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क्राइम फाइल: बेहमई नरसंहार- 14 फरवरी 1981 की वो दोपहर, जब बदले की आग में 20 जिंदगियां बुझ गईं

Behmai Massacre Phoolan Devi Story : 14 फरवरी 1981 के बेहमई नरसंहार की पूरी कहानी: जानिए बदले की आग में कैसे बुझी थीं 20 जिंदगियां, फूलन देवी की भूमिका और 43 साल बाद आए अदालती फैसले की पूरी सच्चाई।
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Aug 22, 2026
Behmai Massacre Phoolan Devi Story
Behmai Massacre Phoolan Devi Story : जानिए क्या था बेहमई कांड, PC- Chatgpt

14 फरवरी 1981। वैलेंटाइन डे के नाम से दुनिया जिस दिन प्यार याद करती है, उसी दिन उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में नफरत और बदले की ऐसी कहानी लिखी गई, जिसे चार दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी भुलाया नहीं जा सका।

चंबल के बीहड़ों से घिरा बेहमई गांव उस दिन बिल्कुल सामान्य था। गांव के लोग अपने रोजमर्रा के काम में लगे थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही देर में बंदूकें गरजेंगी और गांव की गलियों में खून बिखर जाएगा। दोपहर के आसपास हथियारों से लैस डकैतों का एक गिरोह गांव में दाखिल हुआ। उनके निशाने पर एक खास आदमी था। उसे ढूंढने के लिए घर-घर तलाशी शुरू हुई। लेकिन वह आदमी गांव में नहीं मिला।

इसके बाद जो हुआ, उसने बेहमई को हमेशा के लिए इतिहास के सबसे भयावह अध्यायों में शामिल कर दिया। 20 लोगों को एक जगह इकट्ठा किया गया और गोलियों से भून दिया गया। छह लोग घायल हुए। इस नरसंहार के साथ एक नाम पूरे देश में गूंजा—फूलन देवी।

लेकिन बेहमई की कहानी सिर्फ 20 हत्याओं की कहानी नहीं है। यह गरीबी, जातीय तनाव, डकैत गिरोहों की दुश्मनी, यौन हिंसा, बदले और उस दौर की कमजोर कानून-व्यवस्था से मिलकर बनी एक ऐसी कहानी है, जिसकी कई परतें आज भी विवादित हैं।

कहानी बेहमई से नहीं, फूलन की जिंदगी से शुरू होती है

फूलन देवी का जन्म उत्तर प्रदेश के एक बेहद गरीब मल्लाह परिवार में हुआ था। छोटी उम्र में शादी, गरीबी और सामाजिक भेदभाव ने उनके जीवन को पहले ही कठिन बना दिया था। लेकिन आगे जो हुआ, उसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी।

फूलन चंबल के बीहड़ों में पहुंचीं और डकैतों की दुनिया का हिस्सा बन गईं। इसी दौरान उनकी मुलाकात विक्रम मल्लाह से हुई। विक्रम भी डकैत गिरोह से जुड़ा था। कहा जाता है कि विक्रम ने फूलन को गिरोह में संरक्षण दिया। दोनों के बीच नजदीकी बढ़ी और कुछ समय तक फूलन उसी के साथ रहीं।

लेकिन चंबल में किसी रिश्ते का अंत सिर्फ निजी मामला नहीं होता था। यहां हर दुश्मनी के पीछे बंदूक थी और हर बंदूक के पीछे कोई पुराना हिसाब। फूलन की जिंदगी में भी ऐसा ही होने वाला था।

विक्रम मल्लाह की हत्या ने सब कुछ बदल दिया

1980 में विक्रम मल्लाह की हत्या कर दी गई। विक्रम की हत्या का आरोप श्रीराम और लाला राम समेत ठाकुर गिरोह के सदस्यों पर लगा। विक्रम की मौत के बाद फूलन की जिंदगी में बदले की भावना और गहरी हो गई।

लेकिन इसके बाद फूलन के साथ जो हुआ, वही आगे चलकर बेहमई नरसंहार की कहानी का सबसे संवेदनशील हिस्सा बना। उपलब्ध अदालत रिकॉर्ड और विभिन्न विवरणों के अनुसार, विक्रम की हत्या के बाद फूलन को श्रीराम और लाला राम के गिरोह द्वारा अगवा किया गया और उनके साथ यौन हिंसा की गई। उन्हें बेहमई में सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने की बात भी रिकॉर्ड में मिलती है।

यहीं से व्यक्तिगत अपमान और बदले की कहानी शुरू होती है। फूलन के लिए अब श्रीराम और लाला राम सिर्फ दुश्मन नहीं थे। वे उस हिंसा और अपमान की याद बन चुके थे, जिसने उनकी जिंदगी को फिर से बदल दिया था।

