
भारत में मानसून को आमतौर पर बारिश के मौसम के तौर पर देखा जाता है। लेकिन, 2026 का मानसून एक अलग तस्वीर दिखा रहा है। बारिश की कुल मात्रा और बारिश के तरीके में अंतर साफ दिखाई दे रहा है। देश में कई जगह लंबे समय तक बारिश कम होती है और फिर अचानक कुछ घंटों या कुछ दिनों में इतनी तेज बारिश होती है कि नदियां उफान पर आ जाती हैं, शहरों में पानी भर जाता है और पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के Monsoon Online आंकड़ों के मुताबिक 1 जून से 20 अगस्त 2026 तक देश में 540.8 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 619.8 मिमी होनी चाहिए थी। यानी इस अवधि में बारिश सामान्य से करीब 12.75% कम रही।
यही इस साल के मानसून की सबसे बड़ी पहेली है। कुल बारिश कम, लेकिन कई जगह बारिश बेहद ज्यादा। पहले समझिए- बारिश कम है तो बाढ़ कैसे आ रही है? इसे समझने के लिए बारिश की मात्रा से ज्यादा उसकी टाइमिंग और वितरण देखना होगा।
मान लीजिए किसी इलाके में 10 दिन में 100 मिमी बारिश होती है। यह बारिश धीरे-धीरे होती है तो जमीन उसे सोख सकती है, नदियों और नालों में पानी धीरे-धीरे पहुंचता है और बाढ़ का खतरा कम रहता है। लेकिन अगर यही 100 मिमी बारिश 24 या 48 घंटे में हो जाए तो स्थिति बदल जाती है।
जमीन की पानी सोखने की क्षमता सीमित हो जाती है। नाले और छोटी नदियां जल्दी भर जाती हैं। शहरी इलाकों में कंक्रीट की सतह पानी को जमीन में जाने नहीं देती। नतीजा, फ्लैश फ्लड और जलभराव। यानी समस्या सिर्फ यह नहीं है कि कितनी बारिश हुई, बल्कि यह भी है कि कब, कितनी तेजी से और किस इलाके में हुई।
अगस्त में देश के अलग-अलग हिस्सों में कई कम दबाव वाले क्षेत्र और मानसूनी सिस्टम सक्रिय रहे हैं। IMD के मुताबिक 23 अगस्त को मानसून ट्रफ अमृतसर, पटियाला, बरेली, वाराणसी, डाल्टनगंज और जमशेदपुर होते हुए बंगाल की खाड़ी तक फैली थी। इसी सिस्टम के आसपास बारिश की गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।
अगस्त के दौरान IMD ने मध्य भारत, उत्तर भारत, पूर्वी भारत, हिमालयी क्षेत्रों और दक्षिणी राज्यों के अलग-अलग हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश के अलर्ट जारी किए हैं। अगस्त के शुरुआती और मध्य हिस्से में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और दक्षिणी राज्यों में सक्रिय मौसम प्रणालियों के कारण भारी बारिश की घटनाएं दर्ज हुईं।
इसका मतलब यह नहीं कि पूरे देश में एक जैसा मौसम है। एक ही समय में एक राज्य में बाढ़ और दूसरे इलाके में बारिश की कमी हो सकती है। यही बदलते मानसून की सबसे बड़ी चुनौती है।
इस सवाल का जवाब थोड़ा सावधानी से समझना जरूरी है। सिर्फ एक साल के आंकड़ों से यह कहना सही नहीं होगा कि मानसून का स्थायी पैटर्न बदल गया है। लेकिन वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों के लिए बारिश का अधिक असमान वितरण और कम अवधि में अत्यधिक बारिश की घटनाएं महत्वपूर्ण संकेत हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण वातावरण गर्म होता है तो हवा ज्यादा नमी धारण कर सकती है। जब अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं, तो यह अतिरिक्त नमी कम समय में ज्यादा बारिश के रूप में गिर सकती है। यानी भविष्य की चुनौती केवल 'कम बारिश' या 'ज्यादा बारिश' नहीं हो सकती, बल्कि 'गलत समय पर बहुत ज्यादा बारिश' भी हो सकती है।
विश्व मौसम संगठन ने भी जुलाई और अगस्त 2026 के मौसम में रिकॉर्ड गर्मी के साथ बाढ़, सूखे और अन्य चरम मौसम की घटनाओं को लेकर चिंता जताई है।
यह भी मानसून के बदलते व्यवहार का अहम हिस्सा है। बारिश के बीच जब कुछ दिनों के लिए मौसम साफ होता है, तो तापमान बढ़ सकता है। ज्यादा नमी के कारण शरीर को पसीना सूखने में मुश्किल होती है। इसलिए तापमान बहुत ज्यादा न होने के बावजूद उमस और हीट स्ट्रेस महसूस हो सकता है। यानी मानसून के दौरान भी गर्मी पूरी तरह खत्म नहीं होती। कुछ क्षेत्रों में बारिश कम होने पर दिन का तापमान सामान्य से ऊपर जा सकता है, जबकि आसपास के इलाकों में भारी बारिश हो सकती है।
