
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, यानी CAA के तहत नागरिकता देने की प्रक्रिया को आसान और तेज बनाने के लिए एक बड़ा प्रशासनिक बदलाव किया है। गृह मंत्रालय ने 19 अगस्त 2026 को नागरिकता नियम (तीसरा संशोधन), 2026 अधिसूचित किए हैं। इसके तहत गुजरात, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा (आदिवासी क्षेत्रों को छोड़कर) और साथ ही केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर व लद्दाख के जिलाधिकारियों को इन इलाकों में सामान्य रूप से रहने वाले पात्र और उपयुक्त आवेदकों को नागरिकता देने का अधिकार दिया गया है।
अधिसूचना में कहा गया है कि जिलाधिकारी आवेदन के साथ जमा दस्तावेजों की जांच करेंगे, आवेदक की उपयुक्तता जांचने के लिए जरूरी पूछताछ करेंगे। कानून की दूसरी अनुसूची में तय निष्ठा की शपथ दिलाएंगे और नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6बी के तहत आवेदक की पात्रता को लेकर खुद संतुष्ट होंगे। अगर जिलाधिकारी को भरोसा हो जाता है कि आवेदक पंजीकरण या प्राकृतिकरण (Naturalization) के लिए सही और उपयुक्त व्यक्ति है तो वे सीधे भारत की नागरिकता दे सकेंगे। इस नई व्यवस्था में जिलाधिकारी उन 'अधिकार-प्राप्त समितियों' और 'नामित अधिकारियों' की जगह लेंगे, जिनके पास अब तक यह अधिकार था। सरकार ने इससे जुड़े पहले के आदेश भी निरस्त कर दिए हैं। हालांकि इसका असर निरस्तीकरण से पहले हो चुके या लंबित कामों पर नहीं पड़ेगा।
साल 2024 में जब CAA के नियम पहली बार लागू हुए थे, तब धारा 6बी के तहत आवेदनों की जांच के लिए जिला स्तर पर एक समिति बनाई गई थी। इस समिति की अध्यक्षता डाक विभाग के अधीक्षक करते थे और जिला कलेक्टर कार्यालय का एक प्रतिनिधि उसमें आमंत्रित सदस्य के तौर पर शामिल होता था। दस्तावेजों की जांच के बाद अंतिम फैसला केंद्र स्तर की एक सशक्त समिति के जरिए होता था, जिसमें आसूचना ब्यूरो, राज्य गृह विभाग और अन्य विभागों के अधिकारी शामिल रहते थे।
नई व्यवस्था में यह पूरी बहु-स्तरीय प्रक्रिया खत्म कर दी गई है। अब इससे संबंधित जिलाधिकारी ही सीधे आवेदन प्राप्त करने से लेकर पात्रता तय करने और नागरिकता देने तक का पूरा काम कर सकेंगे। समितियों के पास पहले से लंबित आवेदन भी अब संबंधित जिलाधिकारियों को स्थानांतरित किए जाएंगे, जिससे इनके जल्द निपटारे का रास्ता खुलेगा।
जिला स्तर पर नागरिकता देने का यह अधिकार पहली बार नहीं दिया गया है। इससे पहले भी केंद्र सरकार 9 राज्यों के गृह सचिवों और 31 जिलाधिकारियों को अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को नागरिकता देने की शक्ति पहले ही सौंप चुकी है। हालांकि, यह पुराना अधिकार नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5 (पंजीकरण) और धारा 6 (प्राकृतिकरण) से जुड़े सामान्य प्रावधानों के तहत था, जबकि नई व्यवस्था खासतौर पर CAA 2019 के तहत जोड़ी गई धारा 6बी के आवेदनों के लिए है।
गृह मंत्रालय की 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, इस पुरानी व्यवस्था के जरिए अब तक करीब 1,414 लोगों को नागरिकता दी जा चुकी है। नई अधिसूचना में इन पुराने अधिकारों को खत्म किए जाने की कोई बात नहीं कही गई है, यानी दोनों व्यवस्थाएं साथ-साथ चल सकती हैं।
CAA के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोग आवेदन कर सकते हैं, जो 31 दिसंबर 2014 तक भारत में प्रवेश कर चुके थे। यही कानून में तय भारत में प्रवेश की कटऑफ तारीख है। आवेदकों को कानून में तय बाकी शर्तें भी पूरी करनी होंगी, जैसे- भारत में सामान्य रूप से निवास करना। नए नियमों में आवेदकों की व्यक्तिगत उपस्थिति को लेकर भी सख्ती बरती गई है। अगर पर्याप्त मौका दिए जाने के बावजूद कोई आवेदक आवेदन पर दस्तखत करने और शपथ लेने खुद हाजिर नहीं होता, तो कलेक्टर उसका आवेदन खारिज कर सकता है।
यह बदलाव केंद्र सरकार की CAA क्रियान्वयन को तेज करने की व्यापक कोशिश का हिस्सा है, जिसे मार्च 2024 में लागू किए जाने के बाद से लगातार विस्तार दिया जा रहा है। इससे पहले भी उत्तर व दक्षिण गोवा जैसे कुछ जिलों के कलेक्टरों को अलग-अलग समय पर नागरिकता से जुड़ी शक्तियां सौंपी जा चुकी हैं। हालांकि, CAA अपनी शुरुआत से ही राजनीतिक रूप से विवादित रहा है।
विपक्षी दलों और कुछ नागरिक समाज संगठनों ने इसे धर्म के आधार पर नागरिकता तय करने वाला भेदभावपूर्ण कानून बताते हुए इसका विरोध किया है। हालांकि, सरकार का कहना है कि यह पड़ोसी देशों में धार्मिक उत्पीड़न झेल चुके अल्पसंख्यकों को राहत देने के लिए जरूरी था। नया प्रशासनिक बदलाव खुद कानून के दायरे में फेरबदल नहीं करता, बल्कि पहले से पात्र माने गए आवेदकों के लिए मंजूरी की प्रक्रिया को छोटा और तेज करता है।