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MBBS Seats : डॉक्टर बनने का सपना हो रहा चूर, फीस और नियमों के फेर में निजी मेडिकल कॉलेजों से स्टूडेंट हो रहे दूर

राजस्थान में एमबीबीएस प्रवेश प्रक्रिया के तीसरे चरण के बाद मेडिकल शिक्षा का समीकरण बदलता नजर आ रहा है। सरकारी और राजमेस कॉलेजों में सीटें भरने का दावा है, जबकि निजी मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में सीटें खाली हैं। स्ट्रे वैकेंसी राउंड में नए विकल्प भरने और अंतिम दौर में सीट छोड़ने पर रोक की तैयारी है। इस बारे में विकास जैन की खास रिपोर्ट पढ़िए।
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Oct 19, 2026
MBBS
राजस्थान में एमबीबीएस प्रवेश प्रक्रिया के समीकरण में बदलाव आए हैं। (ChatGpt)

MBBS Seats : डॉक्टर बनने के लिए दिन-रात पढ़ाई करने वाले हजारों विद्यार्थियों के सामने अब एक बड़ा सवाल है- क्या नीट में पात्रता हासिल कर लेने भर से एमबीबीएस की सीट मिल सकती है? राजस्थान में नीट-यूजी 2026 (NEET-UG 2026) की तीसरे चरण की काउंसलिंग के बाद सामने आई तस्वीर इस सवाल को और गंभीर बनाती है।

एक तरफ सरकारी और राजस्थान मेडिकल एजुकेशन सोसायटी (राजमेस) के मेडिकल कॉलेजों की सीटें भरने की जानकारी है, तो दूसरी तरफ निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की 1200 सीटें खाली बताई जा रही हैं। डेंटल कॉलेजों की सीटें भी रिक्त हैं। कुल मिलाकर मेडिकल और डेंटल की खाली सीटों को भरने के लिए अब प्रवेश प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच रही है।

एमबीबीएस में जुड़ी 1100 नई सीटें

यह स्थिति इसलिए भी चौंकाने वाली है, क्योंकि इसी वर्ष निजी मेडिकल कॉलेजों में करीब 1100 नई एमबीबीएस सीटें जुड़ी हैं। यानी जितनी नई सीटें बढ़ीं, लगभग उतनी ही सीटें खाली रहने की तस्वीर सामने आई है। सवाल सिर्फ विद्यार्थियों की संख्या या नीट में मिले अंकों का नहीं है। निजी मेडिकल शिक्षा की भारी फीस, कॉलेजों को लेकर विद्यार्थियों की प्राथमिकताएं, प्रवेश के नियम और न्यायालय के निर्देश भी इस पूरे समीकरण को प्रभावित कर रहे हैं।

पुरानी चॉइस शून्य मानी जाएगी, तो क्या करना होगा?

अब स्ट्रे वैकेंसी राउंड के जरिए इन सीटों को भरने की कोशिश होगी। लेकिन इस अंतिम चरण में विद्यार्थियों को पहले से भरे विकल्पों के भरोसे नहीं रहना चाहिए। पुरानी चॉइस शून्य मानी जाएगी और नए सिरे से विकल्प भरकर उन्हें लॉक करना अनिवार्य होगा। यानी एक छोटी-सी चूक भी मनपसंद कॉलेज में प्रवेश का अवसर प्रभावित कर सकती है।

निजी कॉलेजों में सीटें खाली, सरकारी विकल्पों की मांग ज्यादा

राजस्थान की काउंसलिंग में सामने आए रुझान चिकित्सा शिक्षा के बदलते समीकरण की ओर इशारा करते हैं। सरकारी और राजमेस कॉलेजों की सीटें भरने के बाद निजी मेडिकल कॉलेजों में बड़ी संख्या में सीटें खाली रहना बताता है कि विद्यार्थियों के लिए कॉलेज का चयन केवल प्रवेश मिलने तक सीमित नहीं है। फीस और पढ़ाई पूरी करने में आने वाला कुल खर्च भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की सालाना फीस करीब 25 लाख रुपए तक पहुंचती है, जबकि राजमेस कॉलेजों में फीस करीब 10 लाख रुपए के स्तर पर बताई जा रही है। दोनों के बीच बड़ा अंतर है। चार-पांच वर्ष की पढ़ाई और अन्य खर्चों को जोड़ें तो परिवारों पर आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है।

