
Ancient statues of Rajim: छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध धर्मनगरी राजिम अपनी प्राचीन मूर्तिकला, स्थापत्य और धार्मिक विरासत के लिए देश-विदेश में पहचान रखती है। लेकिन इसी नगरी में लाखों रुपए मूल्य की बताई जा रही तीन प्राचीन खंडित प्रतिमाएं लंबे समय से उपेक्षित हालत में पड़ी हैं। जगन्नाथ मंदिर के पीछे गार्डन और पार्किंग क्षेत्र के पास घास-फूस के बीच रखी इन प्रतिमाओं की पिछले तीन-चार वर्षों से किसी ने सुध नहीं ली है। पार्किंग के पूर्व दिशा में करीब तीन फीट ऊंची हनुमानजी की प्रतिमा खड़ी मुद्रा में रखी है। प्रतिमा का गला क्षतिग्रस्त हैए हालांकि सिर और धड़ जुड़े हुए हैं। दोनों हाथ कोहनी तक सुरक्षित हैं, जबकि आगे का हिस्सा टूटा हुआ है। पत्थर पर की गई बारीक नक्काशी और आकृतियां इसे सामान्य प्रतिमा से अलग बनाती हैं।
इसी के पास दो अन्य खंडित प्रतिमाएं जमीन पर रखी हुई हैं। पहली नजर में दोनों ध्यान मुद्रा में बैठे बुद्ध की प्रतिमाओं जैसी दिखाई देती हैं। इनमें से एक प्रतिमा का सिर अलग हो चुका है और वक्षस्थल भी क्षतिग्रस्त है। दूसरी प्रतिमा के पीछे बना चक्र अलग होने के बावजूद प्रतिमा से जुड़ा हुआ है। इसके पास ही प्रतिमा के चरण भी अलग रखे दिखाई देते हैं। लाल-भूरे रंग के पत्थर पर उकेरी गई कलाकृतियां तत्कालीन शिल्पकारों की दक्षता और उत्कृष्ट मूर्तिकला की झलक देती हैं।
शहर के कुछ लोगों का कहना है कि प्राचीन काल में राजिम क्षेत्र बौद्ध परंपरा से भी जुड़ा रहा हो सकता है। उनका दावा है कि राजीव लोचन मंदिर परिसर सहित आसपास मौजूद कुछ प्राचीन प्रतिमाओं की आकृतियां बुद्ध प्रतिमाओं से मिलती-जुलती हैं। हालांकि बिना पुरातात्विक और विशेषज्ञ जांच के इनके वास्तविक स्वरूप तथा कालखंड को लेकर निश्चित निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है। राजिम में धार्मिक पर्वों और विशेष अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु व पर्यटक पहुंचते हैं। ऐसे महत्वपूर्ण धार्मिक और पर्यटन क्षेत्र में प्राचीन प्रतिमाओं का घास-फूस के बीच असुरक्षित पड़े रहना संरक्षण व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। स्थानीय लोगों ने संबंधित विभाग से प्रतिमाओं की पहचान, काल निर्धारण और पुरातात्विक महत्व की जांच कराने के साथ ही दस्तावेजीकरण एवं सुरक्षित संरक्षण की मांग की है।
मंदिर के आसपास रहने वाले लोगों के अनुसार ये प्रतिमाएं लंबे समय से इसी स्थान पर पड़ी हैं। संभावना जताई जा रही है कि खंडित होने के बाद इन्हें यहां लाकर छोड़ दिया गया होगा। हालांकि इनका निर्माण किस काल में हुआ, किस शिल्प परंपरा से इनका संबंध है और इन्हें यहां कब तथा कहां से लाया गया, इसकी कोई प्रमाणित जानकारी सार्वजनिक नहीं है। ऐसे में प्रतिमाओं का खुले में पड़े रहना चिंता का विषय बना हुआ है।