
बॉलीवुड में कुछ कलाकार ऐसे हैं जिन्हें पर्दे पर देखते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। संजय मिश्रा ऐसे ही कलाकार हैं। 6 अक्टूबर को वे अपना 63वां जन्मदिन मनाएंगे। उनका जन्म 1963 में बिहार के दरभंगा में हुआ था, जबकि बचपन वाराणसी में बीता। रोल छोटा हो या बड़ा, वे अपनी अदाकारी से किरदार में जान डाल देते हैं। उनकी जिंदगी का एक दौर ऐसा भी रहा, जब उन्होंने एक्टिंग से पूरी तरह दूरी बना ली थी और ऋषिकेश के एक ढाबे पर काम करने लगे थे।
वाराणसी में बचपन बिताने के बाद संजय मिश्रा ने दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से पढ़ाई की और 1989 में ग्रेजुएशन किया। थिएटर और टेलीविजन के जरिए उन्होंने अभिनय की दुनिया में जगह बनानी शुरू की। उन्होंने करियर की शुरुआत 1991 में टीवी शो 'चाणक्य' से की, जबकि 2001 में आए 'ऑफिस ऑफिस' से वे घर-घर में पहचाने जाने लगे। इसी बीच 2005 के क्रिकेट विश्व कप के दौरान 'मौका मौका' विज्ञापन में उनका 'एप्पल सिंह' किरदार खूब लोकप्रिय हुआ। इससे उन्हें पड़ोसी देशों में भी पहचान मिली।
फिल्मों में संजय मिश्रा का सफर 'ओह डार्लिंग! ये है इंडिया!' से शुरू हुआ। इसके बाद वे 'सत्या', 'दिल से..', 'वजूद', 'राजकुमार' और 'फिर भी दिल है हिंदुस्तानी' जैसी फिल्मों में नजर आए। धीरे-धीरे उनकी पहचान ऐसे कलाकार की बनी जो हर तरह का किरदार अपने अंदाज में निभा सकता है।
फिल्मी करियर के बीच उनकी निजी जिंदगी में एक बड़ा झटका लगा। पिता के निधन के बाद उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली और मुंबई की चमक-दमक छोड़कर ऋषिकेश चले गए। वहां उन्होंने एक ढाबे पर काम शुरू किया और लोगों के लिए ऑमलेट बनाने लगे। ढाबे पर कुछ लोग उन्हें पहचान लेते और पूछते कि क्या वे 'गोलमाल' वाले संजय मिश्रा हैं। वे हंसकर कह देते कि वे उस अभिनेता के हमशक्ल हैं।
संजय मिश्रा ढावे पर काम करके दिन गुजार रहे थे, लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। निर्देशक रोहित शेट्टी ने उन्हें फिल्मों में लौटने के लिए मनाया और उन्हें 'ऑल द बेस्ट' में काम मिला। यहीं से उनका करियर दोबारा शुरू हुआ।
कॉमेडी: 'गोलमाल: फन अनलिमिटेड' में 'द डॉन' और 'धमाल' में डकैत बाबू भाई जैसे किरदारों ने दर्शकों को खूब हंसाया। 'वेलकम', 'दिलवाले', 'फिर भी दिल है हिंदुस्तानी' और 'भूल भुलैया' भी उनके सफर के अहम पड़ाव रहे। 'दम लगा के हईशा' में चंद्रभान तिवारी, 'जॉली एलएलबी' और 'जॉली एलएलबी 2' में गुरु जी, 'जेड प्लस' और 'फंस गए रे ओबामा' जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी।
गंभीर और समानांतर सिनेमा: 'आंखों देखी' में राजेश बाऊजी का किरदार उनके करियर की सबसे गहरी भूमिकाओं में गिना जाता है। 'मसान' (विद्याधर पाठक), 'न्यूटन', 'वध' और 'भक्षक' ने साबित किया कि वे सिर्फ कॉमेडियन नहीं, बल्कि बेहद संवेदनशील अभिनेता हैं।
संजय मिश्रा को 'आंखों देखी' के लिए उन्हें फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड मिला। नवभारत लाइव की रिपोर्ट के अनुसार यह फिल्म आज भी भारतीय सिनेमा की गहरी फिल्मों में गिनी जाती है। विकिपीडिया के हवाले से एक प्रोफाइल बताती है कि उन्होंने 'आंखों देखी' और 'वध' के लिए दो बार फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) जीता है।
सबसे बड़ा सम्मान 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में मिला। 'भक्षक' में भास्कर सिन्हा की भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। एएनआई से बातचीत में उन्होंने कहा कि उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार की कभी कल्पना नहीं की थी। उन्होंने भूमि पेडनेकर को अपना 'लकी चार्म' बताया। उन्होंने यह भी साझा किया कि उनके दिवंगत पिता प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) में काम करते थे और खबर उसी दफ्तर के जरिए आई। इस बात ने उस पल को उनके लिए बेहद भावुक बना दिया।
संजय मिश्रा आज भी हर किरदार में सादगी और ईमानदारी लाते हैं और शोहरत के पीछे नहीं भागे, बल्कि अभिनय को ही अपनी पहचान बनाया। 'मेन्स वर्ल्ड इंडिया' की एक प्रोफाइल उन्हें मुख्यधारा और कला सिनेमा के बीच संतुलन बनाने वाले कलाकार के रूप में दिखाती है। विकिपीडिया-आधारित सूची में उनकी 2026 की फिल्म 'कर्तव्य' भी दर्ज है। कमर्शियल हंसी से लेकर संजीदा किरदारों तक, ढाबे के चूल्हे से राष्ट्रीय पुरस्कार तक, संजय मिश्रा की कहानी बताती है कि सच्चा हुनर देर-सबेर अपनी जगह बना ही लेता है।