ऐसे में नीट में पात्रता हासिल कर चुके विद्यार्थी भी निजी कॉलेजों में प्रवेश लेने से पहले कई बार सोचते हैं। जिन परिवारों के लिए इतनी बड़ी राशि जुटाना मुश्किल है, उनके लिए निजी कॉलेज में सीट उपलब्ध होने का अर्थ यह नहीं कि वे वहां प्रवेश भी ले सकेंगे।=यही इस पूरी तस्वीर का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है- सीट खाली है, विद्यार्थी भी हैं, लेकिन दोनों के बीच आर्थिक क्षमता और प्रवेश संबंधी नियमों की दीवार खड़ी है।

अंक कम करने से नहीं, फीस पर विचार करने से भरेगी सीटें

अभिभावक और चिकित्सा शिक्षा मामलों के जानकार डॉ. राजेन्द्र कुमार शर्मा का कहना है कि खाली सीटें भरने के लिए प्रवेश की योग्यता के मानक कम करने के बजाय फीस निर्धारण पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, यदि निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस विद्यार्थियों और उनके परिवारों की आर्थिक क्षमता के अनुरूप हो, तो अधिक योग्य विद्यार्थी इन कॉलेजों में प्रवेश लेने पर विचार कर सकेंगे। इससे एक तरफ विद्यार्थियों को चिकित्सा शिक्षा के अधिक विकल्प मिलेंगे, दूसरी तरफ कॉलेजों की सीटें खाली रहने की समस्या कम करने में मदद मिल सकती है।

इस तर्क के पीछे एक व्यावहारिक सवाल भी है। जब किसी विद्यार्थी ने नीट की परीक्षा दी है, निर्धारित पात्रता हासिल की है और वह चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करना चाहता है, तब क्या केवल आर्थिक संसाधनों की कमी उसके विकल्प सीमित कर देनी चाहिए? हालांकि, निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस में बदलाव करना नीतिगत विषय है। इसके लिए संबंधित नियामक प्रावधानों, कॉलेजों की लागत और विद्यार्थियों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का आकलन आवश्यक होगा।

कम अंक पर प्रवेश का रास्ता क्यों नहीं?

नियम और न्यायालय के निर्देश भी अहम हैं। निजी मेडिकल कॉलेजों में सीटें खाली रहने का एक कारण प्रवेश नियमों और न्यायालय के निर्देशों का पालन भी बताया जा रहा है। नीट-यूजी 2026 के उपलब्ध कटऑफ विवरण के अनुसार, सामान्य और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए न्यूनतम पात्रता अंक 213, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए 177 अंक बताए गए हैं। यह न्यूनतम पात्रता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इन अंकों पर किसी भी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की सीट मिलना तय है।

पात्रता और प्रवेश में क्या है अंतर?

पात्रता और प्रवेश में अंतर समझना जरूरी है। न्यूनतम अंक हासिल करने से विद्यार्थी काउंसलिंग में भाग लेने के लिए पात्र हो सकता है, लेकिन वास्तविक प्रवेश उपलब्ध सीटों, लागू नियमों, श्रेणी, विकल्पों और संबंधित दौर की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। नीट-यूजी काउंसलिंग बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. बी.एल. कुमावत के अनुसार, तीसरे चरण के बाद सरकारी और राजमेस मेडिकल कॉलेजों की सभी एमबीबीएस सीटें तथा बीडीएस की सभी सीटें भर चुकी हैं। निजी मेडिकल कॉलेजों में खाली सीटों के पीछे प्रवेश नियमों और न्यायालय के निर्देशों का सख्ती से पालन भी एक प्रमुख कारण है। उन्होंने बताया कि उच्चतम न्यायालय और राजस्थान उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार दूसरे राज्यों के आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को अनारक्षित श्रेणी में मानने और उनके लिए 213 अंक की पात्रता लागू होने से प्रवेश प्रक्रिया प्रभावित हुई। निर्धारित पात्रता पूरी नहीं करने वाले अभ्यर्थी प्रवेश की दौड़ से बाहर हो गए। इसलिए खाली सीटों की संख्या देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि प्रवेश के लिए नियमों में ढील देकर सभी सीटें भर दी जाएंगी। प्रवेश प्रक्रिया में निर्धारित मानकों, न्यायालय के निर्देशों और मेरिट का पालन जरूरी है।

