
Rural to urban migration India : गांवों से क्यों हो रहा पलायन, PC- Gemini
भारत में शहरों की बढ़ती आबादी की कहानी सिर्फ महानगरों के विकास की कहानी नहीं है। इसके पीछे देश के गांवों और छोटे शहरों से निकलने वाले लाखों लोगों की भी कहानी है। कोई नौकरी की तलाश में दिल्ली, मुंबई, सूरत या बेंगलुरु पहुंचता है, कोई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पटना, प्रयागराज या दिल्ली जाता है और कोई बेहतर कॉलेज और करियर के लिए अपने जिले से बाहर निकल जाता है। यानी भारत का शहरीकरण सिर्फ शहरों के भीतर पैदा हुई आबादी से नहीं, बल्कि लगातार हो रहे पलायन से भी बन रहा है।
सरकारी स्तर पर जिलेवार पलायन को समझने के लिए सबसे विस्तृत आधिकारिक आंकड़े अभी जनगणना 2011 के हैं। जनगणना के D-03 और D-05 जैसे आंकड़ों में प्रवासियों को उनके अंतिम निवास स्थान, रहने की अवधि और पलायन के कारणों के आधार पर दर्ज किया गया है। इनमें रोजगार, कारोबार, शिक्षा, विवाह और परिवार के साथ स्थानांतरण जैसे कारण अलग-अलग दर्ज हैं।
यही आंकड़े बताते हैं कि पलायन को सिर्फ 'रोजगार की तलाश' कह देना पूरी तस्वीर नहीं है। किसी जिले से निकलने वाला युवा नौकरी के लिए जा सकता है, लेकिन उसके बाद परिवार भी उसके साथ शहर में बस सकता है। कोई छात्र पहले पढ़ाई के लिए जाता है और बाद में वहीं नौकरी पकड़ लेता है। इस तरह एक व्यक्ति का पलायन धीरे-धीरे पूरे परिवार के स्थायी स्थानांतरण में बदल सकता है।
अगर राज्यों की बात करें तो बिहार और उत्तर प्रदेश इस कहानी के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। बिहार के लिए जनगणना के जिला स्तर के आंकड़ों में अररिया, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, सहरसा, मधेपुरा, दरभंगा, समस्तीपुर, सीवान, सारण, गोपालगंज, वैशाली, बेगूसराय, खगड़िया, भोजपुर, बक्सर, रोहतास, गया, नवादा समेत सभी जिलों के प्रवासन संबंधी आंकड़े उपलब्ध हैं। इनमें उम्र, लिंग, प्रवास की अवधि और प्रवास के कारणों को अलग-अलग देखा जा सकता है।
उत्तर प्रदेश के मामले में भी जनगणना ने जिलेवार प्रवासन का रिकॉर्ड रखा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिले—जैसे गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, आजमगढ़, जौनपुर, बलिया, गाजीपुर और मऊ—ऐसे इलाके हैं जहां से रोजगार और शिक्षा के लिए बाहर जाने की कहानी लंबे समय से दिखाई देती है। जनगणना के D-03 आंकड़ों में उत्तर प्रदेश के जिलों के लिए प्रवासियों की संख्या और प्रवास के कारण दर्ज किए गए हैं।
सबसे बड़ा कारण रोजगार है। छोटे शहरों और ग्रामीण जिलों में पढ़े-लिखे युवाओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन उसी अनुपात में स्थानीय स्तर पर अच्छी और नियमित नौकरियां पैदा नहीं हुई हैं। सरकारी नौकरी के सीमित अवसरों के बीच निजी क्षेत्र की नौकरियां भी ज्यादातर बड़े शहरों या औद्योगिक केंद्रों में केंद्रित हैं। ऐसे में स्नातक की डिग्री लेने के बाद युवा के सामने दो रास्ते होते हैं—या तो वह अपने जिले में उपलब्ध सीमित रोजगार स्वीकार करे या फिर उस शहर की तरफ जाए जहां उसकी योग्यता के मुताबिक ज्यादा विकल्प हैं।
जनगणना का D-07 डेटा इस तस्वीर को और गहराई से समझने का मौका देता है। इसमें काम या रोजगार को पलायन का कारण बताने वाले लोगों को उम्र, लिंग और शैक्षणिक योग्यता के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। यानी आंकड़ों से यह देखा जा सकता है कि रोजगार के लिए जाने वाले प्रवासियों में युवा कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं और उनकी शिक्षा का स्तर क्या है।
दूसरा बड़ा कारण पढ़ाई है। छोटे जिलों में स्कूलों की संख्या भले ही बड़ी हो, लेकिन उच्च शिक्षा के विकल्प हर जगह समान नहीं हैं। इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट, कानून, रिसर्च और दूसरे प्रोफेशनल कोर्स के लिए छात्रों को अक्सर बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। प्रतियोगी परीक्षाओं ने इस प्रवृत्ति को और मजबूत किया है। एक छात्र पटना, प्रयागराज, दिल्ली या किसी दूसरे शिक्षा केंद्र में जाता है, कोचिंग करता है और फिर नौकरी मिलने पर उसी शहर या किसी दूसरे महानगर में बस जाता है।
इसका मतलब है कि शिक्षा के लिए शुरू हुआ पलायन रोजगार के पलायन में बदल सकता है। यही वजह है कि युवा प्रवासन को सिर्फ बेरोजगारी के आंकड़े से समझना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा, कौशल और नौकरी के अवसर तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं।
