
भारतीय कृषि क्षेत्र की रफ्तार हरित क्रांति के बाद के दौर से आगे निकल गई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. मांगीलाल जाट समेत तीन शोधकर्ताओं के ताजा अध्ययन के मुताबिक, 2015 के बाद कृषि विकास दर औसतन करीब 4.5% रही, जबकि 1967-95 और 1996-2014 के दौरान यह करीब 3% थी। यह अध्ययन "बियॉन्ड द ग्रीन रेवोल्यूशन: अनरैवलिंग न्यू डायनामिक्स ऑफ इंडियाज एग्रीफूड सिस्टम ट्रांसफॉर्मेशन" शीर्षक से इंडियन जर्नल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज में प्रकाशित हुआ है। इसके अन्य लेखक रिस के प्रताप सिंह बिरथल और इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के एस.जे. बालाजी हैं।
इस औसत बढ़ोतरी का मतलब कृषि उत्पादन या कृषि अर्थव्यवस्था के आकार में 50% वृद्धि नहीं है। यह औसत वार्षिक विकास दर के 3% से बढ़कर 4.5% होने का सापेक्ष अंतर है, यानी करीब 1.5 प्रतिशत अंक की तेजी से वृद्धि।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ICAR अध्ययन ने हरित क्रांति के बाद के सफर को 3 चरणों में बांटा है। 1967-95 में तकनीक आधारित अनाज उत्पादन बढ़ाने पर जोर रहा। 1996-2014 में मांग आधारित विविधीकरण हुआ, यानी बागवानी और पशुपालन को गति मिली। 2015 के बाद की वृद्धि टिकाऊपन पर आधारित विविधीकरण से आई है।
अध्ययन के अनुसार 2015-24 में चावल की उपज वृद्धि दर 2.1% सालाना रही, जो 1996-2014 में 1.6% थी। गेहूं में यह दर 1.1% से बढ़कर 2% और मक्का में 2.7% से बढ़कर 3.4% हो गई। इस दौर में खाद्यान्न उत्पादन में सालाना करीब 8.4 मिलियन टन की तेजी आई। साथ ही बागवानी की रफ्तार बनी रही, दूध उत्पादन में सालाना 10 मिलियन टन की सबसे बड़ी बढ़ोतरी दर्ज हुई और मछली व पोल्ट्री का उत्पादन तेजी से फैला। अध्ययन का निष्कर्ष है कि इस बार वृद्धि अनाज की उपज बढ़ने और उच्च-मूल्य वाली खेती के विस्तार, दोनों से आई है, इसलिए यह पहले से ज्यादा व्यापक है।
कृषि मंत्रालय के अंतिम अनुमानों के मुताबिक 2024-25 में देश का खाद्यान्न उत्पादन रिकॉर्ड 357.73 मिलियन टन रहा। यह 2015-16 के 251.54 मिलियन टन से करीब 106 मिलियन टन ज्यादा है। सरकार के तीसरे अग्रिम अनुमान में 2025-26 के लिए यह आंकड़ा 376.56 मिलियन टन बताया गया है। आर्थिक समीक्षा 2025-26 के अनुसार बागवानी अब कृषि के सकल मूल्य वर्धन (GVA) का करीब 33% है और 2024-25 में उसका उत्पादन 362.08 मिलियन टन रहा, जो खाद्यान्न उत्पादन से ज्यादा है। यानी अध्ययन की "विविधीकरण" वाली बात सरकारी आंकड़ों में भी दिखती है।
4.5% का आंकड़ा 2015 के बाद की अवधि का औसत है, हर साल की वृद्धि दर नहीं। सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI) के दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार 2025-26 में कृषि और संबद्ध क्षेत्र का GVA 2.4% बढ़ा। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में यह वृद्धि 3.6% रही, जबकि पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में 4.4% थी। बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार 30 अगस्त तक मानसून सामान्य से करीब 14% कम रहा और जून में बारिश 36% से ज्यादा घटने से खरीफ का रकबा घटा, हालांकि जुलाई में तेज बारिश से कमी कुछ कम हुई। इसलिए जलवायु का जोखिम अब भी बना हुआ है।
अध्ययन में कहा गया है कि हरित क्रांति ने खाद्य सुरक्षा दी, पर उसके प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण पर पड़े असर जल्द सामने आ गए। उर्वरक और सिंचाई के लिए बिजली पर सब्सिडी और चावल-गेहूं की एमएसपी पर खरीद ने इन दोनों फसलों के रकबे को बढ़ावा दिया। इसकी कीमत बाजरा, दलहन और तिलहन जैसी पौष्टिक फसलों को चुकानी पड़ी और ऊंचे मूल्य वाली खेती की ओर बढ़ना भी मुश्किल हुआ। अध्ययन के अनुसार 4.5% की रफ्तार बनाए रखने के लिए इन प्रोत्साहनों को धीरे-धीरे संसाधन संरक्षण, जलवायु सहनशीलता और टिकाऊपन की नई प्राथमिकताओं के अनुरूप ढालना होगा। साथ ही उत्पादकता, खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।