फिर शुरू हुई श्रीराम और लाला राम की तलाश

विक्रम की हत्या के बाद फूलन ने नया गिरोह बनाया और चंबल के बीहड़ों में उनका प्रभाव बढ़ता गया। अब उनके सामने एक लक्ष्य था- श्रीराम और लाला राम।

इसी तलाश में 14 फरवरी 1981 को फूलन के गिरोह के लोग बेहमई पहुंचे। गांव में अचानक हथियारबंद लोगों को देखकर अफरातफरी मच गई। लोग समझ ही नहीं पाए कि आखिर हो क्या रहा है।

डकैत घरों में घुसे। पुरुषों को बाहर निकाला जाने लगा। उनसे पूछताछ की गई। गिरोह को उस आदमी की तलाश थी, जिसे वे अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे। लेकिन श्रीराम और लाला राम बेहमई में नहीं मिले। यहीं से कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसने आने वाली पीढ़ियों तक इस गांव को दर्द दे दिया।

एक कतार में खड़े कर दिए गए गांव के पुरुष

गांव के कई पुरुषों को एक जगह इकट्ठा किया गया। कुछ लोगों ने बचने की कोशिश की। कुछ ने छिपने की कोशिश की। लेकिन हथियारों के सामने गांव के लोग बेबस थे। फिर उन्हें एक कतार में खड़ा किया गया। कुछ ही देर बाद बंदूकें गरजने लगीं। गोलियों की आवाज पूरे गांव में गूंज गई।

जब गोलीबारी रुकी तो वहां 20 लोगों की लाशें पड़ी थीं। छह लोग घायल थे। बेहमई की वह दोपहर खत्म हो चुकी थी, लेकिन उसका खौफ कभी खत्म नहीं हुआ।

क्या मारे गए सभी लोग ठाकुर थे?

बेहमई नरसंहार को अक्सर '20 ठाकुरों की हत्या' के तौर पर बताया जाता है। लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक तस्वीर थोड़ी अलग है। मारे गए 20 लोगों में 17 ठाकुर थे, जबकि बाकी तीन अलग सामाजिक समुदायों से थे।

यानी घटना में ठाकुर समुदाय के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा थी, लेकिन सभी मृतक ठाकुर नहीं थे। यही वजह है कि बेहमई को केवल जातीय नरसंहार कह देना भी पूरी कहानी को समेट नहीं पाता। इसमें जातीय तनाव जरूर एक महत्वपूर्ण परत थी, लेकिन इसके साथ डकैत गिरोहों की दुश्मनी और व्यक्तिगत बदला भी जुड़ा हुआ था।

और यहीं से शुरू हुआ सबसे बड़ा सवाल-फूलन देवी कहां थीं?

बेहमई नरसंहार की सबसे बड़ी पहेली आज भी यही है। क्या फूलन देवी ने खुद लोगों को लाइन में खड़ा किया था? क्या उन्होंने गोली चलाने का आदेश दिया था? क्या वह उस समय घटनास्थल पर मौजूद थीं?

इन सवालों के जवाब को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। पुलिस और अभियोजन की कहानी में फूलन देवी इस गिरोह की प्रमुख सदस्य और बेहमई मामले की मुख्य आरोपियों में थीं।

लेकिन फूलन देवी ने खुद घटना में अपनी प्रत्यक्ष भूमिका से इनकार किया था। बाद में उन्होंने दावा किया कि गोलीबारी के समय वह घटनास्थल पर नहीं थीं और गिरोह के कुछ लोगों के साथ बेटवा नदी के किनारे थीं।

कुछ गवाहों के बयानों में भी उनकी मौजूदगी और गोली चलाने की प्रत्यक्ष भूमिका को लेकर सवाल उठे। यही कारण है कि आज भी यह कहना कि “फूलन देवी ने खुद 20 लोगों को गोली मारी”, निर्विवाद तथ्य नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि उनका नाम बेहमई कांड से हमेशा के लिए जुड़ गया।

बेहमई के बाद फूलन देवी बन गईं पुलिस की सबसे बड़ी चुनौती

नरसंहार के बाद पूरे उत्तर प्रदेश में हड़कंप मच गया। सरकार और पुलिस पर भारी दबाव था। एक महिला डकैत, जिसने कथित तौर पर पूरे गांव में हमला कराया था, पुलिस के लिए चुनौती बन चुकी थी।

