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अरावली हिल्स मामला: 100 मीटर ऊंचाई तय करेगी पहाड़ों का भविष्य? हितधारकों के 680 सुझावों पर मंथन तेज

अरावली हिल्स की परिभाषा तय करने के लिए उच्च स्तरीय समिति बनाई गई है। यह समिति हितधारकों से मिले सुझाव के आधार पर मंथन कर रही है। अरावली की परिभाषा तय करने के लिए पूरे पारिस्थितिक भू-दृश्य पर पर चर्चा हो रही है।
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Sep 07, 2026
Aravalli Hills definition
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)

अरावली हिल्स की की पहचान अब सिर्फ पहाड़ की ऊंचाई नापकर नहीं होगी। 100 मीटर की ऊंचाई और दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के फासले से शुरू हुआ विवाद अब काफी आगे तक पहुंच चुका है। अरावली हिल्स की परिभाषा पर बनी उच्च स्तरीय समिति अरावली को टुकड़ों में नहीं, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिक भू-दृश्य के रूप में देखने पर मंथन कर रही है।

अरावली के लिए 680 सुझावों पर मंथन

अरावली हिल्स की परिभाषा मामले पर बनी उच्चाधिकार प्राप्त समिति कई मुद्दों पर मंथन कर रही है। अब पहाड़ियों के साथ-साथ जंगल, भूजल पुनर्भरण क्षेत्र, जलग्रहण तंत्र, जैव-विविधता, वन्य जीव गलियारे, खनन का अर्थशास्त्र, शहरीकरण और स्थानीय आजीविका को भी एक साथ परखा जा रहा है। समिति का मानना है कि GIS मैप, भूजल स्तर के आंकड़ों और राज्यों के राजस्व रेकॉर्ड के क्रॉस-वेरिफिकेशन के साथ-साथ हित धारकों से मिले करीब 680 सुझावों की कसौटी के बिना अरावली को परिभाषित करना जल्दबाजी होगी।

100 मीटर की कसौटी पर सवाल क्यों?

यह विवाद 2025 में शुरू हुआ था, जब केंद्र सरकार से जुड़ी एक प्रक्रिया के तहत 100 मीटर स्थानीय ऊंचाई और 500 मीटर की दूरी वाले ढांचे को अरावली मानने का प्रस्ताव आया। 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार भी कर लिया, लेकिन पर्यावरणीय चेतावनियों के बाद 29 दिसंबर, 2025 को अदालत ने अपने ही आदेश पर रोक लगा दी। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या यह कठोर कसौटी उन छोटी पहाड़ियों को संरक्षण से बाहर कर देगी, जो वास्तव में इसी इको-सिस्टम का हिस्सा हैं।

पहचान पर संकट?

उदयपुर के पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. अनिल मेहता का कहना है कि भू-आकृति की पहचान केवल ऊंचाई से नहीं, बल्कि संरचना, स्थलाकृति और क्षरण की प्रकृति से भी जुड़ी होती है। लाखों वर्षों के क्षरण से अरावली के कई हिस्से कम ऊंचाई के हो गए हैं। ऐसे में केवल ऊंचाई को आधार बनाना इसकी ऐतिहासिक पहचान मिटाने जैसा होगा।

राजस्व रिकॉर्ड का गड़बड़झाला

अरावली मामले की एक परत यह भी है कि जंगल होने और राजस्व रिकॉर्ड में वन भूमि दर्ज होने में बड़ा अंतर है। सरिस्का अभयारण्य से जुड़े NGT मामले में सामने आया कि कुल 1,12,683.45 हेक्टेयर वन भूमि में से 57,847.54 हेक्टेयर का ही राजस्व अभिलेखों में नामांतरण हुआ, जबकि 54,835.91 हेक्टेयर लंबित था। विशेषज्ञों का कहना है कि नई परिभाषा में पहाड़ी की ऊंचाई-दूरी के साथ भूमि का वास्तविक स्वरूप, कानूनी वन दर्जा और राजस्व अभिलेख भी अहम होंगे।

मैदानी दौरा और सवाल

6 से 11 अगस्त के बीच समिति ने दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के 9 जिलों का दौरा किया। इसके साथ ही गुरुग्राम, अलवर, अजमेर व उदयपुर में जन-सुनवाई की। हालांकि, कुछ पर्यावरणविदों ने आरोप लगाया कि सीकर, कोटपूतली, भीलवाड़ा और हरियाणा-गुजरात के उन गांवों का दौरा नहीं हुआ, जो सिलिकोसिस, जल प्रदूषण और क्रशरों की धूल से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। डॉ. रवि चोपड़ा और डॉ. सी.पी. राजेंद्रन जैसे वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने अरावली मामले पर बनी समिति से अपील की है कि वह पश्चिमी घाट की 'गाडगिल समिति' की तर्ज पर जल्दबाजी न करते हुए व्यापक अध्ययन के लिए और समय ले। इसके बाद समिति ने 6 महीने का विस्तार मांगा है।

अंतिम रिपोर्ट से उम्मीदें

  1. 100 मीटर अकेला पैमाना नहीं, बहु-आयामी वैज्ञानिक कसौटी होगी।
  2. 500 मीटर की दूरी के साथ पारिस्थितिक व जलवैज्ञानिक निरंतरता को महत्त्व मिलेगा।
  3. उपग्रह चित्रों और GIS आधारित विस्तृत डिजिटल मानचित्र बनेंगे।
  4. जलग्रहण व भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों के लिए विशेष संरक्षण व्यवस्था होगी।
  5. जैव-विविधता व वन्यजीव गलियारों के संवेदनशील क्षेत्र चिह्नित होंगे।
  6. खनन के लिए क्षेत्रवार वैज्ञानिक वहन क्षमता तय होगी।
  7. शहरीकरण के लिए संवेदनशील क्षेत्र अलग से चिह्नित होंगे।
  8. सामुदायिक वन क्षेत्र सिर्फ क्षेत्रफल या पेड़ों की संख्या के आधार पर संरक्षण से बाहर नहीं होंगे।
  9. राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली व गुजरात में सीमाओं का वैज्ञानिक मिलान होगा।
  10. रियल एस्टेट विस्तार पर कड़ी नियमन रेखा खींची जाएगी।
Updated on:
07 Sept 2026 04:55 pm
Published on:
07 Sept 2026 04:55 pm