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कीबोर्ड पर ABCD की जगह QWERTY क्यों? जानिए टाइपराइटर से स्मार्टफोन तक 150 साल पुराना दिलचस्प इतिहास

कीबोर्ड पर ABCD की जगह QWERTY लेआउट क्यों होता है? जानिए 150 साल पुराने टाइपराइटर के जाम होने से जुड़े इस दिलचस्प इतिहास और इसके पीछे के असली कारण को।
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भारत

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Chitra Badoliya

Aug 23, 2026

keyboard

कीबोर्ड का बड़ा सीक्रेट (AI)

स्मार्टफोन पर चैटिंग हो या लैपटॉप पर ऑफिस का काम, हमारी उंगलियां बिना देखे कीबोर्ड पर तेजी से चलने लगती हैं। ऊपर की सबसे पहली लाइन में बाईं तरफ नजर डालें तो छह अक्षर दिखते हैं Q-W-E-R-T-Y। कभी सोचा है कि जब बचपन में हमें भाषा की शुरुआत 'A, B, C, D' से सिखाई जाती है, तो कीबोर्ड पर अक्षर इतने बिखरे हुए और बेतरतीब क्यों होते हैं?

यह कोई इत्तेफाक या कंप्यूटर युग का मॉडर्न डिजाइन नहीं है। कीबोर्ड के इस लेआउट की कहानी लगभग 150 साल पुरानी है, जो मैकेनिकल इंजीनियरिंग की एक बड़ी मजबूरी, व्यावसायिक सौदे और इंसानी आदत से जुड़ी हुई है।

शुरुआत में कीबोर्ड वर्णमाला क्रम में ही था

1860 के दशक के उत्तरार्ध में अमेरिका के मिल्वौकी शहर में एक अखबार के संपादक और प्रिंटर क्रिस्टोफर लैथम शोल्स (Christopher Latham Sholes) अपने साथियों कार्लोस ग्लिडन और सैमुअल डब्ल्यू. सोल के साथ मिलकर लिखने की एक मशीन बना रहे थे।

1868 में शोल्स ने पहले व्यावहारिक टाइपराइटर का पेटेंट कराया। उस शुरुआती मॉडल में कुंजियों (Keys) को पियानो के बटनों की तरह दो पंक्तियों में सजाया गया था और अक्षर वर्णमाला यानी A, B, C, D… के सीधे क्रम में ही व्यवस्थित थे। उस समय तक किसी को अंदाजा नहीं था कि यह सीधा-सादा क्रम टाइपिंग के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट बनने वाला है।

टाइपबार्स का टकराना: मैकेनिकल जाम की समस्या

19वीं सदी के टाइपराइटर पूरी तरह से मैकेनिकल थे। उनके काम करने का तरीका कुछ ऐसा था:

हर बटन के पीछे धातु की एक पतली छड़ (Typebar) लगी होती थी।

  • इस छड़ के सिरे पर उभरा हुआ धातु का अक्षर बना होता था।
  • जब टाइपिस्ट किसी बटन को दबाता, तो वह छड़ तेजी से ऊपर उठकर एक स्याही लगे रिबन से टकराती थी और कागज पर अक्षर छप जाता था।
  • इसके तुरंत बाद छड़ स्प्रिंग और गुरुत्वाकर्षण के सहारे अपनी पुरानी जगह पर नीचे लौटती थी।
  • दिक्कत तब शुरू हुई जब लोगों ने तेज गति से टाइप करना शुरू किया। अंग्रेजी भाषा में कुछ अक्षरों के जोड़े (Letter Combinations) बहुत आम हैं जैसे TH, ER, IN, ST, RE, ON, HE।
  • जब कीबोर्ड A-B-C-D के क्रम में था, तो ये आम अक्षर एक-दूसरे के बेहद करीब लगे हुए थे। जैसे ही टाइपिस्ट तेजी से 'TH' या 'ST' दबाते, पहली छड़ नीचे आने से पहले ही दूसरी छड़ ऊपर उठ जाती। दोनों धातु की छड़ें बीच में ही आपस में उलझ जाती थीं और मशीन 'जाम' हो जाती थी। टाइपिस्ट को बार-बार हाथ से तारों को सीधा करना पड़ता था, जिससे स्याही हाथ में लगती और काम रुक जाता था।

QWERTY का आविष्कार: एक सोचा-समझा इंजीनियरिंग समाधान

इस तकनीकी खामी को दूर करने के लिए शोल्स ने एक गणितीय और भाषाई अध्ययन किया। उन्होंने अमेरिकी शिक्षक अमोस डेन्समोर की मदद से अंग्रेजी भाषा में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले अक्षरों और उनके संयोजनों (Digraphs) का विश्लेषण किया।

शोल्स का मुख्य उद्देश्य था: अक्सर साथ आने वाले अक्षरों की टाइपबार्स को मशीन के अंदर एक-दूसरे से दूर रखना।

1870 के दशक की शुरुआत में शोल्स ने कई प्रयोग किए और धीरे-धीरे अक्षरों की जगह बदली:

