
global labour exploitation: चीनी की मिठास के पीछे महाराष्ट्र के बीड की जिन महिला गन्ना मजदूरों की कहानी सामने आती रही है, वह सिर्फ एक जिले या एक उद्योग की समस्या नहीं है। मजदूरों के शोषण की कहानियां अलग-अलग रूप में दुनिया भर के देशों से सामने आती रही हैं। हां लेकिन भारत के बीड जैसा मजदूरी जारी रखने के लिए हिस्टेरेक्टॉमी वाला पैटर्न दुनिया में आम नहीं है। दूसरे देशों में मजदूरों का शोषण दूसरे रूपों में सामने आता है। कर्ज के बदले काम, वेतन रोकना, जबरन ओवरटाइम, दस्तावेज जब्त करना, धमकी, असुरक्षित आवास और मातृत्व या स्वास्थ्य अधिकारों से वंचित करना। कहानी एक जैसी नहीं, लेकिन मूल सवाल एक ही है, क्या गरीब मजदूर के पास अपने शरीर और अपने श्रम को लेकर वास्तव में स्वतंत्र चुनाव होता है?
बीड से हर साल बड़ी संख्या में परिवार गन्ना कटाई के लिए महाराष्ट्र और पड़ोसी राज्यों के चीनी बेल्ट में जाते हैं। लंबे काम के घंटे, अस्थायी आवास, पानी और शौचालय की कमी, उस पर ठेकेदारों पर आर्थिक निर्भरता ने महिला मजदूरों की स्थिति को बेहद कमजोर बनाया है।
2019 में महाराष्ट्र सरकार की जांच में सामने आया कि जिले के 82,309 सर्वेक्षित महिला गन्ना मजदूरों में से 13,861 यानी लगभग 17% का हिस्टेरेक्टॉमी हो चुका था। यह आंकड़ा राज्य विधानसभा में भी रखा गया, जिसके मुताबिक 2016 से 2019 के बीच तीन सालों में 4,605 महिलाओं का हिस्टेरेक्टॉमी हुआ। एक अलग, छोटे नमूने पर आधारित सर्वे, महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग का 2018 का अध्ययन, बीड में यह दर करीब 36% तक होने का अनुमान लगाता है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह दर सिर्फ करीब 3% है, पहला बड़े सरकारी सर्वे से, दूसरा एक छोटे नमूना-अध्ययन से। दोनों ही दिखाते हैं कि बीड की स्थिति राष्ट्रीय औसत से कई गुना ज्यादा गंभीर है।
यह मामला 2024 में न्यूयॉर्क टाइम्स की एक जांच रिपोर्ट के बाद अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में भी आया, जिसके बाद कोका-कोला ने कहा कि वह इस मुद्दे से गहराई तक व्यथित है और इसकी जांच करने के लिए प्रतिबद्ध भी।
जुलाई 2025 में राज्यसभा में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने बताया कि केंद्र ने महाराष्ट्र सरकार को हर हिस्टेरेक्टॉमी सर्जरी की सख्त निगरानी और उचित मेडिकल जांच के बाद ही मंजूरी सुनिश्चित करने की सलाह दी है। जनवरी 2026 में राज्य सरकार ने निगरानी समिति को फिर से मजबूत करने और हर तीन महीने में समीक्षा करने का फ़ैसला लिया। यानी सरकार खुद मान रही है कि 2019 की सिफारिशों के बावजूद समस्या अब तक पूरी तरह हल नहीं हुई। यहीं बीड की कहानी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत से हजारों किलोमीटर दूर मैक्सिको में कृषि क्षेत्र में मजदूरों के शोषण का दूसरा रूप दिखाई देता है। अमेरिकी विदेश विभाग की 2025 की Trafficking in Persons रिपोर्ट के मुताबिक मैक्सिको के कृषि क्षेत्र में आर्थिक रूप से कमजोर मजदूर जबरन मजदूरी के जोखिम में हैं। सब्जियों, कॉफी, चीनी और तंबाकू की खेती में काम करने वाले मजदूरों को कभी-कभी वेतन रोककर, कर्ज में फंसाकर या भर्ती के दौरान किए गए झूठे वादे कर काम से बांधे जाने की शिकायतें दर्ज हैं।