तीसरा कारण है आय में अंतर। किसी छोटे शहर में एक युवा को 10-15 हजार रुपये की नौकरी मिलती है, जबकि महानगर में उसी कौशल के लिए ज्यादा वेतन मिल सकता है। हालांकि महानगर में किराया, भोजन और यात्रा का खर्च भी ज्यादा होता है, लेकिन अगर बचत और भविष्य की संभावनाएं बेहतर हों तो युवा बाहर जाना पसंद करता है। यही आर्थिक अंतर लगातार लोगों को बड़े शहरों की तरफ खींचता है।
चौथा कारण है नेटवर्क इफेक्ट। जिस गांव या जिले से पहले कुछ लोग बाहर जाते हैं, उनके बाद दूसरे युवाओं के लिए बाहर जाना आसान हो जाता है। उन्हें रहने की जगह, नौकरी की जानकारी और शुरुआती मदद अपने ही परिचितों से मिल जाती है। यही वजह है कि कुछ जिलों और गांवों में किसी खास शहर की तरफ जाने की परंपरा बन जाती है। एक परिवार का सदस्य बाहर जाता है, फिर भाई, दोस्त और पड़ोसी भी उसी शहर का रुख करते हैं।
इस पलायन का असर सिर्फ उस युवा पर नहीं पड़ता जो शहर छोड़ रहा है। इसका असर उसके गांव और जिले पर भी होता है। बाहर जाने वाला युवा अक्सर अपने परिवार को पैसे भेजता है। इन पैसों से घर बनते हैं, बच्चों की पढ़ाई होती है, खेती में निवेश होता है और स्थानीय बाजार में पैसा आता है। इस लिहाज से पलायन कई परिवारों के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत भी बन जाता है।
लेकिन दूसरी तरफ गांव और छोटे शहर कामकाजी उम्र के लोगों को खोने लगते हैं। स्थानीय बाजार में युवाओं की संख्या घटती है। खेती में बुजुर्गों और महिलाओं की भूमिका बढ़ सकती है। कई गांवों में घर तो पक्के हो जाते हैं, लेकिन उनमें रहने वाले लोग कम हो जाते हैं। यानी पलायन आर्थिक स्थिति सुधार सकता है, लेकिन सामाजिक ढांचे को भी बदल देता है।
जिस शहर में युवा पहुंचता है, वहां तस्वीर उलटी होती है। महानगरों की आबादी बढ़ती है, किराये के मकानों की मांग बढ़ती है, ट्रांसपोर्ट पर दबाव आता है और रोजगार के साथ-साथ पानी, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सेवाओं की मांग बढ़ती है। इसलिए दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, सूरत जैसे शहरों की बढ़ती आबादी को समझने के लिए उन जिलों को भी समझना जरूरी है जहां से लोग लगातार निकल रहे हैं।
यहां एक और बदलाव दिखाई देता है, अब पलायन हमेशा स्थायी नहीं होता। कुछ युवा कुछ महीनों के लिए दूसरे शहर जाते हैं और फिर वापस लौटते हैं। कुछ लोग काम के लिए बाहर रहते हैं लेकिन परिवार गांव में ही रहता है। कुछ लोग पहले नौकरी के लिए जाते हैं और बाद में परिवार को भी शहर ले जाते हैं। इसलिए आधुनिक माइग्रेशन को सिर्फ 'गांव छोड़कर शहर में बसना' कहना भी पूरी तस्वीर नहीं है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि क्या छोटे शहरों में ऐसे रोजगार और शिक्षा के अवसर पैदा किए जा सकते हैं कि युवाओं को मजबूरी में बाहर न जाना पड़े। इसका मतलब यह नहीं कि पलायन को रोकना जरूरी है। अगर कोई युवा बेहतर अवसर के लिए दूसरे शहर जाना चाहता है तो यह आर्थिक गतिशीलता का हिस्सा है। समस्या तब है जब युवा इसलिए जा रहा हो क्योंकि उसके अपने जिले में उसकी योग्यता के मुताबिक कोई विकल्प ही नहीं है।
इसलिए आने वाले वर्षों में छोटे शहरों की अर्थव्यवस्था के लिए तीन चीजें बेहद महत्वपूर्ण होंगी। स्थानीय रोजगार, अच्छी उच्च शिक्षा और कौशल आधारित उद्योग। अगर जिलों में छोटे और मध्यम उद्योग, सर्विस सेक्टर, डिजिटल रोजगार, बेहतर कॉलेज और स्थानीय उद्यमिता के अवसर बढ़ते हैं तो युवाओं के पास बाहर जाने के अलावा अपने शहर में भी विकल्प होंगे।
आखिर में इस कहानी को सिर्फ 'युवा शहर छोड़ रहे हैं' के रूप में देखना अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि युवा किस चीज की तलाश में जा रहा है और उसके अपने जिले में वह चीज क्यों उपलब्ध नहीं है। जनगणना के आंकड़े रोजगार, शिक्षा और दूसरे कारणों को अलग-अलग पहचानने का आधार देते हैं, लेकिन 2011 की जनगणना के बाद जिलेवार तस्वीर में बदलाव आया हो सकता है। इसलिए आज की ग्राउंड रिपोर्ट में इन आंकड़ों को स्थानीय रोजगार, शिक्षा, उद्योग और हालिया सरकारी/सर्वे डेटा के साथ मिलाकर देखना ज्यादा जरूरी है।
Updated on:
23 Aug 2026 10:21 pm
Published on:
23 Aug 2026 10:21 pm
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