हिमाचल प्रदेश के लिए IMD के अगस्त पूर्वानुमान में भी कई हिस्सों में न्यूनतम और अधिकतम तापमान सामान्य से ऊपर रहने की संभावना जताई गई थी। साथ ही राज्य के अलग-अलग हिस्सों में बारिश के वितरण में भी अंतर का अनुमान था।
यहां कहानी में एक और महत्वपूर्ण फैक्टर जुड़ता है-शहरीकरण और जमीन का इस्तेमाल। शहरों में तेजी से बढ़ती कंक्रीट की सतह बारिश के पानी को जमीन में जाने से रोकती है। पुराने नाले और ड्रेनेज सिस्टम कम समय में आने वाले भारी पानी को संभाल नहीं पाते। इसीलिए कभी-कभी कुछ घंटों की बारिश भी बड़े शहरों में जलभराव पैदा कर देती है।
ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में स्थिति अलग है। वहां भारी बारिश के साथ नदी का जलस्तर बढ़ना, मिट्टी का कटाव, भूस्खलन और सड़कें टूटना बड़ी समस्या बन जाती है। इसलिए एक जैसी बारिश अलग-अलग जगहों पर अलग तरह की आपदा पैदा करती है।
उत्तर भारत : उत्तर प्रदेश और आसपास के इलाकों में अगस्त के दौरान भारी बारिश और बढ़ते नदी जलस्तर के कारण कई क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा रहा। 19 अगस्त तक उत्तर प्रदेश के 13 जिलों के 173 गांव प्रभावित होने और 4,845 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।
हिमालयी क्षेत्र : हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में बारिश का मतलब सिर्फ पानी नहीं है। यहां भारी बारिश के साथ भूस्खलन, बादल फटने जैसी स्थानीय घटनाओं और सड़क संपर्क टूटने का खतरा बढ़ जाता है। IMD ने अगस्त में पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में भारी से बहुत भारी बारिश की संभावनाओं को लेकर लगातार चेतावनियां जारी की हैं।
पूर्वी भारत : झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में कम दबाव वाले क्षेत्रों के कारण अगस्त में भारी बारिश के कई दौर आए। 15 अगस्त के IMD बुलेटिन में गंगीय पश्चिम बंगाल, उत्तरी ओडिशा और झारखंड में भारी से बहुत भारी बारिश तथा कुछ जगह अत्यधिक भारी बारिश की संभावना जताई गई थी।
पूर्वोत्तर भारत : असम सहित पूर्वोत्तर भारत में इस साल मानसून की भारी बारिश ने बाढ़ का बड़ा संकट पैदा किया। जुलाई में असम में बाढ़ की स्थिति बेहद गंभीर रही और लाखों लोग प्रभावित हुए।
किसान के लिए सिर्फ बारिश होना पर्याप्त नहीं है। फसल के सही चरण पर सही मात्रा में बारिश होना जरूरी है। धान जैसी फसल को पानी चाहिए, लेकिन लगातार जलभराव नुकसान पहुंचा सकता है। दूसरी तरफ बारिश के बीच लंबा सूखा अंतराल मिट्टी की नमी कम कर सकता है।
यानी किसान को इस साल दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है, बारिश कम हुई तो सिंचाई की जरूरत बढ़ेगी। अचानक बहुत ज्यादा हुई तो खेत में जलभराव और फसल नुकसान का खतरा बढ़ेगा। यही वजह है कि मानसून की कुल बारिश का आंकड़ा अकेले खेती की स्थिति बताने के लिए पर्याप्त नहीं है।
बारिश का यह असमान पैटर्न सीधे रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करता है।
23 अगस्त को भी IMD के अनुसार मानसून ट्रफ सक्रिय है और उत्तर भारत से लेकर पूर्वी भारत तथा बंगाल की खाड़ी तक मौसम प्रणाली बनी हुई है। इसलिए अगस्त के आखिरी दिनों में भी कई इलाकों में बारिश का दौर जारी रह सकता है। लेकिन असली सवाल सितंबर तक रहेगा—क्या बारिश पूरे देश में समान रूप से होगी या कुछ इलाकों में तेज बारिश और कुछ में कमी का सिलसिला जारी रहेगा?
2026 का मानसून फिलहाल हमें एक महत्वपूर्ण बात समझा रहा है, बारिश का मतलब सिर्फ बारिश की मात्रा नहीं है। देश में 20 अगस्त तक कुल मानसूनी बारिश सामान्य से करीब 13% कम थी, लेकिन इसी दौरान कई राज्यों में भारी से अत्यधिक भारी बारिश और बाढ़ की स्थितियां बनीं। इसलिए मौसम को समझने के लिए अब तीन आंकड़े साथ देखने होंगे-
यही तीन सवाल आने वाले वर्षों में भारत के मानसून, खेती, शहरों और बाढ़ के खतरे को समझने के लिए सबसे अहम हो सकते हैं।