
Antibiotic Drugs: डॉक्टरों ने एंटीबायोटिक दवाओं को लेकर बड़ा खुलासा किया है। डॉक्टरों ने का कहना है कि लीवर और पित्त की गंभीर बीमारी वाले मरीजों में आम एंटीबायोटिक दवाएं अब काम नहीं कर रहीं हैं। कल्पना कीजिए कि कोई मरीज पित्त की पथरी या लीवर की गंभीर बीमारी से जूझ रहा है। अस्पताल में भर्ती होने के बाद उसकी हालत बिगड़ रही है। डॉक्टर जल्दी इलाज के लिए शक्तिशाली एंटीबायोटिक देते हैं, लेकिन संक्रमण कम नहीं हो रहा है। विशेषज्ञों ने इस समस्या और इसके पीछे के कारणों की जानकारी दी है।
AIIMS जोधपुर, PILBS मोहाली और PGI चंडीगढ़ के चिकित्सा विशेषज्ञों ने अपनी शोध में इस डरावनी स्थिति के बारे में बेहद अहम जानकारी दी है। लैंसेट में विशेषज्ञों की शोध के आधार पर प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, लीवर और पित्त की गंभीर बीमारियों वाले मरीजों में आम एंटीबायोटिक दवाएं असर नहीं कर रहीं हैं।
डॉक्टरों ने एंटीबायोटिक दवाओं को लेकर बड़ा खुलासा किया है। डॉक्टरों ने का कहना है कि लीवर और पित्त की गंभीर बीमारी वाले मरीजों में आम एंटीबायोटिक दवाएं अब काम नहीं कर रहीं हैं। कल्पना कीजिए कि कोई मरीज पित्त की पथरी या लीवर की गंभीर बीमारी से जूझ रहा है। अस्पताल में भर्ती होने के बाद उसकी हालत बिगड़ रही है। डॉक्टर जल्दी इलाज के लिए शक्तिशाली एंटीबायोटिक देते हैं, लेकिन संक्रमण कम नहीं हो रहा है।
चिकित्सा विशेषज्ञों ने लीवर और पित्त का इलाज कराने आए मरीजों में से 1,626 लोगों का सैंपल लेकर अध्ययन किया। विशेषज्ञों ने इन मरीजों के सैंपलों की जांच की। इन सैंपलों में 240 खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए। यानी कि करीब 15 फीसदी मामलों में एंटी माइक्रोबियल रजिस्टेंस यानी AMR की पुष्टि हुई है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि कुछ मामलों में आखिरी विकल्प मानी जाने वाली सबसे मजबूत एंटीबायोटिक्स भी बेअसर होने लगी हैं।
चिकित्सकों ने एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने का कारण भी बताया है। चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक, मरीजों को पहले से दी जा रहीं अत्यधिक एंटी बैक्टीरियल दवाओं और अस्पतालों में भर्ती होने के कारण उनके बेअसर होने की स्थिति पैदा हुई है। अस्पताल में बार-बार भर्ती होने वाले लीवर के मरीजों को पहले से ही बहुत सारी ब्रॉड-स्पेक्ट्रम और रिजर्व एंटीबायोटिक दी जा चुकी होती हैं। कई बार ERCP (पेट संबंधी समस्याओं में विशेष एंडोस्कोपी व X-Ray प्रक्रिया), स्टेंटिंग और सर्जरी के कारण भी बैक्टीरिया और मजबूत हो रहे हैं।
एंटीबायोटिक्स ऐसी दवाएं हैं, जो जीवाणुओं के कारण होने वाले संक्रमणों और रोगों का इलाज करती हैं। सभी एंटीबायोटिक्स दवाएं बैक्टीरिया को नष्ट करती हैं, ताकि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उन बैक्टीरिया से आसानी से लड़ सके। शरीर में होने वाले संक्रमण की प्रकृति के हिसाब से डॉक्टर्स उसके इलाज के लिए उपयुक्त एंटीबायोटिक दवाएं लिखते हैं। एंटीबायोटिक्स दवाएं बैक्टीरिया को मारकर या उनकी संख्या को बढ़ने से रोककर अपना कार्य करती हैं।
