
Ramleela Dusshera: रामलीला आपने देश के अलग-अलग हिस्सों में कई देखी होगी, लेकिन राजस्थान के झुंझुनूं जिले के बिसाऊ की रामलीला ऐसी है, जहां राम और रावण की सेना आमने-सामने होती हैं, लेकिन कोई पात्र बोलता नहीं। सीता, लक्ष्मण, भरत ही नहीं, मंथरा और कैकेयी तक संवाद नहीं बोलते। पूरी रामलीला इशारों, नृत्य-मुद्राओं, ढोल-नगाड़ों और युद्ध के दृश्यों के जरिए मंचित की जाती है। इसी अनूठी परंपरा के कारण बिसाऊ की रामलीला को 'मूक रामलीला' के नाम से जाना जाता है। करीब 15 दिन चलने वाली इस रामलीला को देखने देशभर से लोग बिसाऊ पहुंचते हैं। बताया जाता है कि यह परंपरा 200 साल से भी अधिक पुरानी है।
Bisau Mook Ramleela: शेखावाटी का बिसाऊ आज भी अपनी इस अनूठी सांस्कृतिक परंपरा को सहेजे हुए है। यहां पहले नवरात्र से मूक रामलीला शुरू होती है और पूर्णिमा तक चलती है। पहले दिन राम जन्म और ताड़का वध की लीला होती है। अंतिम दिन भरत मिलाप और राम राज्याभिषेक के साथ इसका समापन होता है। रामलीला के लिए मुख्य बाजार की सड़क पर बालू-मिट्टी बिछाकर करीब 200 फीट लंबे और 15 फीट चौड़े दंगलनुमा मैदान को तैयार किया जाता है। इसमें करीब 300 कलाकार हिस्सा लेते हैं।
कलाकार मुखौटे और पारंपरिक वेशभूषा पहनकर नृत्य-मुद्राओं और इशारों से कथा को आगे बढ़ाते हैं। ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच रामलीला के प्रसंग जीवंत होते हैं। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता के पात्रों की पोशाकों को सलमा-सितारों से सजाया जाता है। युद्ध के दृश्यों में राम दल और राक्षस दल आमने-सामने होते हैं। इस दौरान करीब 10 हजार तीर चलाए जाते हैं।
बिसाऊ की मूक रामलीला शाम करीब 6 बजे शुरू होती है और रात 9 बजे तक चलती है। इस दौरान रामायण के प्रसंगों का मंचन लगातार किया जाता है। यहां रामलीला देखने आने वाले दर्शकों के लिए सबसे आकर्षक दृश्य युद्ध के होते हैं। मुखौटाधारी कलाकारों की गतिविधियां, ढोल-नगाड़ों की गूंज और तीरों की बौछार पूरे माहौल को अलग ही रूप दे देती है।
बिसाऊ की रामलीला की एक और परंपरा इसे देश की दूसरी रामलीलाओं से अलग बनाती है। यहां दशहरे के दिन रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। यहां चतुर्दशी को रावण वध और उसके पुतले का दहन होता है, जबकि दशहरे के दिन कुंभकर्ण का वध कर उसका पुतला जलाया जाता है। इसी तरह मेघनाद और नरान्तक के पुतलों का दहन भी अलग-अलग दिन किया जाता है।
साहित्यकार रामजीलाल कल्याणी के अनुसार, भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास मिला था। इसी वजह से बिसाऊ में 14वें दिन रावण वध की लीला करने की परंपरा है। इसके अलावा रात्रिकालीन मंच रामलीला में सीमित समय के कारण रामायण के सभी प्रसंगों को विस्तार से दिखाना संभव नहीं होता। 15 दिन चलने वाली मूक रामलीला में इन प्रसंगों को विस्तार से मंचित किया जा सकता है।
मूक रामलीला के लिए तैयारियां करीब दो महीने पहले शुरू हो जाती हैं। रामलीला की हवेली में कलाकारों के लिए मुखौटे, तीर-बाण और अन्य सामग्री तैयार करने का काम जोर-शोर से चलता है। कलाकार भी अपने-अपने पात्रों के अभ्यास में जुट जाते हैं।
बिसाऊ की इस अनूठी मूक रामलीला को हाल ही में गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी शामिल किया गया है। 200 साल से अधिक पुरानी यह परंपरा आज भी उसी अंदाज में आगे बढ़ रही है, जहां रामायण के पात्र बोलते नहीं, बल्कि इशारों और अभिनय से पूरी कथा दर्शकों के सामने जीवंत कर देते हैं।