
21 September History: भारतीय इतिहास के पन्नों में 21 सितंबर की तारीख एक अजीब संयोग समेटे हुए है। वह दिन जब दो अलग-अलग सदियों में भारत में सत्ता और भूगोल से जुड़ी दो बड़ी घटनाएं घटीं तो यही तारीख आज दुनिया भर में शांति के संदेश के लिए भी जानी जाती है। क्या आप जानना चाहेंगे भारत से लेकर दुनिया तक 21 सितंबर का रोचक इतिहास
1857 के विद्रोह के दौरान दिल्ली पर अंग्रेजों का कब्जा होने के बाद, अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर हुमायूं के मकबरे में शरण लिए हुए थे। मेजर विलियम हडसन के नेतृत्व में अंग्रेज फौज ने मकबरे को घेर लिया और 20 सितंबर 1857 को जफर को गिरफ्तार कर लिया गया।
लेकिन असली त्रासदी इसके अगले ही दिन, 21 सितंबर को घटी, हडसन ने अपने अधिकार पर जफर के दो बेटों मिर्जा मुगल और मिर्जा खिज्र सुल्तान के साथ ही पोते मिर्जा अबू बख्त को दिल्ली गेट के पास खूनी दरवाजे पर गोली मार दी और दिल्ली पर पूरी तरह से विजय की घोषणा कर दी।
जब बादशाह को अपने बेटों और पोते की हत्या की खबर दी गई, तो वे इतने स्तब्ध हो गए कि कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दे सके। यह पल भारत में मुगल सत्ता के अंतिम पतन का प्रतीक बन गया।
मुगल सल्तनत के ठीक 92 साल बाद, 21 सितंबर 1949 को शिलांग में एक और बड़ी घटना घटी जिसने भारत के भूगोल को नया आकार दिया। इस दिन मणिपुर के महाराजा बोधचंद्र सिंह ने भारत सरकार के प्रतिनिधि वी.पी. मेनन के साथ मणिपुर विलय समझौते पर हस्ताक्षर किए। इससे मणिपुर रियासत भारतीय संघ का हिस्सा बनने की प्रक्रिया में औपचारिक रूप से आगे बढ़ी।
यह समझौता आज भी विवादों से घिरा है, मणिपुर के कई राजनीतिक और सामाजिक संगठन इसे जबरन कराया गया विलय बताते हैं। हर साल इस तारीख को अलग-अलग तरीकों से याद करते हैं, जबकि भारत सरकार इसे पूर्वोत्तर के एकीकरण की एक अहम कड़ी मानता है।
दिलचस्प बात यह है कि 1857 और 1949 की ये दोनों घटनाएं, भले ही अलग सदियों और अलग संदर्भों की हों, दोनों ही भारत में सत्ता-परिवर्तन और क्षेत्रीय पुनर्गठन की बड़ी कहानियां हैं। एक तरफ मुगल सत्ता का अंत, दूसरी तरफ आधुनिक भारत के नक्शे का विस्तार।
भारत से बाहर देखें तो यही तारीख वैश्विक स्तर पर बिल्कुल अलग वजह से याद की जाती है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1981 में एक प्रस्ताव पारित कर 21 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस के रूप में स्थापित किया और इसका पहला आयोजन सितंबर 1982 में हुआ।
शुरुआत में यह दिन महासभा के सत्र के शुरुआती दिन (सितंबर के तीसरे मंगलवार) पर मनाया जाता था, लेकिन 2001 में इसे स्थायी रूप से 21 सितंबर की तारीख पर तय कर दिया गया और इसे वैश्विक युद्धविराम और अहिंसा का दिन घोषित किया गया।
इस दिन संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में शांति की घंटी बजाई जाती है, यह घंटी दुनिया भर (अफ्रीका को छोड़कर हर महाद्वीप) के बच्चों से जुटाए गए सिक्कों से बनी है और जापान एसोसिएशन की तरफ से यूएन को भेंट की गई थी। इसका मकसद साफ है, साल के 365 दिनों में से कम से कम एक दिन दुनिया को याद दिलाना कि युद्ध और हिंसा के बिना भी सह-अस्तित्व संभव है।
21 सितंबर इस मायने में खास है कि यह एक ही कैलेंडर तारीख के भीतर सत्ता के अंत (1857), सत्ता के विस्तार (1949) और सत्ता से परे शांति के विचार (1981-82) - तीनों को समेटे हुए है। भारतीय इतिहास के लिए यह दिन जहां साम्राज्यों के उलटफेर और रियासतों के विलय की याद दिलाता है, वहीं वैश्विक संदर्भ में यह हथियार डालकर एक दिन शांति से जीने के संकल्प का प्रतीक बन चुका है।