1- क्लेबसिएला (Klebsiella) : यह बैक्टीरिया 48 मरीजों के जांच सैंपल में मिला है। इसने एक शक्तिशाली एंटीबायोटिक कार्बापेनेम के लिए 96 फीसदी रजिस्टेंस हासिल कर लिया है। बाकी आम, लेकिन मजबूत एंटीबायोटिक्स जैसे तीसरी व चौथी पीढ़ी की सेफलोस्पोरिन सहित फ्लोरोक्विनोलोन एवं पाइपेरासिलिन टैजोबैक्टम के खिलाफ भी इसमें प्रतिरोधक क्षमता मिली।
2- ई. कोलाई (E. coli) : इस बैक्टीरिया के भी 40 मामले थे। यह कार्बापेनेम के प्रति 20 फीसदी रजिस्टेंस पा चुका है।
3- स्टेफिलोकोकस ऑरियस (Staphylococcus aureus) : सभी जांचे गए नमूनों में मेथिसिलिन (Methicillin) के प्रति 100% प्रतिरोध पाया गया। यह एंटीबायोटिक इस बैक्टीरिया पर काम नहीं कर रहीं।
4- कैंडिडा फंगस (Candida) : यह सबसे ज्यादा 78 मामलों में मिला। यह मुख्य रूप से पेशाब और सांस की नली (Respiratory tract) में पाया गया। यह बताता है कि एंटीबायोटिक्स के ज्यादा इस्तेमाल से फंगल संक्रमण भी बढ़ रहा है।
भोपाल AIIMS भोपाल के एक शोध में सामने आया है कि कई महत्त्वपूर्ण एंटीबायोटिक्स की प्रभावशीलता 30 प्रतिशत से भी नीचे पहुंच गई है। NHM मध्यप्रदेश के पूर्व डायरेक्टर डॉ. पंकज शुक्ला के अनुसार, अभी तक 40 से 45 तरह की एंटीबायोटिक्स चलन में आ चुकी हैं, जिनमें कई तो बिल्कुल निष्प्रभावी हो गई हैं। एंटीबायोटिक्स के अंधाधुंध उपयोग पर रोक लगाने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने स्टेट एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस एक्शन प्लान 2.0 बनाया है।
AIIMS जोधपुर, PILBS मोहाली और PGI चंडीगढ़ के चिकित्सा विशेषज्ञों में शामिल डॉ. अनुराधा शर्मा एवं डॉ. महुया रॉय और उनकी टीम ने महत्वपूर्ण जानकारी दी है। डॉ. अनुराधा शर्मा एवं डॉ. महुया रॉय और उनकी टीम के मुताबकि, केवल अनुभव के आधार पर एंटीबायोटिक देने से नुकसान हो रहा है। तुरंत एंटीमाइक्रोबियल स्टीवर्डशिप (एंटीबायोटिक्स का विवेकपूर्ण उपयोग) को नहीं माना गया तो जल्द ही गंभीर मरीजों का इलाज बहुत मुश्किल हो जाएगा। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि एंटीबायोटिक के बेअसर होने से सामान्य व छोटे संक्रमण भी जानलेवा बन सकते हैं।
अधिकांश नए एंटीबायोटिक का असर खत्म हो गया है, लेकिन पुराने एंटीबायोटिक जो सालों पहले अप्रभावी हो चुके थे। वे फिर से प्रभावी हो गए हैं। भोपाल AIIMS में हुए शोध में यह साबित हुआ था। सबसे ज्यादा उपयोग किए जाने वाले एंटीबायोटिक जैसे एंपिसिलीन, एमॉक्सीसिलीन, सिफजोलिन, सिफेप्राइम, सिफ्रिएक्सोन आदि की प्रभावशीलता 50 प्रतिशत के नीचे पहुंच गई है। वहीं, सालों पहले अप्रभावी होने से क्लोरेम्फेनिकूल का उपयोग बंद कर दिया गया था, उसकी प्रभावशीलता अब 63 फीसदी तक पाई गई है।
भोपाल AIIMS के विशेषज्ञों के मुताबिक, चिकन या मांसाहार का ज्यादा सेवन करने वालों पर भी एंटीबायोटिक का असर कम होता है। चिकन या अन्य जानवरों को जल्दी बड़ा करने के लिए बड़ी मात्रा में एंटीबायोटिक के इंजेक्शन दिए जाते हैं। इससे ये एंटीबायोटिक मानव शरीर में पहुंच रहे हैं। पोल्ट्रीफार्म में चूजों को संक्रमण से बचाने हर दो दिन में एंटीबायोटिक इंजेक्शन दिया जाता है।
दवाओं का नाम प्रभावशीलता