
Rajasthan Nagar Nigam History : 19वीं सदी के मध्य का दौर था। रियासतों के अनेक नगरों में महामारी के रूप में जानलेवा रोग फैल रहे थे, लेकिन नियंत्रण की कोई स्थानीय व्यवस्था नहीं थी। जैसे ही बीमारियों के ब्रिटिश राज्य के अन्य निकटवर्ती इलाकों तक फैलने की आशंका बढ़ी, अंग्रेज शासक चिंतित हो उठे। उन्होंने तत्कालीन रियासती शासकों पर दबाव डाला कि नगरों की स्वच्छता व्यवस्था के लिए स्थानीय संस्थाएं बनाई जाएं। इसी दबाव से जन्म हुआ आज के प्रभावशाली स्थानीय शासन केंद्र-नगरपालिका प्रशासन का।
राजस्थान में सबसे पहली नगरपालिका 1864 में माउंट आबू में बनी। इसके दो साल बाद 1866 में अजमेर, 1867 में ब्यावर और 1869 में जयपुर में नगरपालिका की शुरूआत हुई।
शुरुआत में इन संस्थाओं में गैर-सरकारी सदस्यों का मनोनयन संपन्न और संभ्रांत परिवारों में से किया जाता था। न चुनाव होते थे, न आम जनता या भारतीयों की कोई खास भागीदारी। हर रियासत में अलग-अलग कानून होने से एकरूपता भी नहीं थी। फिर भी सिलसिला चलता रहा। 1904 में बांसवाड़ा और 1922 में उदयपुर में म्युनिसिपल बोर्ड बन गए। उदयपुर बोर्ड में 1939 में 10-10 निर्वाचित और मनोनीत सदस्य बनाए जाने लगे।
1938 में जयपुर में म्युनिसिपल एक्ट बना और पहली बार जनता को प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिला। 1943 के एक्ट में बोर्ड का नाम बदलकर काउंसिल कर दिया और सदस्य संख्या 30 से बढ़कर 34 हो गई। इनमें 30 जनता द्वारा निर्वाचित, 4 सरकार द्वारा नामित। आजादी से दो साल पहले, 1945 में जयपुर रियासत में श्रीमाधोपुर नगरपालिका बनी, जहां उस वक्त अध्यक्ष का चुनाव नहीं, मनोनयन होता था।
रियासत काल में नगरीय निकायों का विस्तार होता रहा। जब रियासतों के एकीकरण के बाद राजस्थान बना, तब प्रदेश में कुल 136 नगरपालिकाएं थीं, लेकिन इनके प्रशासन में एकरूपता नहीं थी। इस अव्यवस्था को दूर करने के लिए अध्यादेश जारी कर "उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम-1916" अपनाया गया। साथ ही तत्कालीन स्वायत्त शासन मंत्री की अध्यक्षता में 21 सदस्यीय स्वायत्त शासन मंडल बनाया गया।
1950 - समन्वय, निर्देशन व पर्यवेक्षण के लिए स्थानीय निकाय विभाग की स्थापना
1951 - राजस्थान नगर पालिका अधिनियम लागू
1959 - राजस्थान नगर पालिका अधिनियम 1959 लागू
रियासतकालीन "नगर सुधार सभा" 1864 में ब्रिटिश काल में नगरपालिका बन गई। इसका कार्यालय गवर्नर हाउस के पास हुआ करता था, जिसे बाद में सर्वे ऑफ इंडिया का कार्यालय बना दिया गया। आज वह भवन जीर्णशीर्ण हालत में अतीत की कहानी बयां करता है। आजादी के बाद माउंट आबू का बंबई प्रांत से पुनः राजस्थान में विलय हुआ। इसके बाद 24 नवंबर 1963 तक सात प्रशासकों ने नगरपालिका संभाली। 25 नवंबर 1963 को पहली बार मनोनीत अध्यक्ष बद्रीलाल अग्रवाल नियुक्त हुए, जो 30 सितंबर 1967 तक इस पद पर रहे।
माउंट आबू में राज्य की पहली नगरपालिका बनने के बावजूद राज्य में स्थानीय निकाय प्रशासन की असली शुरुआत अजमेर से मानी जाती है। अंग्रेजी शासन ने अजमेर को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया था, लेकिन 1866 में यहां नगरपालिका बनाकर उसे सफाई, बिजली और पानी की व्यवस्था सौंप दी गई। मेजर डेविडसन पहले पालिकाध्यक्ष नियुक्त हुए। लेखक गिरधर तेजवानी बताते हैं कि इतिहासकार हरविलास शारदा की 1911 में लिखी किताब अजमेर हिस्टॉरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव में जिक्र मिलता है कि अंग्रेजी शासन में पालिका के चुनाव नहीं होते थे।
आजादी के बाद 1947-48 में हेमचंद सोगानी पालिकाध्यक्ष बने। अजमेर 1955 तक केंद्रशासित प्रदेश रहा और 1956 में राजस्थान में इसका विलय हुआ। 1955 से 1990 तक पालिका प्रशासकों के हाथ में रही, और 1990 में जाकर चुनाव शुरू हुए।