प्रवासी और Indigenous समुदाय विशेष रूप से संवेदनशील हैं। कुछ मामलों में मजदूरों को ऐसी परिस्थितियों में रखा जाता है, जहां पर्याप्त पानी, भोजन, स्वास्थ्य सुविधाएं या छुट्टी तक उपलब्ध नहीं होती।
मैक्सिको में महिलाओं की स्थिति का दूसरा पहलू भी सामने आता है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार वहां कृषि क्षेत्र की महिला दिहाड़ी मजदूर में केवल 3% के पास लिखित रोजगार अनुबंध था और 91% को रोजगार से जुड़ा कोई लाभ नहीं मिल रहा था। इनमें मातृत्व अवकाश और स्वास्थ्य सुविधाएं भी शामिल हैं। यानी बीड में जहां महिलाएं गर्भाशय को काम की बाधा समझने लगते हैं, वहीं मैक्सिको में असुरक्षित रोजगार व्यवस्था उसे मातृत्व और सामाजिक सुरक्षा से दूर कर सकती है।
थाईलैंड का कृषि क्षेत्र भी इस वैश्विक तस्वीर का अहम हिस्सा है। ILO ने गन्ना, रबर, पाम और मक्का के खेतों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों पर अध्ययन किया है। एक क्षेत्रीय अध्ययन में पाया गया कि कुछ प्रवासी कृषि मजदूर लंबे घंटों तक काम करते हैं, उन्हें उचित रोजगार अनुबंध नहीं मिलता और कई बार वे न्यूनतम मजदूरी तथा सामाजिक सुरक्षा से भी बाहर रह जाते हैं। कर्ज, भर्ती एजेंटों पर निर्भरता और नियोक्ता बदलने में कठिनाई उन्हें असुरक्षित बनाती है। अध्ययन ने ऐसी परिस्थितियों को संभावित छिपी जबरन मजदूरी का जोखिम बताया।
थाईलैंड के बारे में अमेरिकी मानव तस्करी रिपोर्टों में भी कृषि क्षेत्र में मजदूरों के दस्तावेज जब्त करने, वेतन कटौती, कर्ज आधारित दबाव और हिंसा जैसी जबरदस्ती के तरीकों का उल्लेख किया गया है। यहां भी एक महत्वपूर्ण समानता दिखाई देती है, मजदूर का शरीर ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है और जब वह कर्ज या ठेकेदार के नियंत्रण में चला जाता है, तो उसकी सौदेबाजी की शक्ति खत्म होने लगती है।
ब्राजील को दुनिया के बड़े कृषि उत्पादकों में गिना जाता है। लेकिन 2025 में Journal of Human Trafficking में प्रकाशित एक शोध ने वहां कृषि क्षेत्र में मजदूर तस्करी की तस्वीर को नए आंकड़ों के साथ सामने रखा। चार प्रमुख कृषि राज्यों में किए गए प्रतिनिधिक सर्वे के आधार पर शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि पिछले पांच वर्षों में लगभग 1.75% से 5.4% कृषि श्रमिक मजदूर तस्करी का शिकार हुए हो सकते हैं। इसका राष्ट्रीय अनुमान लगभग 2.64 लाख से 8.15 लाख श्रमिकों तक पहुंचता है। अध्ययन में करीब 95% श्रमिकों ने कम-से-कम एक ऐसी शोषणकारी रोजगार प्रथा का अनुभव किया था जो तस्करी के रिस्क से जुड़ी थी।
यह आंकड़ा बीड की हिस्टेरेक्टॉमी से सीधी तुलना नहीं करता। लेकिन यह दिखाता है कि कृषि उत्पादन की चमक के पीछे श्रम शोषण की समस्या वैश्विक है।
