple: मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर स्थित गौरी-सोमनाथ मंदिर की रहस्यमयी मान्यताएं सदियों से श्रद्धालुओं को आकर्षित करती रही हैं। यहां सफेद शिवलिंग के काला पड़ने की कहानी और मामा-भांजे से जुड़ा अनोखा रहस्य लोगों के बीच गहरी आस्था और जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है। पढ़िए जितेंद्र सिंह चौहान की दिलचस्प रिपोर्ट।
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Oct 19, 2026
Omkareshwar Temple
यहां स्थापित शिवलिंग में दिखता था भूत, भविष्य और वर्तमान (Photo: Patrika)

Omkareshwar Gauri Somnath Mandir : ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर में गौरी-सोमनाथ का एक प्राचीन शिव मंदिर है, जिसके साथ जुृड़ी कहानियां सुनकर लोग अचंभित रह जाते हैं। मान्यता है कि यहां स्थापित सफेद शिवलिंग के सामने खड़े होकर व्यक्ति को अपने अगले जन्म का दृश्य दिखाई देता था। कहते हैं, मुगल शासक औरंगजेब ने भी इस शिवलिंग के सामने अपना भविष्य देखने की कोशिश की थी। जब उसे अगले जन्म में शूकर बनने का दृश्य दिखाई दिया तो वह क्रोधित हो गया और उसने शिवलिंग में आग लगा दी थी। इसके बाद शिवलिंग का सफेद रंग काला पड़ गया। मंदिर के पुजारी सुनील सोने इसकी पुष्टि करते हैं और बताते हैं कि इस घटना के निशान शिवलिंग पर देखे जा सकते हैं।

शिवलिंग में दिखता था भूत, भविष्य और वर्तमान

गौरी-सोमनाथ मंदिर के विशाल शिवलिंग को लेकर सबसे बड़ी मान्यता है कि इसमें दर्शन करने वाले का भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों दिख जाते थे। प्राचीन समय में यह विशालकाय शिवलिंग सफेद रंग का था। इसमें घटित होने वाली आकृतियां दिखाई देती थीं। यहां तक कि सामने खड़े होने वाले व्यक्ति को अपने अगले जन्म के बारे में पता चल जाता था। बताया जाता है कि शिवलिंग के इस चमत्कारिक गुण के कारण ही औरंगजेब यहां आया और अपना भविष्य जानना चाहा। शिवलिंग में उसे शूकर के रूप में अपना अगला जन्म दिखाई दिया। इससे नाराज औरंगजेब ने शिवलिंग में आग लगा दी। बाद में शिवलिंग सफेद से काला हो गया। आज भी श्रद्धालु शिवलिंग के रंग और उस पर दिखाई देने वाले निशानों को इसी कहानी से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, यह कहानी स्थानीय जनश्रुति के रूप में प्रचलित है। इसके ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसके बावजूद इस कहानी ने मंदिर को एक अलग रहस्यमयी पहचान दी है।

श्रद्धालुओं से अनछुआ मंदिर

गौरी-सोमनाथ का मंदिर ओंकार पर्वत परिक्रमा मार्ग पर है। इसकी भव्यता और प्राचीनता के बावजूद यह श्रद्धालुओं से अनछुआ है। लाखों श्रद्धालु ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर आते हैं, लेकिन यहां नहीं पहुंचते हैं। दरअसल, इसके पीछे वजह मंदिर का ज्यादा प्रचार-प्रसार नहीं होना है। हालांकि, जब श्रद्धालु मंदिर में मौजूद भव्य शिवलिंग को देखते हैं तो भावविभोर हो जाते हैं।

Photo: Rajasthan Patrika

मामा-भांजे के नाम से भी जाना जाता है मंदिर

गौरी-सोमनाथ मंदिर की एक और खास पहचान यहां के दो शिवलिंग हैं। पुजारी सुनील सोने के अनुसार, गर्भगृह में स्थापित विशाल शिवलिंग को मामा और मंदिर के बाहर स्थित छोटे शिवलिंग को भांजा कहा जाता है। मान्यता है कि मामा और भांजे दोनों शिवलिंगों को बांहों में भरकर बड़े शिवलिंग को आसानी से घेरा जा सकता है। यह भी कहा जाता है कि आज भी सगे मामा-भांजा आते हैं तो ​​शिवलिंग को अपने बाहों में ले सकते है। यही वजह है कि यह मंदिर मामा-भांजे के मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है।

कौरवों ने एक रात में बनाया था मंदिर!