फूलन कई महीनों तक बीहड़ों में रहीं। उनकी तलाश जारी रही। उनकी कहानी धीरे-धीरे अपराध की खबर से निकलकर बदले, जाति और महिलाओं के खिलाफ हिंसा की कहानी बनती गई।

लोगों के लिए फूलन की अलग-अलग तस्वीरें थीं। किसी के लिए वह खूंखार डकैत थीं। किसी के लिए वह अत्याचार का बदला लेने वाली महिला थीं। और किसी के लिए वह उस व्यवस्था की उपज थीं, जिसने एक गरीब लड़की को लगातार हिंसा की तरफ धकेला।

दो साल बाद हुआ आत्मसमर्पण

लगभग दो साल तक बीहड़ों में रहने के बाद 1983 में फूलन देवी ने मध्य प्रदेश में आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और वह लंबे समय तक जेल में रहीं।

इस दौरान बेहमई का मुकदमा चलता रहा, लेकिन न्याय की रफ्तार बेहद धीमी थी। समय बीतता गया। गवाह बूढ़े होते गए। आरोपियों में कई की मौत हो गई। और फिर 2001 में खुद फूलन देवी की हत्या कर दी गई। लेकिन, बेहमई का मुकदमा चलता रहा।

43 साल बाद आया फैसला

बेहमई नरसंहार के 43 साल बाद, 14 फरवरी 2024 को, कानपुर देहात की अदालत ने मामले में फैसला सुनाया। मामले में श्याम बाबू को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। वहीं दूसरे आरोपी विश्वनाथ को घटना के समय नाबालिग पाए जाने के कारण बरी कर दिया गया।

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि बेहमई कांड के बाद पहली बार इस मामले में किसी आरोपी को अदालत से दोषी ठहराया गया। लेकिन तब तक उस घटना के कई किरदार इस दुनिया में नहीं थे, जिन परिवारों ने 1981 में अपने लोगों को खोया था, उनके लिए न्याय आने में चार दशक से ज्यादा समय लग चुका था।

आखिर बेहमई में इतना बड़ा नरसंहार क्यों हुआ?

बेहमई की कहानी को सिर्फ एक कारण से समझना मुश्किल है। इसके पीछे कई परतें थीं। पहली परत व्यक्तिगत बदले की थी। फूलन के साथ हुई कथित यौन हिंसा और अपमान ने उनके भीतर बदले की भावना पैदा की।

दूसरी परत विक्रम मल्लाह की हत्या थी। विक्रम की हत्या ने फूलन और ठाकुर गिरोह के बीच दुश्मनी को और गहरा किया। तीसरी परत डकैतों की दुनिया थी। चंबल में उस समय अलग-अलग गिरोहों के बीच इलाके, वर्चस्व और पुराने हिसाब को लेकर संघर्ष चलता था।

चौथी परत जातीय तनाव था। मल्लाह और ठाकुर समुदायों के बीच मौजूद सामाजिक तनाव ने इस संघर्ष को और खतरनाक बनाया। पांचवीं परत कमजोर कानून-व्यवस्था थी। बीहड़ों में पुलिस और प्रशासन की सीमित पहुंच ने डकैतों को लंबे समय तक प्रभाव बनाए रखने का मौका दिया।

बेहमई की सबसे बड़ी सच्चाई क्या है?

बेहमई की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि 20 लोगों की हत्या का सच अदालत के रिकॉर्ड में मौजूद होने के बावजूद, इस घटना की पूरी कहानी आज भी कई सवालों के साथ खड़ी है।

यह निर्विवाद है कि 14 फरवरी 1981 को बेहमई में 20 लोगों की हत्या हुई। यह भी रिकॉर्ड में है कि फूलन देवी इस मामले की प्रमुख आरोपियों में थीं।

लेकिन उन्होंने खुद कितनी भूमिका निभाई, क्या उन्होंने गोली चलाने का आदेश दिया और क्या वह गोलीबारी के वक्त घटनास्थल पर थीं। इन सवालों पर अलग-अलग बयान और दावे मौजूद हैं।

इसलिए बेहमई को सिर्फ “फूलन देवी का बदला” कह देना इस त्रासदी को बहुत छोटा कर देता है। यह कहानी उस दौर के चंबल की भी है, जहां जाति, गरीबी, यौन हिंसा, बदला, बंदूक और सत्ता एक-दूसरे में उलझ चुके थे और बेहमई की उस दोपहर ने दिखा दिया था कि जब इन सबका मेल होता है, तो उसका अंत सिर्फ अपराध की एक घटना नहीं होता। वह पीढ़ियों तक रहने वाला जख्म बन जाता है।

Updated on:
22 Aug 2026 04:34 pm
Published on:
22 Aug 2026 04:34 pm