गुलाबी नगर की पहचान सिर्फ महलों, हवेलियों और परकोटे से नहीं है। इसकी 157 साल पुरानी समृद्ध नगरीय शासन व्यवस्था भी उतनी ही बड़ी विरासत है। 18 अप्रैल 1869 को तत्कालीन जयपुर शासक सवाई रामसिंह ने 'नगर परिषद' गठन की घोषणा की। उस समय इतिहासकारों के मुताबिक सफाई की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग के पास थी, स्वास्थ्य विभाग का प्रमुख अधिकारी व अभियंता परिषद के पदेन सदस्य होते थे। पहले बोर्ड में 26 सदस्य थे।
1880 में परिषद का विस्तार हुआ और रेजीडेंसी, रामबाग, मोती डूंगरी, गलता, लाल डूंगरी, काला महादेव, ब्रह्मपुरी व अमानीशाह नाला जैसे इलाके इसकी सीमा में शामिल किए गए। 1926 में सदस्य संख्या बढ़कर 30 हो गई, और परिषद को निर्माण-पुनर्निर्माण पर नियंत्रण, भूमि बेचने-किराए पर देने, बाजार से किराया वसूलने और व्यापार लाइसेंस जारी करने जैसे अधिकार भी मिल गए।
1938 के म्युनिसिपल एक्ट के बाद बोर्ड में प्रतिनिधि चुनाव की शुरुआत हुई। 1943 के जयपुर म्युनिसिपल एक्ट में बोर्ड का नाम बदलकर काउंसिल किया गया और सदस्य संख्या 30 से बढ़ाकर 34 की गई। इनमें 30 जनता द्वारा निर्वाचित और 4 सरकार द्वारा नामित होते थे। जलेब चौक में नगर परिषद का पहला कार्यालय खुला, और इसी दौर में वित्त, भवन निर्माण व जन स्वास्थ्य सहित सात समितियां बनाई गईं।
1945 में जयपुर के घाटगेट चौकड़ी से प्रजामंडल उम्मीदवार पं. देवीशंकर तिवाड़ी काउंसिल के पहले अध्यक्ष बने।
1994 में जयपुर नगर निगम का गठन हुआ, वार्ड संख्या 70 हुई, और मोहनलाल गुप्ता पहले मेयर बने। निगम में 21 समितियां बनाई गईं। 2019 में निगम को दो हिस्सों, हेरिटेज और ग्रेटर नगर निगम में बांटा गया और 2020 में दो महापौर चुने गए। अब दोनों निगमों का विलय कर 150 वार्ड बना दिए गए हैं।
जयपुर नगरपालिका के प्रथम महापौर मोहनलाल गुप्ता ने पत्रिका से बातचीत में कहा, "नगर निगम का गठन भले 1994 में हुआ, लेकिन 150 साल पहले ही शहरी सरकार ने मूर्त रूप ले लिया था। मेरे समय 70 पार्षद चुनकर आए।"
आजादी से दो साल पहले, 1945 में श्रीमाधोपुर में नगरपालिका का गठन हुआ। उस समय अध्यक्ष का चुनाव नहीं, मनोनयन होता था, और ज्ञानचंद पहले अध्यक्ष बनाए गए। इसके बाद लंबे समय तक प्रशासकों ने ही कमान संभाली। पहले निर्वाचित नगरपालिका बोर्ड का कार्यकाल तीन वर्ष था, जिसे 1994 में बढ़ाकर पांच वर्ष कर दिया गया।
मौजूदा अध्यक्ष हरिनारायण महंत के परिवार का इस पालिका से गहरा नाता रहा है।
वर्ष 1904 में जब बांसवाड़ा रियासत के अधीन था, तभी यहां नगरपालिका की स्थापना हो गई थी। आज जब शहर 60 वार्डों में चुनावी सरगर्मी से गुजर रहा है। शहर का पुराना नगर परिषद भवन सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं है, यह इतिहास का मूक गवाह है। रियासतकालीन प्रशासन से लेकर आज के लोकतांत्रिक ढांचे तक, इस भवन ने हर दौर को अपनी आंखों से देखा है। समय बीतने के साथ दो नई विंग जुड़ीं, शहर बढ़ता गया, लेकिन पुराने भवन का ऐतिहासिक तेवर आज भी बरकरार है। इस भवन की पुरानी तस्वीरों में झलकती उस दौर की स्थापत्य कला आज भी इतिहासकारों और शोधार्थियों के लिए दिलचस्पी का विषय है। यह भवन सिर्फ स्थानीय प्रशासन का नहीं, बल्कि बांसवाड़ा के वैश्विक जुड़ाव का भी साक्षी रहा है।
1947 के बाद बांसवाड़ा की नगरपालिका ने भी लोकतांत्रिक स्वरूप अपनाया। 1948 में करणसिंह कोठारी शहर के पहले निर्वाचित नगरपालिका अध्यक्ष बने, यह वह क्षण था जब रियासती ढांचा जनप्रतिनिधित्व की व्यवस्था में बदल गया। इसके बाद कई अध्यक्षों के कार्यकाल आए, शहर फैलता गया, और जिम्मेदारियां भी बढ़ती गईं। 2012 में नगरपालिका को नगर परिषद का दर्जा मिला एक और बड़ा कदम।