गौरी-सोमनाथ मंदिर की एक प्रचलित कथा महाभारत के कौरवों और पांडवों से भी जुड़ी है। एक मान्यता यह भी है कि कौरव-पांडवों के बीच एक रात में मंदिर निर्माण की शर्त लगी थी। कहा जाता है कि सौ कौरवों ने मिलकर एक रात में गौरी-सोमनाथ मंदिर बना दिया था। वहीं पांच पांडवों द्वारा बनाया जा रहा सिद्धनाथ मंदिर निर्धारित समय में पूरा नहीं हो सका और उसका केवल गर्भगृह ही बन पाया। इसलिए यह मंदिर भी दो हिस्सों में नजर आता है।

Photo: Rajasthan Patrika

तीन मंजिला मंदिर में अद्भुत स्थापत्य कला

गौरी-सोमनाथ मंदिर केवल लोककथाओं के कारण ही खास नहीं है। इसकी संरचना और मूर्तिकला भी प्राचीन भारतीय मंदिर स्थापत्य की झलक प्रस्तुत करती है। तीन मंजिला यह मंदिर कोणयुक्त आयताकार संरचना में निर्मित है। इसके गर्भगृह में ग्रेनाइट पत्थर से बना विशाल जलाधारी शिवलिंग प्रतिष्ठित है। गर्भगृह की देवकुलिका में स्थानक मुद्रा में चतुर्भुजी गौरी की प्रतिमा अंकित है। निचले भाग में परिवार की प्रतिमाओं और शिव द्वारपाल का अंकन दिखाई देता है। द्वार के वितान पर भगवान गणेश की प्रतिमा उकेरी गई है। मंदिर का सभामंडप वर्तमान में भग्न अवस्था में है, जबकि बाहरी भित्तियों पर अष्टदिक्पालों की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। मंदिर के सामने स्थापित विशाल नंदी की प्रतिमा इसकी धार्मिक और स्थापत्य महत्ता को और बढ़ाती है।

परमारकालीन विरासत में छिपी हैं कई कहानियां

मंदिर के जीर्णोद्धार का उल्लेख 10वीं-11वीं शताब्दी से जुड़ा मिलता है, जबकि मराठा काल में इसके शिखर का निर्माण कराए जाने की जानकारी मिलती है। इसकी प्राचीन संरचना, विशाल शिवलिंग और मूर्तिकला इसे ओंकारेश्वर की विशेष धार्मिक धरोहरों में शामिल करते हैं।

मंदिर को पुरातत्व की दृ​ष्टि से संवारने की जरूरत

गौरी-सोमनाथ मंदिर भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है। मंदिर की मान्यता और इससे जुड़ी कहानियों पर एक बार में विश्वास नहीं हो। जिस तरह का मंदिर का आकर्षक निर्माण हुआ है, मंदिर में जो नक्काशी है, यहां अलग-अलग स्थानों पर ज्योतिष व गणना आधारित प्रतिमाओं को विराजित किया है। एक ही मंदिर तीन मंजिला बना है, अपने आप में इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाता है। अब जरुरत है मंदिर से जुड़ी किंवदती पर शोद्य हो। वहीं मंदिर की देखरेख पुरातत्व की दृ​ष्टि से हो। खासकर इस मंदिर का प्रचार-प्रसार किया जाए। ताकि देशभर से हिंदू संस्कृति और ​शिव परंपरा से जुड़े भक्त इस मंदिर के बारे में जान सके।

Updated on:
19 Oct 2026 11:14 am
Published on:
19 Oct 2026 11:14 am