  • जो अक्षर बार-बार एक साथ आते थे, उनके बटनों को कीबोर्ड पर अलग-अलग कोनों में रखा गया ताकि उनकी मैकेनिकल छड़ें अलग-अलग दिशाओं से आएं और आपस में न टकराएं।
  • टाइपिस्ट के दोनों हाथों का इस्तेमाल संतुलित रहे, इसलिए स्वर (Vowels) और प्रमुख व्यंजनों को दोनों हाथों के बीच बांट दिया गया।
  • 1873 तक यह लेआउट अंतिम रूप ले चुका था, जिसे आज हम पहली छह कुंजियों के नाम पर QWERTY कहते हैं।
  • एक लोकप्रिय मिथक: कई लोग मानते हैं कि QWERTY लेआउट का आविष्कार टाइपिंग की गति को "धीमा" करने के लिए किया गया था। यह पूरी तरह सही नहीं है। इसका मकसद टाइपिस्ट को धीमा करना नहीं, बल्कि मशीन को जाम होने से बचाकर टाइपिंग के प्रवाह को निरंतर बनाए रखना था।

'TYPEWRITER' शब्द और सेल्स ट्रिक की कहानी

1873 में शोल्स और उनके साझेदारों ने इस डिजाइन को बंदूक और सिलाई मशीन बनाने वाली मशहूर अमेरिकी कंपनी ई. रेमिंगटन एंड संस (E. Remington and Sons) को बेच दिया।

रेमिंगटन ने इसमें कुछ छोटे बदलाव किए और 1874 में 'Shols and Glidden Type-Writer' नाम से पहला कमर्शियल टाइपराइटर बाजार में उतारा।

कहा जाता है कि रेमिंगटन के सेल्स एजेंट्स के कहने पर QWERTY कीबोर्ड की सबसे ऊपरी पंक्ति (Top Row) में कुछ अक्षरों को इस तरह सेट किया गया था कि सेल्समैन ग्राहकों के सामने डेमो देते समय केवल ऊपरी पंक्ति की कुंजियों का इस्तेमाल करके तेजी से "TYPEWRITER" शब्द टाइप करके दिखा सकें। अगर आप आज भी अपने कीबोर्ड की पहली लाइन देखें, तो उसमें T-Y-P-E-W-R-I-T-E-R के सारे अक्षर मौजूद हैं।

दूसरे लेआउट क्यों नहीं टिक पाए?

QWERTY अकेला लेआउट नहीं था। जैसे-जैसे तकनीक बदली, कई वैज्ञानिकों और डिजाइनरों ने अधिक तार्किक और तेज लेआउट बनाए:

  • Dvorak Simplified Keyboard (1936): प्रोफेसर अगस्त ड्वोरक ने इसे इंसानी उंगलियों की प्राकृतिक गति और ऊर्जा को ध्यान में रखकर बनाया। इसमें सभी स्वर (A, O, E, U, I) और मुख्य व्यंजन होम-रो (बीच वाली लाइन) में होते हैं, जिससे उंगलियों की गति लगभग 60% कम हो जाती है।
  • Colemak (2006): यह आधुनिक डिजिटल युग का लेआउट है, जो QWERTY से बहुत मिलता-जुलता है लेकिन टाइपिंग को अधिक एर्गोनोमिक बनाता है।
  • तमाम अध्ययनों में यह साबित हुआ कि Dvorak लेआउट पर टाइप करना आसान और तेज है, फिर भी यह QWERTY को हटा नहीं सका।

QWERTY की जीत: पाथ डिपेंडेंसी का सबसे बड़ा उदाहरण

  • कंप्यूटर, लैपटॉप और टचस्क्रीन स्मार्टफोन आने के बाद मैकेनिकल टाइपबार्स का दौर खत्म हो चुका था। आज कोई भी सॉफ्टवेयर कोड बदलकर कीबोर्ड को किसी भी क्रम में रख सकता है। फिर भी पूरी दुनिया आज भी QWERTY पर ही क्यों टिकी है?
  • अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र में इसे 'Path Dependency' (पथ निर्भरता) और 'Network Effect' कहा जाता है।
  • टाइपिस्टों का विशाल नेटवर्क: 1880 और 1890 के दशक में जब टाइपिंग सिखाने वाले स्कूल और कमर्शियल ऑफिस खुले, तो वहां रेमिंगटन के QWERTY टाइपराइटरों पर लाखों लोगों को ट्रेनिंग दी गई।
  • कंपनियों की मजबूरी: ऑफिस मालिकों को वही टाइपिस्ट मिलते थे जो QWERTY जानते थे, इसलिए वे वही मशीनें खरीदते थे। नई मशीनों के निर्माताओं को भी मजबूरी में QWERTY लेआउट ही अपनाना पड़ा।
  • मसल मेमोरी (Muscle Memory): जब पीढ़ियों की उंगलियों को एक खास क्रम की आदत पड़ गई, तो पूरी दुनिया के कामकाजी ढांचे को नए सिरे से री-ट्रेन करने की लागत किसी भी नए लेआउट के फायदों से कहीं ज्यादा भारी थी।

टापराइटर से टचस्क्रीन तक का सफर

1870 के दशक में लोहे के तारों को उलझने से बचाने के लिए बनाया गया एक मैकेनिकल जुगाड़ आज 21वीं सदी के डिजिटल दौर में स्मार्टफोन, टैबलेट और वर्चुअल रियलिटी (VR) हेडसेट्स का वैश्विक मानक बन चुका है।

हर बार जब आप अपने फोन पर कोई टेक्स्ट मैसेज भेजते हैं या लैपटॉप पर कोई दस्तावेज तैयार करते हैं, तो जाने-अनजाने आप 150 साल पुरानी 19वीं सदी की एक मैकेनिकल मजबूरी का इस्तेमाल कर रहे होते हैं।