उज्बेकिस्तान का कपास उद्योग एक अलग तरह की कहानी बताता है। कई वर्षों तक वहां कपास की खेती में राज्य द्वारा आयोजित जबरन श्रम की अंतरराष्ट्रीय आलोचना हुई। लेकिन ILO की 2021 की थर्ड-पार्टी मॉनिटरिंग रिपोर्ट, जो 11,000 कपास मजदूरों के इंटरव्यू पर आधारित थी, के मुताबिक 2021 की कपास कटाई में 99% मजदूरों ने स्वेच्छा से काम किया और देश ने व्यवस्थागत बाल श्रम व जबरन श्रम को खत्म करने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की। इसी आधार पर मार्च 2022 में कपास अभियान गठबंधन ने वर्षों पुराना अंतरराष्ट्रीय बहिष्कार हटा लिया।
इसलिए उज्बेकिस्तान को आज बीड जैसी बदतर स्थिति वाला देश कहना सही नहीं है, लेकिन उसका अनुभव महसूस कराना जरूरी हो जाता है, क्योंकि यह दिखाता है कि जब सरकार निगरानी, स्वतंत्र श्रम निरीक्षण और सप्लाई-चेन जवाबदेही मजबूत करती है, तो दशकों पुरानी जबरन मजदूरी की समस्या में वास्तविक सुधार संभव है।
इसका एक सीधा देश नंबर-1 जवाब देना संभव नहीं है। जबरन मजदूरी और प्रवासी मजदूर शोषण के आंकड़े अलग-अलग परिभाषाओं और स्रोतों से आते हैं। लेकिन वैश्विक तस्वीर चिंताजनक है। ILO, Walk Free और IOM के 2022 के संयुक्त वैश्विक अनुमान के मुताबिक़, किसी भी दिन दुनिया में करीब 2.76 करोड़ लोग जबरन या दबाव में मजदूरी के जाल में फंसे थे। यह आंकड़ा 2016 के मुकाबले 27 लाख ज्यादा था। इसमें 86% शोषण निजी क्षेत्र में होता है। महिला प्रवासी मजदूर विशेष रूप से असुरक्षित समूहों में आती हैं।
2025 की UN Women रिपोर्ट ने बताया कि प्रवासी महिला मजदूरों में खेतों में, घरों में, अस्पतालों में और कपड़े से जुड़े कार्य करने जैसे कम-नियमित क्षेत्रों में जबरदस्ती, ऋण-बंधुआपन, हिंसा और तस्करी के ज्यादा जोखिम का सामना करती हैं।
और 2026 के वैश्विक प्रवासी मजदूर विश्लेषण में खेत-किसान, फूड सप्लाई चेन्स में 2025 के दौरान दर्ज मानवाधिकार उल्लंघनों की संख्या सबसे ज्यादा थी, कृषि और फिशिंग से जुड़े मामलों की संख्या 162 थी। रिपोर्ट में अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों की कृषि आपूर्ति कड़ियों में भी प्रवासी मजदूरों के शोषण के मामले दर्ज किए गए। इसका अर्थ है कि समस्या केवल गरीब देशों की नहीं है।
ऐसे में बीड की कहानी दुनिया के हर जबरन या दबाव में मजदूरी मामले के बराबर तो कतई नहीं है। लेकिन इसकी भयावहता इसी में है कि काम की शर्तें महिला के शरीर के स्थायी अंग को हटाने के फैसले तक पहुंच गईं। मैक्सिको में कर्ज और वेतन रोकना, थाईलैंड में प्रवासी मजदूरों को रोजगार से बांधना, ब्राजील में खेती-किसानी मजदूरों की तस्करी और अमेरिका-यूरोप की सप्लाइ चेन्स में प्रवासी मजदूरों का शोषण, ये सभी अलग-अलग रूप और कहानियां हैं।
लेकिन इन सबके पीछे कारण एक ही है, गरीबी, कर्ज, असंगठित रोजगारस, कमजोर निरीक्षण, प्रवासी स्थिति, शिकायत करने का डर। इसलिए समाधान सिर्फ यह नहीं कि डॉक्टर अनावश्यक हिस्टेरेक्टॉमी न करें। समाधान यह है कि महिला मजदूर को छुट्टी लेने का अधिकार मिले, माहवारी के दौरान स्वच्छता की सुविधा मिले, गर्भावस्था में सुरक्षा मिले, बीमारी में मजदूरी न कटे, ठेकेदार कर्ज के जरिए उसे न बांध सके और शिकायत करने पर नौकरी या आजीविका छिनने का डर न हो।