रोक लगाने की तैयारी

स्ट्रे वैकेंसी राउंड काउंसलिंग का अंतिम चरण होता है। इस समय उपलब्ध सीटों को भरने के साथ यह भी सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि प्रवेश लेने के बाद विद्यार्थी सीट छोड़कर न चला जाए और सीट दोबारा खाली न रह जाए। विशेषज्ञों के अनुसार अंतिम दौर में लागू की जाने वाली शर्तों और बॉन्ड संबंधी प्रावधानों का उद्देश्य विद्यार्थियों को सोच-समझकर विकल्प भरने और सीट स्वीकार करने के लिए बाध्य करना है, ताकि प्रवेश प्रक्रिया पूरी होने के बाद सीटें खाली न रह जाएं।
यहां विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए सबसे जरूरी बात है कि वे कॉलेज की फीस, अपनी आर्थिक क्षमता, प्रवेश की शर्तों और आगे की पढ़ाई के खर्च का आकलन करने के बाद ही विकल्प भरें। केवल सीट मिलने की संभावना देखकर ऐसा विकल्प चुनना, जिसे बाद में छोड़ना पड़े, उनके लिए परेशानी का कारण बन सकता है।

स्ट्रे वैकेंसी राउंड का पूरा कार्यक्रम

राजस्थान नीट-यूजी मेडिकल एवं डेंटल प्रवेश बोर्ड की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार, स्ट्रे वैकेंसी राउंड में विद्यार्थियों को आगामी प्रक्रिया पूरी करनी होगी-

सबसे महत्वपूर्ण नियम

पहले भरे गए विकल्प इस दौर में मान्य नहीं होंगे। विद्यार्थियों को नए सिरे से विकल्प भरने होंगे। इसके अलावा, तीसरे दौर के बाद सीट पर प्रवेश ले चुके अभ्यर्थियों और सीट उन्नयन होने के बावजूद प्रवेश नहीं लेने वाले अभ्यर्थियों की इस दौर में भागीदारी पर प्रतिबंध बताया गया है। आवेदन करने से पहले बोर्ड के आधिकारिक निर्देशों में अपनी पात्रता की पुष्टि करना जरूरी है।

विद्यार्थियों के लिए तीन जरूरी बातें

पहली- पात्रता को प्रवेश न समझें। न्यूनतम नीट अंक हासिल करने का अर्थ यह नहीं है कि निजी या सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट मिलना सुनिश्चित है।
दूसरी- फीस और शर्तें पहले समझें। निजी कॉलेज में प्रवेश लेने से पहले सालाना फीस, अन्य अनिवार्य खर्च, सुरक्षा राशि और लागू बंधपत्र संबंधी नियमों की जानकारी लें।
तीसरी- विकल्प भरने में गलती न करें। स्ट्रे वैकेंसी राउंड में पुरानी चॉइस शून्य होने के कारण कॉलेजों की प्राथमिकता नए सिरे से तय करनी होगी। विकल्प भरने और उन्हें लॉक करने की अंतिम तारीख का विशेष ध्यान रखें।

बड़ा सवाल

सीटें बढ़ाना पर्याप्त या चिकित्सा शिक्षा सुलभ बनाना भी जरूरी?

राजस्थान में मेडिकल शिक्षा का विस्तार विद्यार्थियों के लिए नए अवसर लेकर आया है, लेकिन निजी कॉलेजों में बड़ी संख्या में सीटें खाली रहना यह सोचने का अवसर भी देता है कि चिकित्सा शिक्षा तक पहुंच कितनी आसान है।

एक ओर डॉक्टर बनने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थी हैं, दूसरी ओर निजी कॉलेजों में उपलब्ध सीटें। फिर भी फीस, पात्रता और प्रवेश के नियमों के कारण दोनों के बीच दूरी बनी हुई है। ऐसे में चिकित्सा शिक्षा की योजना बनाते समय केवल सीटों की संख्या बढ़ाने के बजाय यह भी देखना होगा कि विद्यार्थी उन सीटों पर प्रवेश लेने और पढ़ाई पूरी करने की आर्थिक क्षमता रखते हैं या नहीं।

अब निगाहें 22 अक्टूबर के सीट आवंटन परिणाम पर हैं। इससे स्पष्ट होगा कि अंतिम चरण में कितनी रिक्त सीटें भर पाती हैं और कितनी सीटें उपलब्ध रहने के बावजूद विद्यार्थियों को प्रवेश नहीं मिल पाता। यह परिणाम केवल काउंसलिंग की सफलता नहीं बताएगा, बल्कि राजस्थान में चिकित्सा शिक्षा की उपलब्धता, फीस और प्रवेश व्यवस्था पर भी कई सवालों के जवाब देगा।

Updated on:
19 Oct 2026 10:30 am
Published on:
19 Oct 2026 10:29 am