
Rainfall and Water Crisis: भारत में बारिश और जल संकट का रिश्ता पहली नजर में विरोधाभासी लगता है। देश में हर साल बड़ी मात्रा में बारिश होती है, फिर भी कई शहरों और गांवों को पानी की कमी का सामना करना पड़ता है। इसकी वजह सिर्फ बारिश की कमी नहीं, बल्कि बारिश का असमान वितरण, जल भंडारण की कमी, भूजल का अत्यधिक दोहन और कमजोर जल प्रबंधन है। बदलते मौसम के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत आने वाले जल संकट के लिए तैयार है?
इस वर्ष मानसून की शुरुआत देर से हुई और जून में बारिश में करीब 42-43 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इसके चलते कई जिलों में आपातकालीन योजनाओं की जरूरत पड़ी। हालांकि, इसे केवल एक मौसम की घटना मानना सही नहीं होगा। मानसून का बदलता पैटर्न भारत की जल व्यवस्था के सामने लगातार चुनौती बन रहा है।
कहीं मानसून देर से पहुंचता है तो कहीं लंबे समय तक बारिश नहीं होती। इसके बाद अचानक कुछ दिनों में भारी बारिश हो जाती है। इससे एक तरफ बाढ़ और जलभराव की स्थिति बनती है तो दूसरी तरफ लंबे समय के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित होती है।
बारिश में कमी का असर देश के जल भंडार पर भी दिखाई देता है। जून के अंत तक प्रमुख जलाशयों में जल स्तर पिछले वर्ष और 10 साल के औसत की तुलना में करीब 10 प्रतिशत कम था। जलाशयों में कम पानी का असर पेयजल के साथ सिंचाई और बिजली उत्पादन पर भी पड़ सकता है।
भारत में जल संकट को केवल कम बारिश से जोड़कर देखना अधूरा होगा। असली चुनौती जल तनाव यानी Water Stress की है। जब किसी क्षेत्र में उपलब्ध पानी की तुलना में उसकी मांग लगातार बढ़ती है तो जल तनाव पैदा होता है।
असमान सिंचाई व्यवस्था, भूजल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल, तेजी से बढ़ते शहर, कमजोर जल प्रबंधन और पानी के वितरण में असमानता इस संकट को बढ़ाते हैं। यानी किसी क्षेत्र में बारिश सामान्य से ज्यादा हो सकती है, लेकिन अगर उसे सहेजने की व्यवस्था नहीं है तो कुछ समय बाद वही क्षेत्र पानी की कमी से जूझ सकता है।
भारत में हर साल करीब 3,880 अरब घन मीटर वर्षा होती है, लेकिन इसका केवल एक छोटा हिस्सा ही उपयोग में आ पाता है। इसकी बड़ी वजह बारिश का असमान भौगोलिक और मौसमी वितरण है।
शहरों में स्थिति और चुनौतीपूर्ण है। कुछ घंटों की तेज बारिश के बाद सड़कें और नाले पानी से भर जाते हैं, लेकिन यही पानी भूजल रिचार्ज में पर्याप्त योगदान नहीं दे पाता। कंक्रीट से ढके शहरों में पानी जमीन में जाने के बजाय नालों से बहकर बाहर निकल जाता है। दूसरी तरफ लगातार भूजल निकाले जाने से भूमिगत जल स्तर गिरता रहता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का पैटर्न भी बदल रहा है। कई क्षेत्रों में अब कुछ दिनों में बहुत ज्यादा बारिश होती है और उसके बाद लंबे समय तक सूखा जैसी स्थिति रहती है। वैज्ञानिक अध्ययनों में भारी बारिश की घटनाओं में वृद्धि के संकेत मिले हैं।
मानसून की कुल बारिश में छोटे स्तर पर 5 से 10 प्रतिशत तक वृद्धि संभव होने के बावजूद इससे जल संकट खत्म नहीं होगा। असली चुनौती यह है कि बारिश कब, कहां और कितनी तीव्रता से हो रही है।
मौजूदा हालात बताते हैं कि जल प्रबंधन को और मजबूत करने की जरूरत है। बारिश के पानी का बेहतर भंडारण, तालाबों और झीलों का पुनरुद्धार, शहरी जल निकायों की सुरक्षा और गांवों में पारंपरिक जल स्रोतों को बचाना जरूरी है।
कृषि क्षेत्र में भी कम पानी वाली फसलों, बेहतर फसल पैटर्न और ड्रिप-स्प्रिंकलर जैसी सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देना होगा। क्लाइमेट-रेजिलिएंट एग्रीकल्चर आने वाले समय में जल संकट से निपटने का अहम रास्ता हो सकता है। आम लोग भी घरों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग अपनाकर और स्थानीय जल स्रोतों की सुरक्षा में योगदान देकर भूमिका निभा सकते हैं।
बारिश कब होगी और कितनी होगी, इसे नियंत्रित करना हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन बारिश के पानी को रोकना, सहेजना और सही समय पर इस्तेमाल करना हमारे हाथ में है। आने वाले समय में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि कितनी बारिश हुई, बल्कि यह भी होगा कि बारिश का कितना पानी हमने बचाया।