
आज जब मौसम के चरम रूप और पारिस्थितिक असंतुलन हमारे जीवन को प्रभावित कर रहे हैं, तब पुरानी या नियंत्रित मानी जाने वाली बीमारियां फिर से उभर रही हैं। आइए, इस असामान्य संबंध को समझने, उसके कारणों को जानने और समाधान के बारे में जानते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, जलवायु परिवर्तन संक्रामक बीमारियों के प्रसार को नए क्षेत्रों में ले जा रहा है, जिससे लाखों लोग नए जोखिमों के संपर्क में आ रहे हैं। लगभग 60% ज्ञात संक्रामक रोगों पर जलवायु जोखिमों का असर होता है - जैसे तापमान बढ़ना, वर्षा का पैटर्न बदलना, बाढ़ या सूखा जो रोगजनकों और वाहकों (vectors) के व्यवहार को बदलते हैं।
भारत में भी हालिया समीक्षा बताती है कि बढ़ते तापमान, असामान्य वर्षा, बाढ़ और सूखे जैसे जलवायु कारक, रोगवाहकों की पारिस्थितिकी को बदल रहे हैं। इससे मानव, पशु और पर्यावरण के बीच संपर्क बढ़ रहा है, जिससे बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ता है।
भारत में मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, काला-जार जैसी बीमारियां पहले नियंत्रित थीं, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के कारण फिर तेजी से उभरती दिख रही हैं। उदाहरण के लिए, एक अध्ययन में पाया गया कि पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में मलेरिया का प्रसारण 2–3 महीने तक बढ़ सकता है, जबकि ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में यह घट सकता है।
इसके अलावा, बिहार में काला-जार (Visceral leishmaniasis) पर एक मशीन लर्निंग आधारित अध्ययन ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का विश्लेषण किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जलवायु मॉडलिंग से भविष्य में बीमारी के प्रकोप की भविष्यवाणी संभव हो सकती है।
WHO की रिपोर्ट बताती है कि 75% से अधिक उभरती संक्रामक बीमारियां जूनोटिक होती हैं - अर्थात् जानवरों से इंसानों में फैलने वाली और ये अक्सर तब होती हैं जब प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र टूटता है, जैसे वनों की कटाई या भूमि उपयोग में बदलाव से।
भारत में निपाह वायरस (Nipah virus) के हालिया प्रकोपों ने यह दिखाया है कि जलवायु परिवर्तन और मानव-वन्यजीव संपर्क में वृद्धि ने वायरस के फैलने की संभावना बढ़ा दी है।
2001 और 2007 में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी और नादिया में, और फिर 2018 में केरल में निपाह वायरस के प्रकोप हुए। जनवरी 2026 में पश्चिम बंगाल में दो नए मामले सामने आए हैं, जो इस वायरस की बढ़ती स्थानीय उपस्थिति को दर्शाते हैं।
भारत में राष्ट्रीय स्तर पर कुछ संस्थागत प्रयास मौजूद हैं - जैसे National Programme on Climate Change and Human Health, IDSP/IHIP, National One Health Mission, VRDL नेटवर्क और फील्ड एपिडेमियोलॉजी ट्रेनिंग सिस्टम। लेकिन ये प्लेटफॉर्म अभी पूरी तरह से एक-दूसरे से जुड़े नहीं हैं, जिससे जलवायु-सूचित निगरानी और प्रतिक्रिया में कमी रहती है।
WHO ने यह भी कहा है कि पिछले 70 वर्षों में संक्रामक रोगों पर नियंत्रण की जो उपलब्धियां मिली थीं, वे अब खतरे में हैं। जलवायु परिवर्तन के चलते पहले नियंत्रित बीमारियां फिर से उभर रही हैं और नए क्षेत्रों में फैल रही हैं। इसलिए मौजूदा निगरानी और हस्तक्षेप रणनीतियों को फिर से देखना और सुधारना आवश्यक है।
यह समस्या केवल वैज्ञानिकों या नीति-निर्माताओं की नहीं है - यह आम परिवार, किसान, स्कूल, समाज और बुजुर्गों के लिए भी सीधा असर रखती है। जैसे:
जलवायु परिवर्तन और पुरानी बीमारियों का यह असामान्य संबंध हमें यह बताता है कि स्वास्थ्य अब केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं है - यह मौसम, पर्यावरण और समाज से जुड़ा हुआ है। हमें अब एक नए दृष्टिकोण से तैयारी करनी होगी, जिसमें विज्ञान, नीति, समुदाय और पारिस्थितिकी सभी साथ हों। तभी हम पुरानी बीमारियों को फिर से नियंत्रित कर पाएंगे और भविष्य के जोखिमों से बच सकेंगे।