
मुंबई की फिल्म नगरी में स्टार बनने की कहानी अक्सर भीड़ के बीच से शुरू होती थी। किसी बड़े सेट पर पीछे खड़े सैकड़ों जूनियर आर्टिस्टों में से कोई एक चेहरा धीरे-धीरे कैमरे के करीब आता और वहीं से स्टारडम का सफर शुरू होता था। लेकिन 2026 में यह पहली सीढ़ी ही आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। फिल्म रामायण, कन्नप्पा, बॉर्डर-2 और गदर-2 जैसी बड़े बजट की फिल्मों में क्राउड-मल्टीप्लिकेशन यानी भीड़ के दृश्यों के लिए AI आधारित 'डिजिटल डबल्स' का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। AI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के साथ ही जूनियर आर्टिस्टों के लिए मौके सिकुड़ते जा रहे हैं।
पारंपरिक तरीके में स्टेडियम या युद्ध के दृश्यों के लिए सैकड़ों जूनियर आर्टिस्टों को बुलाया जाता था। इन सभी आर्टिस्टों पर खाना, कॉस्ट्यूम, मेकअप, ट्रांसपोर्ट और दैनिक दिहाड़ी का खर्च आता था। अब नई तकनीक में मुट्ठी भर असली कलाकारों का 3D फेशियल स्कैन करके, AI की मदद से उन्हीं चेहरों और शरीर को हजारों बार दोहराकर पूरी भीड़ तैयार कर दी जाती है। इंडस्ट्री के दावों के मुताबिक, इससे प्रोडक्शन लागत में बड़ी बचत होती है। हालांकि सटीक आंकड़े फिल्म-दर-फिल्म अलग हैं और स्टूडियो इन्हें आमतौर पर आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं करते हैं।
सिनेमा जगत में नया बदलाव सिर्फ भीड़ के दृश्यों तक सीमित नहीं है। प्री-प्रोडक्शन में एआइ स्क्रिप्ट विश्लेषण और कॉन्सेप्ट आर्ट बनाने में मदद कर रहा है। शूटिंग के दौरान रियल-टाइम 3D वर्चुअल सेट और स्मार्ट कैमरा ट्रैकिंग हो रही है, पोस्ट-प्रोडक्शन में डबिंग, लिप-सिंकिंग, डी-एजिंग और VFX तेजी से पूरे किए जा रहे हैं।
मार्केटिंग में दर्शकों की पसंद भांपकर लक्षित ट्रेलर तैयार किए जा रहे हैं। खुद 'रामायण' की टीम पहले से बड़े पैमाने पर वर्चुअल प्रोडक्शन, मोशन कैप्चर और VFX पर निर्भर रही है, जिसे लेकर सोशल मीडिया पर VFX की गुणवत्ता को लेकर पहले भी बहस छिड़ चुकी है।
यह चिंता सिर्फ आर्थिक नहीं, भावनात्मक भी है, क्योंकि हिंदी सिनेमा के कई बड़े नाम इसी भीड़ से निकलकर सितारे बने। अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने करियर के शुरुआती दौर में छोटी-मोटी भूमिकाओं के साथ-साथ कई बार भीड़ के दृश्यों का हिस्सा बनकर काम किया। इससे पहले कि उन्हें 1999 में 'सरफरोश' में एक छोटा किरदार मिला। दिलचस्प यह है कि खुद 'रामायण' में सीता का रोल कर रहीं अभिनेत्री साई पल्लवी ने भी 2008 में कंगना रनौत की एक फिल्म में जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर करियर शुरू किया था। पंकज त्रिपाठी की कहानी भी संघर्ष की है, उन्होंने 2004 में फिल्म 'रन' से छोटी भूमिकाओं के साथ शुरुआत की थी।
भारत में जूनियर आर्टिस्टों और डबिंग कलाकारों के संगठन 2026 में लगातार इस मुद्दे पर बातचीत कर रहे हैं, क्योंकि AI धीरे-धीरे भीड़ और बैकग्राउंड आवाज़ों की भूमिकाएं भी अपने हाथ में लेता जा रहा है। हॉलीवुड में यह लड़ाई पहले ही औपचारिक रूप ले चुकी है। करीब 118 दिन चली हड़ताल के बाद दिसंबर 2023 में हुए SAG-AFTRA समझौते में यह तय किया गया कि स्टूडियो किसी बैकग्राउंड कलाकार के डिजिटल रेप्लिका का इस्तेमाल उसकी सहमति और मुआवजे के बिना, या उसे असल में काम पर रखने से बचने के लिए नहीं कर सकते।
भारत में फिलहाल ऐसा कोई औपचारिक नियमन मौजूद नहीं है। भारतीय फिल्ममेकर विक्रमादित्य मोटवानी जैसे लोग भी पूरी तरह AI-जनित फिल्मों की घोषणाओं पर सार्वजनिक तौर पर सवाल उठा चुके हैं। हर फिल्ममेकर इस राह पर नहीं है। निर्देशक एसएस राजामौली ने अपनी आगामी फिल्म 'वाराणसी' के लिए साफ कहा है कि हर भाषा के डबिंग वर्जन के लिए वे असली आवाज कलाकारों को ही चुनेंगे, क्योंकि उनका मानना है कि आवाज किसी भी कलाकार की परफॉर्मेंस का अहम हिस्सा है। जिसे कोई मशीन बदल नहीं सकती। इसी तरह हॉलीवुड में क्रिस्टोफर नोलन ने अपनी फिल्म 'द ओडिसी' के ट्रॉय-युद्ध के दृश्यों के लिए डिजिटल भीड़ की बजाय हजारों स्थानीय कलाकारों को असली पोशाक और हथियारों के साथ सेट पर उतारा और भीड़ के डिजिटल दोहराव का सहारा नहीं लिया।