Panchayati Raj Day Special: छत्तीसगढ़ में पेसा एक्ट के प्रभावी क्रियान्वयन की तैयारी के साथ बस्तर में शासन का मॉडल बदलने की दिशा में कदम बढ़ा है, जहां फैसले अब ग्राम सभाओं के जरिए गांव स्तर पर लिए जाने की पहल हो रही है।
Panchayati Raj Day Special: छत्तीसगढ़ के लंबे समय तक संघर्ष, नक्सल प्रभाव और विकास की चुनौतियों से जूझता बस्तर अब देश के सामने विकेंद्रीकृत शासन का एक नया मॉडल पेश करने की ओर बढ़ रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासी बहुल क्षेत्रों में PESA Act को प्रभावी रूप से लागू करने की तैयारी में है। यदि यह पहल सफल होती है, तो फैसलों का केंद्र राजधानी से हटकर सीधे गांवों की ग्राम सभाओं में स्थापित होगा।
पेसा कानून के लागू होने के बाद विकास की दिशा तय करने का अधिकार सीधे ग्राम सभा को मिलेगा। अब तक योजनाएं शीर्ष स्तर पर बनती थीं और गांवों तक पहुंचती थीं, लेकिन अब यह प्रक्रिया उलट जाएगी। गांव खुद तय करेंगे कि प्राथमिकता सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य या पेयजल को दी जाए।
पेसा एक्ट का मूल उद्देश्य आदिवासी समुदाय को उनके पारंपरिक संसाधनों पर अधिकार देना है। लघु वनोपज के संग्रहण, उपयोग और व्यापार से लेकर स्थानीय संसाधनों के दोहन तक हर निर्णय में ग्राम सभा की स्वीकृति अनिवार्य होगी। इससे आदिवासी समुदाय को आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक सशक्तिकरण मिलेगा।
बस्तर की परंपराओं के अनुरूप अब प्रशासनिक निर्णय एयरकंडीशनर कमरों में नहीं, बल्कि गांव की चौपालों और साल-सागौन के पेड़ों के नीचे बैठकर लिए जाएंगे। यह न केवल पारंपरिक लोकतंत्र को मजबूत करेगा, बल्कि स्थानीय सहभागिता को भी बढ़ाएगा।
पेसा कानून लागू होने के बाद प्रशासनिक ढांचे में भी व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा। अधिकारी अब ‘निर्देश देने वाले’ नहीं, बल्कि ‘सहयोगी’ की भूमिका में होंगे। इससे निर्णय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनेगी, साथ ही स्थानीय जरूरतों के अनुरूप योजनाएं तैयार होंगी।
हालांकि इस कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के सामने कई चुनौतियां भी हैं। बस्तर क्षेत्र में गैर-आदिवासी वर्ग और कुछ व्यवसायिक समूहों के बीच इस कानून को लेकर आशंकाएं हैं, विशेषकर संसाधनों के उपयोग और अधिकारों के बंटवारे को लेकर। इन आशंकाओं को दूर करना सरकार के लिए एक अहम चुनौती होगी।
गृहमंत्री Vijay Sharma इस कानून को बस्तर में भरोसा बहाल करने का महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, नक्सलवाद की जड़ में स्थानीय लोगों का निर्णय प्रक्रिया से बाहर होना एक बड़ा कारण रहा है। पेसा के माध्यम से जब गांवों को अपने विकास का निर्णय लेने का अधिकार मिलेगा, तो शासन और जनता के बीच दूरी कम होगी और स्थायी शांति की दिशा में मजबूत कदम साबित होगा।
73rd Constitutional Amendment के बाद देश में पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई, लेकिन अनुसूचित क्षेत्रों की विशेष सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1996 में पेसा कानून बनाया गया। यह कानून आदिवासी समुदाय को उनकी परंपराओं के अनुसार स्वशासन करने, प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने का संवैधानिक अधिकार प्रदान करता है।
यदि पेसा कानून का प्रभावी और पारदर्शी क्रियान्वयन सुनिश्चित होता है, तो बस्तर न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के लिए एक आदर्श मॉडल बन सकता है। यहां विकास, परंपरा और लोकतंत्र का संतुलन एक नई दिशा देगा।