
सांकेतिक इमेज (सोर्स-Chatgpt)
रक्षा और वाणिज्यिक जहाजों के निर्माण में हजारों करोड़ रुपये के निवेश के साथ भारत खुद को दुनिया के अगले बड़े शिपबिल्डिंग और शिपिंग हब के रूप में स्थापित करने की कोशिश में जुटा है। कोलकाता से लेकर गुजरात, आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु तक, देशभर में नए शिपयार्ड, विस्तार परियोजनाएं और नीतिगत सुधार एक साथ आगे बढ़ रहे हैं, जिनकी बुनियाद केंद्र सरकार के मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047 में रखी गई है।
रविवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कोलकाता से गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) और यंत्र इंडिया लिमिटेड की पांच नई विस्तार परियोजनाओं की आधारशिला रखी। इस मौके पर रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत वैश्विक जहाज निर्माण केंद्र बनने में पूरी तरह सक्षम है। GRSE ने हुगली नदी के दोनों किनारों पर दो नए शिपयार्ड के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट, कोलकाता के साथ 30 साल का लीज समझौता किया है। इसके साथ ही रायचक में नदी किनारे करीब 32 एकड़ जमीन भी ली गई है। इन परियोजनाओं से युद्धपोतों के निर्माण और मरम्मत, दोनों की क्षमता बढ़ेगी।
यह घोषणा उस व्यापक राष्ट्रीय अभियान की अगली कड़ी है, जिसकी नींव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जून 2026 में खुद कोलकाता से रखी थी। उन्होंने नौसेना के 3 नए स्वदेशी जहाजों को हरी झंडी दिखाते हुए शिपबिल्डिंग और शिप-रिपेयर सेक्टर को राष्ट्रीय मिशन का दर्जा देने का ऐलान किया था। मोदी ने कहा था कि इस सेक्टर के लिए दिया गया करीब 70,000 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन पैकेज हजारों MSMEs में रोजगार पैदा करने के साथ-साथ देश के सुरक्षित समुद्री भविष्य में एक बड़ा निवेश भी है।
केंद्रीय कैबिनेट ने मझगांव डॉक, GRSE और शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SCI) जैसी कंपनियों के लिए करीब 70,000 करोड़ रुपये के पैकेज को मंजूरी दी थी। इसमें शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस पॉलिसी (SBFAP) के लिए अलग से 24,736 करोड़ रुपये रखे गए हैं, ताकि भारतीय शिपयार्ड की 25 से 35 प्रतिशत तक ज्यादा लागत की समस्या कम की जा सके। सरकार का अनुमान है कि इससे 2030 तक करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश आकर्षित होगा और एक अलग नेशनल शिपबिल्डिंग मिशन भी गठित किया जाएगा।
भारत ने मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047 के तहत देशभर में बड़े शिपबिल्डिंग क्लस्टर खड़े करने के लिए करीब 3 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजना बनाई है। इसमें से करीब 2.18 अरब डॉलर एक विशेष शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम के लिए रखे गए हैं, जो नई (ग्रीनफील्ड) और पुरानी (ब्राउनफील्ड) शिपयार्ड साइटों को सहारा देगी, जबकि करीब 2.73 अरब डॉलर मेरिटाइम डेवलपमेंट फंड के लिए तय किए गए हैं। इसी कोष से एक इंडिया शिप टेक्नोलॉजी सेंटर भी स्थापित किया जाना है।
यह महत्वाकांक्षा सिर्फ केंद्र सरकार तक सीमित नहीं है। गुजरात सरकार ने हाल ही में नई शिप बिल्डिंग एंड रिपेयर पॉलिसी लॉन्च की है, जिसके तहत पोरबंदर के कुछड़ी में मेगा ग्रीनफील्ड शिपबिल्डिंग क्लस्टर को मंजूरी मिली है, जहां 2-3 विश्वस्तरीय शिपयार्ड बनेंगे और करीब 23,700 करोड़ रुपये का निजी निवेश आने की उम्मीद है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, टाटा ग्रुप केरल में करीब 10,000 करोड़ रुपये के निवेश से वाणिज्यिक जहाज निर्माण क्षेत्र में उतरने की तैयारी में है, जबकि आंध्र प्रदेश विशाखापत्तनम में मझगांव डॉक के साथ मिलकर 30,000 करोड़ रुपये की परियोजना पर काम कर रहा है। दक्षिण कोरिया की एचडी हुंडई तमिलनाडु के तूतीकोरिन में 38,000 करोड़ रुपये के शिपबिल्डिंग हब की योजना बना चुकी है। पश्चिम बंगाल में भी 19,209 करोड़ रुपये के निवेश से कोलकाता और हल्दिया को पूर्वी भारत के प्रमुख समुद्री प्रवेश द्वार के रूप में विकसित करने की योजना है।
सरकार ने इस महत्वाकांक्षा को कानूनी आधार देने के लिए संसद के मानसून सत्र 2025 में 5 बड़े विधेयक पारित कराए। जिनमें मर्चेंट शिपिंग एक्ट, भारतीय पत्तन अधिनियम, तटीय पोत-परिवहन अधिनियम, समुद्री माल ढुलाई अधिनियम और लदान बिल अधिनियम शामिल हैं। ये सभी कानून औपनिवेशिक काल के पुराने प्रावधानों की जगह लेते हैं और अंतरराष्ट्रीय संधियों के अनुरूप बनाए गए हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इनका मकसद व्यापार को आसान बनाना, भारतीय नाविकों के कौशल विकास को बढ़ावा देना और देश को वैश्विक समुद्री शक्ति के तौर पर स्थापित करना है। इसके अलावा वित्त मंत्रालय ने बड़े जहाजों को 'इंफ्रास्ट्रक्चर' का दर्जा दिया है, ताकि घरेलू शिपबिल्डिंग को सस्ता वित्तपोषण मिल सके।
भारत की चुनौतियां छोटी नहीं हैं। भारत अभी भी अपने कुल व्यापार का 98 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा विदेशी झंडे वाले जहाजों के जरिए ढोता है, जिसके एवज में हर साल करीब 90 अरब डॉलर विदेश जाते हैं। 2024 में दुनिया में बने नए जहाजों के 95 प्रतिशत ऑर्डर सिर्फ चीन, दक्षिण कोरिया और जापान के पास थे, जबकि वैश्विक शिपबिल्डिंग में भारत की हिस्सेदारी अभी मुश्किल से 1 प्रतिशत है। सरकार का लक्ष्य भारतीय झंडे वाले जहाजों की वैश्विक हिस्सेदारी मौजूदा करीब 7 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 से 40 प्रतिशत तक ले जाना है।
वित्त वर्ष 2026 में भारत की कुल शिपिंग क्षमता 142 मिलियन ग्रॉस टन तक पहुंच चुकी है, जिसमें 92 नए जहाज जुड़े हैं। इसे हाल के वर्षों की सबसे तेज बढ़त माना जा रहा है। अक्टूबर 2025 में मुंबई में हुए इंडिया मैरीटाइम वीक में भी करीब 12 लाख करोड़ रुपये के निवेश समझौतों पर हस्ताक्षर हुए थे।
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल का हर जहाज अब भारतीय शिपयार्ड में ही बन रहा है, जो आत्मनिर्भर भारत अभियान की मजबूती दर्शाता है। अगर सरकार अपनी योजनाओं को समय पर अमल में लाने में सफल रहती है, तो 2047 तक भारत दुनिया के शीर्ष 5 शिपबिल्डिंग देशों में शामिल हो सकता है।
Updated on:
23 Aug 2026 09:10 pm
Published on:
23 Aug 2026 09:10 pm
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