
Nageshwar Parshwanath : रतलाम जिला मुख्यालय के आलोट नगर से महज 10 किलोमीटर दूर राजस्थान-मध्यप्रदेश की सीमा के समीप उन्हेल गांव में स्थित श्री नागेश्वर पार्श्वनाथ तीर्थ जैन समाज की आस्था का ऐसा प्रमुख केंद्र है, जहां प्राचीन इतिहास, धर्म और स्थापत्य कला एक साथ दिखाई देते हैं। 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित यह तीर्थ न केवल मालवा और राजस्थान बल्कि देशभर के जैन श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। रतलाम से करीब 100 किलोमीटर और आलोट रेलवे स्टेशन से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित यह तीर्थ समय के साथ देश-विदेश में भी अपनी अलग पहचान बना चुका है।
नागेश्वर पार्श्वनाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां विराजित भगवान पार्श्वनाथ की 13.5 फीट ऊंची सप्तफणधारिणी कायोत्सर्ग मुद्रा की हरे पाषाण की प्राचीन प्रतिमा है। मान्यता के अनुसार यह प्रतिमा करीब 2,830 वर्ष पुरानी है। प्रतिमा की भव्यता देखते ही बनती है। कमल की पंखुड़ियां, धर्मचक्र और अन्य कलात्मक आकृतियां इसकी सुंदरता को और निखारती हैं। मुख्य प्रतिमा के दोनों ओर भगवान शांतिनाथ और भगवान महावीर स्वामी की करीब चार-चार फीट ऊंची प्रतिमाएं विराजमान हैं।
मंदिर में सफेद संगमरमर पर की गई बारीक नक्काशी इसकी स्थापत्य कला को विशेष बनाती है। मुख्य मंदिर परिसर में 24 जिनालय निर्मित हैं, जिनमें 24 तीर्थंकरों की प्रतिमाएं विराजमान हैं। इसके अलावा मां पद्मावती और श्री मणिभद्रवीर की प्रतिमाएं भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र हैं।
नागेश्वर तीर्थ के इतिहास को लेकर अनेक प्राचीन मान्यताएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि उन्हेल के राजा और रानी पद्मावती ने यहां भव्य मंदिर का निर्माण करवाकर भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा स्थापित कराई थी। समय के साथ यह स्थान जैन धर्मावलंबियों के लिए महत्वपूर्ण तीर्थ बन गया। मुगलकाल में मंदिर को कई बार नुकसान पहुंचने की भी मान्यता है, जिसके कारण इसके स्वरूप में कई परिवर्तन हुए।
इतिहास के अनुसार विक्रम संवत 1264 में नागेश्वर गच्छ के अभयदेवसूरि ने तीर्थ का पुनः जीर्णोद्धार कराया था। उस समय उन्हेल में करीब 500 जैन परिवार निवास करते थे। बाद में इन परिवारों के गांव छोड़ने के साथ मंदिर की व्यवस्था प्रभावित हुई और तीर्थ का वैभव भी धीरे-धीरे कम होने लगा।
नागेश्वर तीर्थ के पुनरुद्धार की दिशा में उपाध्याय जैन संत धर्मसागर और अभयसागर का योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है। दोनों संतों ने इस प्राचीन तीर्थ का भ्रमण किया। णमोकार मंत्र की आराधना के साथ तीर्थ के इतिहास और इसकी धार्मिक महत्ता को समझा तथा इसके नवीनीकरण की योजना बनाई।
संतों ने अपने भक्त और उन्हेल निवासी सेठ दीपचंद जैन को वर्तमान मंदिर के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी। संतों की इच्छा थी कि यहां ऐसा भव्य मंदिर बने, जिसकी पहचान केवल देश तक सीमित न रहे, बल्कि विदेशों में भी इसकी ख्याति पहुंचे। सेठ दीपचंद जैन ने अनेक बाधाओं के बावजूद प्रयास जारी रखे और वर्तमान भव्य एवं कलात्मक मंदिर का निर्माण करवाया।
इसके बाद नागेश्वर तीर्थ की प्रसिद्धि लगातार बढ़ती गई। देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालुओं का यहां पहुंचना शुरू हुआ और समय के साथ विशेष धार्मिक यात्राओं तथा रेल यात्राओं के माध्यम से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु तीर्थ पहुंचने लगे।
मंदिर की भव्यता केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्थापत्य और शिल्पकला की दृष्टि से भी आकर्षण का केंद्र है। संगमरमर की नक्काशी, जिनालयों की श्रृंखला और प्राचीन प्रतिमाओं का वैभव यहां आने वाले श्रद्धालुओं को लंबे समय तक अपनी ओर आकर्षित करता है। यही कारण है कि नागेश्वर पार्श्वनाथ तीर्थ धार्मिक पर्यटन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण स्थान बन चुका है।
वर्तमान में चातुर्मास के दौरान तीर्थ परिसर में धार्मिक आयोजन जारी हैं। जैन साधु-साध्वियों का सान्निध्य मिलने से यहां आराधना, प्रवचन और धार्मिक गतिविधियों का क्रम बना हुआ है। आसपास के क्षेत्रों के साथ दूर-दराज से भी श्रद्धालु दर्शन और धार्मिक आयोजनों में शामिल होने के लिए पहुंच रहे हैं।
नागेश्वर पार्श्वनाथ तीर्थ का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन विक्रमगढ़-आलोट करीब 10 किलोमीटर और चौमहला करीब 15 किलोमीटर दूर है। आलोट रेलवे स्टेशन पर कई प्रमुख ट्रेनों का ठहराव होता है। निकटतम हवाई अड्डा इंदौर में करीब 160 किलोमीटर दूर है। तीर्थ पेढ़ी से संपर्क करने पर श्रद्धालुओं के लिए जीप और मिनी बस की व्यवस्था भी की जाती है।